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राजनीति विज्ञान- महत्वपूर्ण प्रश्नों का संग्रह [Political Science- General Knowledge Important Question]

Political Science- General Knowledge Important Question
राजनीति विज्ञान

राजनीति विज्ञान- महत्वपूर्ण प्रश्नों का संग्रह

प्रश्न 1. संसद का निर्माण किससे होता है?
उत्तर- भारत के संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संसद, भारत के राष्ट्रपति और संसद के दो सदनों यथा-राज्य सभा और लोक सभा से मिलकर बनती है।

प्रश्न 2. भारत के राष्ट्रपति को कौन निर्वाचित करता है?

उत्तर . राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों और राज्य विधान सभाओं एवं दिल्ली तथा पांडिचेरी के संघ राज्य-क्षेत्रों के निर्वाचित सदस्यों से बने निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3. राष्ट्रपति के निर्वाचन की क्या रीति है?

उत्तर . संविधान के अनुच्छेद 55 के अनुसार, जहां तक साध्य हो, राष्ट्रपति के निर्वाचन में भिन्न-भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व; के मापमान में एकरूपता होनी है। राज्यों में आपस में ऐसी एकरूपता प्राप्त कराने के प्रयोजन के लिए प्रत्येक राज्य मतों की जितनी संख्या का हकदार है वह निम्नलिखित रीति से अवधारित की जाएगी;

(क) किसी राज्य की विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के उतने मत होंगे जितने कि एक हजार के गुणित उस भागफल में हों जो राज्य की जनसंख्या को उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए;

(ख) यदि एक हजार के उक्त गुणितों को लेने के बाद शेष पांच सौ से कम नहीं है तो प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाएगा;

(ग) संसद के प्रत्येक सदन के प्रत्येक निर्वाचित सदस्यों के मतों की संख्या वह होगी जो राज्यों की विधान सभाओं के सदस्यों के लिए नियत कुल मतों की संख्या को, संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए, जिसमें आधे से अधिक भिन्न को एक गिना जाएगा और अन्य भिन्नों की उपेक्षा की जाएगी।

राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

प्रश्न 4. राष्ट्रपति की पदावधि क्या है?

उत्तर . राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा।

प्रश्न 5. क्या कोई ऐसी परिस्थिति होगी जिसमें राष्ट्रपति पांच वर्ष की पदावधि से पहले पद से पदत्याग कर सकते हैं?

उत्तर . हां।

ऐसी दो परिस्थितियां होंगी। पहली तब, जब राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेंगे और दूसरी, तब जब राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के लिए महाभियोग द्वारा पद से हटाया जाता है।

प्रश्न6 . राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की क्या प्रक्रिया है?

उत्तर . संविधान के अनुच्छेद 61 के अनुसार, जब संविधान के अतिक्रमण के लिए राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाना हो, तब संसद का कोई सदन आरोप लगाएगा। ऐसा कोई आरोप तब तक नहीं लगाया जाएगा जब तक कि- 
(क) ऐसा आरोप लगाने की प्रस्थापना किसी ऐसे संकल्प में अंतर्विष्ट नहीं है, जो कम से कम चौदह दिन की ऐसी लिखित सूचना के दिए जाने के पश्चात प्रस्तावित किया गया है जिस पर उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों ने हस्ताक्षर करके उस संकल्प को प्रस्तावित करने का आशय प्रकट किया है; और
(ख) उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा ऐसा संकल्प पारित नहीं किया गया है।

प्रश्न 7. क्या राष्ट्रपति दूसरी अवधि के लिए निर्वाचन का पात्र है?

उत्तर . हां।

संविधान के अनुच्छेद 57 के अनुसार राष्ट्रपति उस पद के लिए पुनर्निर्वाचन का पात्र होता है।

प्रश्न 8. राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन के लिए क्या अर्हताएं हैं?

उत्तर . संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई व्यक्ति राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह भारत का नागरिक है, पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और लोक सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए अर्हित है। कोई व्यक्ति , जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, वह निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा।

प्रश्न 9. क्या संसद या राज्यं विधान-मंडल का सदस्य राष्ट्रपति बन सकता है?

उत्तर . राष्ट्रपति न तो दोनों में से किसी भी सदन का और न ही किसी राज्य की विधान मंडल के एक सदन का सदस्यट होगा और यदि ऐसा कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित होता है तो यह माना जाएगा कि उन्हों ने उस तारीख को उस सदन में अपना स्था्न रिक्त कर दिया है जब वे राष्ट्रपति के रूप में पद ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 10. भारत के उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन कौन करता है?

उत्तर . उप-राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के सदस्यों् से बने निर्वाचकण के सदस्यों द्वारा निर्वाचित ‍होते हैं।

प्रश्न 11. उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन की क्या रीति है?

उत्तर . उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

प्रश्न 12. उप-राष्ट्रपति के पद की क्या पदावधि है?

उत्तर . उप-राष्ट्रपति उस तारीख से पांच वर्षों की पदावधि के लिए पद धारण करेंगे जब वे अपने पद का कार्यभार ग्रहण करेंगे।

प्रश्न 13. क्या कोई ऐसी परिस्तिथि होगी जिसमें उप-राष्ट्रपति पांच वर्ष की पदावधि से पहले पद त्या्ग सकते हैं?

उत्तर . हां।

ऐसी दो परिस्तिथियाँ होंगी। पहली, तब जब उप-राष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्यागते हैं और दूसरी तब, जब उन्हें पद से हटाया जाए।

प्रश्न14. उप-राष्ट्रपति को हटाए जाने की क्या प्रक्रिया है?

उत्तर . उप-राष्ट्रपति, राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्य सभा के सभी सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है। ऐसा कोई संकल्प तब तक नहीं प्रस्तावित किया जाएगा जब तक कि उस संकल्पा को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो।

प्रश्न 15. उप-राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन के लिए क्या अर्हताएं हैं?

उत्तर . संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार कोई व्यक्ति उप-राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह भारत का नागरिक है, पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और राज्य सभा का सदस्य् निर्वाचित होने के लिए अर्हित है कोई व्यक्ति , जो उक्त् सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्यै प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, उप-राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा।

प्रश्न16. क्या, राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती देने के लिए कोई उपबंध है?

उत्तर . हां। संविधान के अनुच्छे्द 71 के अनुसार राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या संक्तन सभी शंकाओं और विवादों की जांच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपतीय एवं उप-राष्ट्रपतीय निर्वाचन अधिनियम, 1952 की धारा 14 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक निर्वाचन याचिका दायर की जा सकती है।

प्रश्न 17. राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है?

उत्तर . 250

राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है। भारत के संविधान के अनुच्छेकद 80 में यह उपबंध किया गया है कि 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित किए जाने होते हैं और राज्यों से 238 से अधिक प्रतिनिधि एकल संक्रमणीय मत के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति के अनुसार राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाने होते हैं।

प्रश्न 18. क्या वे सभी निर्वाचित होते हैं?

उत्तर . नहीं।

वे सभी निर्वाचित नहीं होते हैं। जैसाकि ऊपर उल्लेीख किया गया है 12 नामित होते हैं और 238 निर्वाचित किए जाने होते हैं।

प्रश्न 18क. राज्य सभा की वर्तमान सदस्यं संख्या क्या है?

उत्तर . 245 सदस्य

12 नामित होते हैं और 233 निर्वाचित होते हैं।

प्रश्न 19. राज्य सभा का कितना कार्यकाल होता है?

उत्तर . राज्य सभा एक स्थायी सदन है और यह भारत के संविधान के अनुच्छे‍द 83(1) के अनुसार विघटन के अधीन नहीं है। लेकिन, यथा-संभव इसके लगभग एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होंगे और उतनी ही संख्या में उन्हें प्रतिस्थादपित करने के लिए सदस्य चुने जाते हैं। 

प्रश्न 20. राज्य सभा के सदस्यों को कौन निर्वाचित करता है?

उत्तर . राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य ।

भारत के संविधान के अनुच्छेकद 80(4) में इस बात की व्यिवस्था की गई है कि राज्यभ सभा के सदस्य एकल संक्रमणीय मत के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्वय की पद्धति के माध्यम से राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा निर्वाचित किए जाएंगे।

प्रश्न 21. राज्य सभा के सदस्यों को कौन नामित करता है?

उत्तर . भारत के राष्ट्रपति।

भारत के राष्ट्रपति राज्य सभा के 12 सदस्यों को नामित करते हैं जैसाकि पूर्व में उल्लेेख किया गया है।

प्रश्न 22. क्या नाम-निर्देशन के लिए कोई विशेष योग्यता होती है?

उत्तर . हां।

भारत के संविधान के अनुच्छेयद 80(3) में यह उपबंध किया गया है कि राष्ट्रपति द्वारा राज्यं सभा में नामित किए जाने वाले सदस्यों के पास साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों में विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव होना चाहिए।

अनुच्छेेद 84(ख) में विनिर्धारित किया गया है कि ऐसे व्यक्ति की आयु 30(तीस) वर्ष से कम नहीं होगी।

प्रश्न 23 . लोक सभा का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?

उत्तर . सामान्य कार्यकाल : 5 वर्ष।

संविधान का अनुच्छेक 83(2) यह अनुबंध करता है कि लोक सभा की अपनी पहली बैठक के लिए निर्धारित तारीख से 5 वर्षों की सामान्य कार्यावधि होगी और इससे आगे नहीं। तथापि, राष्ट्रंपति चाहें तो उससे पहले भी सदन का विघटन कर सकते हैं।

प्रश्न 24. लोक सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या क्या हो सकती है?

उत्तर . 550

लोक सभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 है। संविधान का अनुच्छेद 81 यह उपबंधित करता है कि राज्यों से अधिक से अधिक 530 सदस्य और संघ राज्य क्षेत्रों से अधिक से अधिक 20 सदस्य निर्वाचित किए जाएंगे। संविधान का अनुच्छेंद 331 यह उपबंधित करता है कि भारत का राष्ट्रपति एंग्लो् इंडियन समुदाय से अधिक से अधिक 2 सदस्यों को नामित कर सकता है, यदि उसकी राय में उस सदन में उस समुदाय का भली प्रकार से प्रतिनिधित्व नहीं किया गया है।

प्रश्न 25. लोक सभा के सदस्यों का निर्वाचन किस प्रकार किया जाता है?

उत्तर . लोक प्रतिनिधित्वन अधिनियम, 1951 की धारा 14 के अधीन, अधिसूचना के माध्यम से भारत का राष्ट्रपति निर्वाचन क्षेत्रों से यह अपेक्षा करता है कि वे लोक सभा में अपने सदस्यों का चुनाव करें। इसके पश्चात संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के निर्वाचक सीधे ही लोक सभा सदस्योंं का चुनाव करेंगे। भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा के निर्वाचन व्य‍स्क मताधिकार के आधार पर होंगे।

प्रश्न 26. संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के निर्वाचकों द्वारा कितने सदस्य चुने जाते हैं?

उत्तर . एक।

प्रत्येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र केवल एक सदस्य का चुनाव करेगा।

प्रश्न 27. क्या प्रारंभ से ही यही स्थिति थी?

उत्तर . नहीं।

वर्ष 1962 से पहले, एकल सदस्यीेय और बहु-सदस्यीयय निर्वाचन क्षेत्र हुआ करते थे। ये बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र एक से अधिक सदस्य चुना करते थे। बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों को वर्ष 1962 में समाप्त कर िदया था।

प्रश्न 28 . भारत में पहले साधारण निर्वाचन किस वर्ष में हुए?

उत्तर . वर्ष 1951-52 में

भारत में पहले साधारण निर्वाचन वर्ष 1951-52 के दौरान हुए थे।

प्रश्न29. उस समय लोक सभा की कुल संख्या क्या थी?

उत्तर . उस समय लोक सभा की कुल संख्या 489 थी।
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राजनीति विज्ञान - भारत में सहकारी आन्दोलन की असफलता के कारण [Causes of Failure of Co-operative Movement in India]

Causes of Failure of Co-operative Movement in Indian
सहकारी आंदोलन के असफलता के कारण

भारत में सहकारी आन्दोलन की असफलता के कारण [Causes of Failure of Co-operative Movement in India]

भारत में सहकारी आन्दोलन की अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ रहीं फिर भी इसे हम सफल नहीं कह सकते हैं। इस आन्दोलन द्वारा जो लक्ष्य प्राप्त करने थे, वे प्राप्त नहीं किये जा सके। भारत में सहकारी आन्दोलन की असफलता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
(1) सहकारी संगठन का प्रथम प्रमुख दोष अकुशल प्रबन्ध व्यवस्था का होना है। इन संगठनों में कार्यरत कर्मचारी एवं प्रबन्धक दोनों ही प्रबन्ध व्यवस्था में कुशल एवं निपुण नहीं होते।
(2) सरकार इन संगठनों के रजिस्ट्रेशनअंकेक्षण आदि के माध्यम से इनके संचालन में अनावश्यक हस्तक्षेप करती है, जिस कारण ये संगठन स्वायत्तता प्राप्त नहीं कर पाये।
(3) ये संगठन निजी क्षेत्र से होने वाली कठोर प्रतिस्पर्धा के सामने नहीं टिक पाते हैं। निजी क्षेत्र में पेशेवरपन तथा अधिक कुशलता होती है जिसका सहकारी संगठन में सर्वथा अभाव पाया जाता रहा है।
(4) लाभ को विशेष स्थान न मिलने से इन संगठनों में व्यावसायिक कुशलता का अभाव रहा है।
(5) सहकारी आन्दोलन को कुशल एवं अनुभवी नेतृत्व मिल पाने के कारण असफलता का सामना करना पड़ा है।
(6) भारत में अशिक्षा इस आन्दोलन के विकास के मार्ग की महत्त्वपूर्ण समस्या है।
(7) रामनिवास मिर्धा समिति के अनुसार, "भारत में 25 प्रतिशत सहकारी समितियाँ वास्तव में सक्रिय नहीं हैं। इन्हीं निष्क्रिय समितियों के कारण भी सहकारी आन्दोलन के विकास में बाधा पहुँची है।
(8) भारत में जनहित की सहकारी भावना का अभी पूर्ण विकास नहीं पाया है।
(9) सहकारी संगठनों पर नौकरशाही का प्रभुत्व भी एक उल्लेखनीय बाधा है।
(10) जातीय संघर्ष, दरिद्रता, वर्गभेद आदि भारतीय सामाजिक व्यवस्था के ऐसे तत्व है। जिनका प्रतिकूल प्रभाव सहकारी आन्दोलन पर पड़ा है।
(11) गोपनीयता का अभाव, अपर्याप्त पूंजीनिर्धनों को पर्याप्त लाभ न मिलनादोषपूर्ण,निरीक्षण तथा अंकेक्षण, ऋणग्रस्तता, कृषि का पुराना तरीका, नियमित बाजारों अभाव इत्यादि वे अन्य दोष हैं जिनसे भारत में सहकारी आन्दोलन प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।
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राजनीति विज्ञान-सहकारी संगठन के लाभ महत्व [Advantages Importance of Co-operative Sector]

Advantages Importance of Cooperative Sector
सहकारी संगठन के लाभ/महत्त्व

सहकारी संगठन के लाभ महत्व [Advantages Importance of Cooperative Sector]

सहकारी संगठन के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

(A) आर्थिक लाभ (Economic Benefits)

(1) संगठन के सदस्यों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है।
(2) मध्यस्थों की समाप्ति होने से इसका सीधा लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है।
(3) अपेक्षाकृत कम विपणन व्यय होता है।
(4) संगठन के सदस्यों में मितव्ययिता का गुण विकसित होता है।
(5) सरकार तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं से उदार शर्टी व कम ब्याज पर ऋण मिल जाता है।
(6) इन संगठनों को सरकार से विभिन्न रियायतें एवं संरक्षण मिलता है।
(7) श्रम व पूंजी में मधुर सम्बन्ध पाये जाते हैं।
(8) सहकारिता में सम्पत्ति का न्यायोचित वितरण होता है।
(9) इन संगठनों में माप-तौल की सही व्यवस्था होती है।
(10) इन संगठनों के माध्यम से कृषि हेतु ऋणखाद, बीज, कृषि-उपकरण इत्यादि।
उचित शर्तों तथा मूल्यों पर मिलने के कारण कृषि का तीव्र विकास सम्भव हुआ है।

(B) सामाजिक लाभ (Social Benefits)

(1) ये संगठन लाभ के स्थान पर सेवा की भावना को अधिक महत्व देते हैं।
(2) इन संगठनों की स्थापना से आपस में सहयोग व एकता की भावना विकसित होती है।
(3) सहकारी संगठन शोषण से मुक्ति दिलाता है। न तो यह स्वयं शोषण करता है और न ही दूसरों  को शोषण करने देता है।
(4) इन संगठनों में ईमानदारी, परिश्रमनिष्ठ आदि पर जोर दिया जाता है, यह सब नैतिक मूल्यों के विकास में सहायक सिद्ध होते हैं।
(5) इसमें सदस्य स्वयं अपनी समस्या को हल करते हैं जिससे उनमें आत्मविश्वास की भावना विकसित होती है।
(6) सहकारी संगठन समाज को सस्तीअच्छी एवं प्रामाणिक वस्तुएं उपलब्ध कराता है। साथ ही स्थायी रोजगार के अवसर प्रदान करता है। इसके फलस्वरूप जीवनस्तर ऊंचा होता है।
(7) सहकारिता समाज में शान्तिपूर्वक परिवर्तन लाती है तथा विश्व शान्ति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(C) राजनैतिक लाभ (Political Benefits)

(1) सहकारी संगठन के सदस्य स्वयं प्रबन्ध संचालन करते हैं जिससे नेतृत्व के गुण का विकास होता है।
(2) ये संगठन लोगों को अपने अधिकार एवं कर्तव्यों का बोध कराते हैं जिससे ये लोग
श्रेष्ठ एवं जागरूक नागरिक बनते हैं।
(3) इनसे मिलजुलकर कार्य करने तथा आपसी सहयोग की भावना का विकास होता है।

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राजनीति विज्ञान- सहकारी संगठन के प्रकार [Types of Co-operative Organisation]

Types of Co-operative Organisation
सहकारी संगठन के प्रकार 

सहकारी संगठन के प्रकार [Types of Co-operative Organisation]

(1) औद्योगिक सहकारी समितियाँ (Industrial Co-peratives)-

औद्योगिक सहकारिता से आशय कारीगरों, औद्योगिक श्रमिकों एवं छोटे उद्योगपतियों की ऐसी सहकारी संस्था से है जो औद्योगिक उत्पादन करने या इस कार्य के लिये सुविधाएं प्रदान करने हेतु स्थापित की जाती हैं। इनको स्थापित करने के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार से हैं -
(i) औद्योगिक कर्मचारियों को कच्चा माल, औजार तथा साज-सज्जा की वस्तुएँ उचित मूल्य पर उपलब्ध कराना।
(ii) सदस्यों को उत्पादन क्रियाओं हेतु अग्रिम (Advance) देना।
(iii) सदस्यों के उत्पादित माल को उचित मूल्य पर एवं सुविधापूर्वक विक्रय की व्यवस्था करना।
(iv) शासन एवं अन्य सार्वजनिक संस्थाओं से माल की पूर्ति के अनुबन्ध करना तथा सदस्यों की सहायता से पूरा करना।
(v) सदस्यों को व्यवसाय पद्धति, उत्पादन की विधियाँ एवं अन्य प्रकार के प्रशिक्षण हेतु आवश्यक व्यवस्था करना।
(vi) सदस्यों को किराया क्रय पद्धति या आसान किश्तों पर मशीन दिलवाने की व्यवस्था करना।
(vii) कर्मचारियों में उपक्रम के प्रति निष्ठा पैदा करना तथा उनके पारस्परिक सहयोग में वृद्धि करना।

वर्तमान में लगभग 45,300 औद्योगिक सहकारी समितियाँ कार्य कर रही हैं जिनके सदस्यों की संख्या लाख है। सदस्यों की संख्या लगभग 25 लाख है।  मार्च 1966 में औद्योगिक सहकारिताओं के राष्ट्रीय संघ (National Federation of Industrial Co-operatives) का पंजीयन हुआ। यह संघ सदस्य समितियों के उत्पादों के विपणन में सहायता प्रदान करता है।

(2) संग्रहण, वितरण एवं विपणन सहकारी समितियाँ (Storage, Distribution and Marketing Co-operatives)-

राष्ट्रिय सहकारी विकास निगम (The National Co-operatives Development Corporation) का यह दायित्व है कि वह विभिन्न स्तरों पर समितियों की संग्रहण क्षमता को बढ़ाने हेतु नियोजन, संवर्द्धन एवं वित्तीयन करे। वर्तमान
21,000 से भी अधिक ग्रामीण गोदाम तथा 5,100 से अधिक विपणन गोदाम हैं। इसके अतिरिक्त एक बड़ी संख्या में कोल्ड स्टोरेज' (Cold storage) इकाइयाँ हैं।

खाद, बीज, कृषि उपज इत्यादि के वितरण में सहकारी समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत में वितरित की जाने वाली कुल खाद का लगभग 55 प्रतिशत सहकारी वितरण पद्धति (Co-operative Distribution System) के माध्यम से बेचा जाता है।

लगभग 3,400 प्राथमिक सहकारी समितियों पर सहकारी विपणन की संरचना का निर्माण किया गया है जो कि देश के सभी महत्वपूर्ण कृषि बाजारों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेती हैं। कृषक, दस्तकार, लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धे चलाने वाले व्यक्ति इत्यादि अपने उत्पादित माल के विक्रय हेतु सहकारी विपणन समितियाँ बना लेते हैं। ये समितियाँ अपने सदस्यों को मध्यस्थों के शोषण से बचाती हैं। राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (The National Agricultural Co-operative Marketing Federation) कृषि उपज के अन्तर्राज्यीय निर्यात व्यापार की वृद्धि हेतु प्रयास करता है।

(3) बहुउद्देशीय सहकारी समितियाँ (Multipurpose Co-operatives)-

आदिवासियों/ जनजातियों के आर्थिक विकास हेतु आदिवासी क्षेत्रों में स्थापित प्रारम्भिक सहकारी समितियों का पुनर्गठन किया गया। यह समितियाँ बहुउद्देशीय होती हैं। आदिवासियों को अल्पकालीन, मध्यमकालीन एवं दीर्घकालीन साख उपलब्ध करना, कृषि एवं वन उत्पादों का विपणन, कृषि हेतु आवश्यक खाद बीजइत्यादि की आपूर्ति इत्यादि इन समितियों के मुख्य कार्य होते हैं। आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं ओडिशा में राज्य स्तर पर आदिवासी विकास सहकारी निगमों/संघों (State Level Co-operative Tribal Development Corporations/Federations) की स्थापना की जा चुकी है।

(4) सहकारी साख समितियाँ (Co-operative Credit Societies)-

इन समितियों के दो रूप होते हैं:
(i) शहरी साख समितियाँ (Urban Credit Co-operatives)- ये समितियाँ शहरों में रहने वाले छोटे व्यवसायियों एवं मध्यमवर्गीय लोगों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं पूर्ति हेतु स्थापित की जाती हैं।
(ii) ग्रामीण साख समितियाँ (RuralCredit Co-operatives)- ये समितियां ग्रामीण साख की आवश्यकता की पूर्ति हेतु बनायी जाती हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है। और कृषि के विकास के लिये आवश्यक है कि कृषकों को पर्याप्त मात्रा में साख उपलब्ध हो। इस आवश्यकता को ये समितियाँ पूरा करती हैं।

(5) उपभोक्ता सहकारी समितियों (Consumers Cooperative Societies)-

सामान्यतया ये सहकारी समितियाँ उपभोक्ताओं को मध्यस्थों के शोषण से बचाने के लिये स्थापित में की जाती हैं। भारत जहाँ कुछ व्यवसायी ईमानदारी के लिये विख्यात नहीं , वस्तुत: उनसे रक्षा हेत उपभोक्ताओं द्वारा सहकारी समितियों का सहारा लिया जाता है।
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राजनीति विज्ञान- सहकारिता आन्दोलन के सिद्धान्त [Principles of Co-operative Movement]

Principles of Co-operative Movement

Principles of Co-operative Movement

सहकारिता आन्दोलन के सिद्धान्त [Principles of Co-operative Movement]

सहकारिता आन्दोलन व्यक्ति आधारित न होकर समूह आधारित होता है। सहकारिता आशय होता है : स्वेच्छा से चलाया गया एक आन्दोलन जो सहकारी प्रयासों से अपने हितों का संवर्द्धन करना चाहते हैं।

सहकारिता आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्त निम्नांकित हैं

(1) सामूहिक हितों पर आधारित (Based on collective interests)- 

सहकारी आन्दोलन किसी एक व्यक्ति या वर्ग के हित पर नहीं वरन् सामूहिक हित पर आधारित होता है।  इसमें विभिन्न इकाइयाँ मिलकर एक सामूहिक इकाई का निर्माण करती हैं और सामूहिक उद्देश्य की बात के लिए सामूहिक प्रयास करती हैं। यह आन्दोलन लाभ के स्थान पर उपयोगी समष्टिगत हितों की प्राप्ति को अधिक महत्व देता है।

(2) सम्पत्ति का औचित्यपूर्ण वितरण (Justired distribution of property)-

सहकारी व्यवस्था में सदस्यों का व्यक्तिगत कुछ नहीं होता। सामाजिक सम्पत्ति का बंटवारा इस प्रणाली में औचित्यपूर्ण तरीके से सामूहिक आधार पर जाता किया है। इसलिये यह प्रणाली न्यायसंगत मानी जाती है। इस प्रणाली में असमानता की न्यूनतम संभावना होती है।

(3) सेवा पर आधारित (Based on service)-

सहकारी संगठन/सहकारी आंदोलन का उद्देश्य कभी भी लाभ अर्जित करना नहीं होता। इसका उद्देश्य समाज की सेवा करना होता है। यही कारण है कि सहकारी संगठन लाभ अर्जित करने पर कम और सेवा भाव को अधिक महत्व देते हैं।

(4) आर्थिक संवृद्धि तथा समाज कल्याण पर आधारित (Based on economic growth and social welfare)-सहकारिता पर आधारित प्रणाली

सहकारिता पर आधरित प्रणाली पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्था का सम्मिश्रण प्रस्तुत करती है। इसमें वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए आर्थिक समृद्धि तथा सार्वजनिक कल्याण के लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं। सहकारिता, समाजवाद तथा सामाजिक कल्याण में गहरा सम्बन्ध है। समाजवाद में आर्थिक क्रियाओं को सार्वजनिक बनाया जाता है जो सहकारिता से ही संभव है।
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राजनीति विज्ञान- सहकारिता आंदोलन के उद्देश्य

Objective of Co- operative Movement
सहकारिता आन्दोलन के उद्देश्य

सहकारिता आन्दोलन के उद्देश्य[Objectives of Co-operative Movement]

प्रसिद्ध विद्वान् चार्ज जीड के अनुसार, "सहकारिता में सहायता 'स्वयं की सहायता' (Self help) तथा 'प्रत्येक सबके लिये' (Each for all) नामक दो उद्देेश्यो की प्रधानता है। 'स्वयं की सहायता' का आशय यह की अपने ही सााधनों से स्वयं की आवश्यकताओ को पूरा करने मेंं गर्व महसूस करना अर्थात अपना व्यापारी, 'प्रत्येक सबके लिये' से यह तात्पर्य है कि केवल स्वयँ के लिये ही इच्छा न रखना, बल्कि दूसरो के लिये एवं दूसरों के जरिये भी स्वतन्त्रता  एवं मुक्ति पाने की इच्छा रखना।" सहकारिता आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) आर्थिक उद्देश्य (Economic Motives)- इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना है ताकि वह अपनी से योग्यता एवं क्षमता का कुशलतम उपयोग कर सके। इसके अतिरिक्त समाज के प्रत्येक वर्ग को आर्थिक सुरक्षा एवं न्याय प्रदान करना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है।
(2) सामाजिक उद्देश्य (Social Motives)- सहकारी आन्दोलन केवल आर्थिक आन्दोलन न होकरसामाजिक आन्दोलन भी है। इसका एक प्रमुख उद्देश्य पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दोषों को दूर कर समाजवादी समाज की स्थापना करना है। इसमें सम्पूर्ण समाज के हित तथा कल्याण के बारे में विचार किया जाता है।
(3) सेवा एवं सहयोग उद्देश्य (Service and Co-perative Motives)-  सहकारिता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सेवा एवं सहयोग अपनाने पर जोर देती है। सेवाभावना से सहयोग की भावना का विकास होता है जिससे समाज को अनेक लाभ मिलते हैं।
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सहकारिता आंदोलन [Co-operative Movement]

सहकारिता आंदोलन
सहकारिता आंदोलन

सहकारिता आंदोलन 

[Co-operative Movement]

"सहकारिता सामाजिक संगठन की एक पद्धति है जो एकता, मितव्ययिता, लोकतन्त्र, न्याय एवं स्वतन्त्रता पर आधारित है। सहकारिता स्वयं का अपना जीवनदर्शन है। यह मनुष्य को स्वार्थपरता से सार्वजनिक सेवा की ओर ले जाती है। प्रतियोगिता का अन्त कर पारंपरिक सहयोग से व्यक्ति अपने स्वयं के संगठन एवं मेल द्वारा आर्थिक क्रियाओं का संचालन करने लगते है।"
                                                 -डब्लू.पी. वाटकिन्स
सहकारिता : अर्थ और परिभाषा।
[Co-operation : Meaning and Definition] ।
साधारणतया सहायता करने को सहकारिता कहा जाता है। सहकारिता आन्दोलन आर्थिक दृष्टि से निर्बल व्यक्तियों के उस आन्दोलन को कहते हैं जो स्वेच्छा से आर्थिक हितों की पूर्ति हेतु बनाया जाता है। इससे पारस्परिक सहायता, त्याग, आत्मनिर्भरता और मितव्ययिता आदि गुणों का विकास होता है। सहकारिता के अन्तर्गत वैयक्तिक नहीं वरन् सामूहिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहन दिया जाता है।
सहकारिता शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों से मिलकर हुई है-सह + कार।‘सह' का अर्थ है-मिलकर तथा 'कार' का अर्थ है-काम।
सहकारिता पर आधारित व्यवस्था पूंजीवादी और समाजवादी दोनों व्यवस्थाओं से है। इसमें वैयक्तिक स्वतन्त्रता की रक्षा करते हुए आर्थिक समृद्धि तथा सार्वजनिक कल्याण के
लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं। सहकारिता, लोकतान्त्रिक समाजवाद तथा नियोजन में गहरा सम्बन्ध है। समाजवाद में आर्थिक क्रियाओं को सार्वजनिक बनाया जाता है जो वास्तव में सहकारीकरण से ही सम्भव है। सहकारी भावना से समता, भ्रातृ-भावना, आत्मविश्वास, व्यवस्था कौशल आदि व्यावहारिक एवं नैतिक गुणों का विकास होता है जो समाज एवं राष्ट्र की समृद्धि लिए आवश्यक है।
सहकारिता की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ नीचे दी गई हैं।
(1) "सहकारिता संगठन द्वारा आत्म-सहायता को प्रभावपूर्ण बनाने की विधि है।"               - सर होरेस एल
["Co-operation is self-help made effective by organization."    - Sir Horace Plunkett]
(2) "सहकारिता उत्पादन एवं वितरण की क्रियाओं में प्रतियोगिता एवं सभी प्रकार के मध्यस्थों को हटाना है।"
[Co-operation means abandonment of competition in production and distribution and the elimination of middlemen of all kinds."          -Seligman]
(3) "सहकारिता संगठन का वह स्वरूप है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छानुसार समानता के आधार पर मनुष्य की हैसियत से अपने आर्थिक हितों में वृद्धि हेतु संगठित होते हैं।" कैल्वर्ट
["Co-operation is a form oforganization where in persons voluntarily associate together as human being on a basis of equality for the promotion ofeconomic interests of themselves.” -E.H. Calveri]

सहकारी संगठन आन्दोलन की विशेषताएँ
[Characteristics of Co-operative
Organization/Movement]

सहकारी आन्दोलन की निम्नांकित विशेषताएँ हैं

(1) यह सामूहिक हितों के लिये बनाया गया व्यक्तियों का एक संघ है।
(2) सहकारी संगठन की सदस्यता स्वैच्छिक होती है। कोई व्यक्ति जब चाहे इसका सदस्य बन सकता है तथा पूर्व सूचना देकर सदस्यता समाप्त कर सकता
(3) इसकी प्रबन्ध व्यवस्था लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों के आधार पर की जाती है।
(4) सहकारी संगठन एक धार्मिक एवं परोपकारी संगठन न होकरआर्थिक संगठन होता है।
(5) सहकारी संगठन लाभ की जगह सेवा को अधिक महत्व देता है।
(6) यह नैतिक उत्थान, ईमानदारी तथा आत्म सहायता पर आधारित सामाजिक एवं आर्थिक आन्दोलन है।
(7) इसमें सामाजिक सम्पत्ति का बँटवारा एक निश्चित न्यायपूर्ण आधार पर आधारित होता है।
(8) यह पारस्परिक सहायता द्वारा आत्म सहायता के सिद्धान्त पर आधारित है।
(9) इसमें पूंजीवाद एवं साम्यवाद दोनों के गुण पाये जाते हैं।
(10) यह लोकतन्त्र पर आधारित एक स्वत: संचालित (Autonomous) संस्था है जो स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रबन्ध व्यवस्था करती है।
(11) यह आन्दोलन व्यक्ति के साथ-साथ समुदाय के सर्वागीण विकास लिये प्रयास करता है।
(12) 'काम करो' इस आन्दोलन का नारा है। 
(13) सहकारिता आंदोलन संघात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें विभिन्न इकाइयां मिलकर अपना एक संघ बनाकर अपने क्रियाकलाप संचालित करती है।
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राजनीति विज्ञान- सामान्य ज्ञान [Political Science- General Knowledge]

राजनीति विज्ञान - सामान्य ज्ञान
Political Science GK

राजनीति विज्ञान- सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

प्रश्‍न 1 – सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है।
(a) राष्‍ट्रपति
(b) प्रधानमंत्री
(c)  म‍ंत्रिपरिषद्
(d) संसद
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 2 – सर्वोच्‍च न्‍यायालय के अन्‍य न्‍यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है।
(a) राष्‍ट्रपति
(b) संसद
(c)  सर्वोच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश
(d) सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीस के परामर्श से राष्‍ट्रपति
उत्‍तर – सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीस के परामर्श से राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 3 – भारत के किस उच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायाधीशों की संख्‍या सबसे कम है।
(a) हिमाचल प्रदेश उच्‍च न्‍यायालय
(b) केरल उच्‍च न्‍यायालय
(c)  गुजरात उच्‍च न्‍यायालय
(d) सिक्किम उच्‍च न्‍यायालय
उत्‍तर – सिक्किम उच्‍च न्‍यायालय ।

प्रश्‍न 4 – भारत के किस उच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायाधीशो की संख्‍या सबसे अधिक है।
(a) बम्‍बई उच्‍च न्‍यायालय
(b) कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय
(c)  गुवाहाटी उच्‍च न्‍यायालय
(d) इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय
उत्‍तर – इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ।

प्रश्‍न 5 – भारत के 24 उच्‍च न्‍यायालयों में किसकी स्‍थापना सबसे बाद में हुई है।
(a) सिक्किम उच्‍च न्‍यायालय
(b) छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय
(c)  उत्‍तराखण्‍ड उच्‍च न्‍यायालय
(d) त्रिपुरा उच्‍च न्‍यायालय
उत्‍तर – त्रिपुरा उच्‍च न्‍यायालय ।

प्रश्‍न 6 – बम्‍बई उच्‍च न्‍यायालय, कलकत्‍ता उच्‍च न्‍यायालय तथा मद्रास उच्‍च न्‍यायालय की स्‍थापना एकसाथ हुई थी इस उच्‍च न्‍यायालयों की स्‍थाना किस वर्ष हुई थी ।
(a) 1862 ई.
(b) 1866 ई.
(c)  1884 ई.
(d) 1948 ई.
उत्‍तर – 1862 ई. ।

प्रश्‍न 7 – किस उच्‍च न्‍यायालय के सर्वाधिक स्‍थायी/अस्‍थायी खण्‍डपीठ है।
(a) राजस्‍थान उच्‍च न्‍यायालय
(b) गुवाहाटी उच्‍च न्‍यायालय
(c)  बम्‍बई उच्‍च न्‍यायालय
(d) मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय
उत्‍तर – बम्‍बई उच्‍च न्‍यायालय ।

प्रश्‍न 8 – भारत के किस संघ शासित क्षेत्र का अपना उच्‍च न्‍यायालय है।
(a) लक्षद्वीप
(b) चण्‍डीगढ़
(c)  दिल्‍ली
(d) पुडुचेरी
उत्‍तर – दिल्‍ली ।

प्रश्‍न 9 – निम्‍नलिखित में से किस राज्‍य का अपना स्‍वयं का उच्‍च न्‍यायालय नही है।
(a) सिक्किम
(b) हिमाचल प्रदेश
(c)  ओडिशा
(d) मणिपुर
उत्‍तर – मणिपुर ।

प्रश्‍न 10 – न्‍यायाधीश किसी मुकदमे पर निर्णय देता है।
(a) दलीलों के आधार पर
(b) दिए गए शुल्‍क के आधार पर
(c)  सबूतों के आधार पर
(d) पुलिस तहकीकात के आधार पर
उत्‍तर – सबूतों के आधार पर ।

प्रश्‍न 11 – लोक सभा के लिए कितने सदस्‍य मनोनीत हो सकते है।
(a) एक भी नही
(b) दो
(c)  तीन
(d) बारह
उत्‍तर – दो ।

प्रश्‍न 12 – लोकसभा के प्रत्‍येक सत्र का प्रथम घण्‍टा ............. से शुरू होता है।
(a) सार्वजनिक काल
(b) विशेषाधिकार काल
(c)  शून्‍य काल
(d) प्रश्‍न काल
उत्‍तर – प्रश्‍न काल ।

प्रश्‍न 13 – भारत की सर्वोच्‍च कानून निर्माण संस्‍था है।
(a) राष्ट्रपति
(b) न्‍यायपालिका
(c)  संसद
(d) प्रधानमंत्री व उसका मंत्रिपरिषद
उत्‍तर – संसद ।

प्रश्‍न 14 – भारत में राज्‍य के राज्‍य पाल की नियुक्ति कौन करता है।
(a) प्रधानमंत्री
(b) संवैधानिक उपचारों का अधिकार
(c)  भारत के राष्‍ट्रपति
(d) संसद
उत्‍तर – भारत के राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 15 – भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति कौन थे ।
(a) डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद
(b) डॉ. एस. राधाकृष्‍णन
(c)  जाकिर हुसैन
(d) जवाहर लाल नेहरू
उत्‍तर – डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ।

प्रश्‍न 16 – भारत के राष्‍ट्रपति को उसके कार्यकाल से हटाया जा सकता है।
(a) प्रधानमंत्री द्वारा
(b) उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा
(c)  मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त द्वारा
(d) संसद द्वारा
उत्‍तर – संसद द्वारा ।

प्रश्‍न 17 – भारतीय सेना का सर्वोच्‍च कमाण्‍डर कौन होता है।
(a) राष्‍ट्रपति
(b) प्रधानमंत्री
(c)  गृहमंत्री
(d) रक्षामंत्री
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 18 – वर्तमान लोकसभा है।
(a) 13 वीं
(b) 15 वीं
(c)  14 वी
(d) 16 वी
उत्‍तर – 15 वी ।

प्रश्‍न 19 – जवाहरलाल नेहरू की मृत्‍यु के बाद प्रधानमंत्री का कार्यभार किसने सम्‍भाला ।
(a) गुलजारी लाल नन्‍दा
(b) मोरारजी देसाई
(c)  लाल बहादुर शास्‍त्री
(d) इंदिरा गाँधी
उत्‍तर – गुलजारी लाल नन्‍दा ।

प्रश्‍न 20 – आयकर, केन्‍द्रीय कर , सीमा – शुल्‍क राजस्‍व के द्वारा जुटाया गया धन जाता है।
(a) भारत सरकार को
(b) आकस्मिक निधि में
(c)  संचितनिधि में
(d) ये सभी
उत्‍तर – संचित निधि में ।

प्रश्‍न 21 – पंचायती राज संस्‍थाओं का निर्माण सर्वप्रथम किस राज्‍य ने किया था ।
(a) राजस्‍थान
(b) महारष्‍ट्र
(c)  बिहार
(d) उत्‍तर प्रदेश
उत्‍तर – राजस्‍थान ।

प्रश्‍न 22 – संवैधानिक सरकार का अ‍र्थ है।
(a) संविधान की शर्तों के अनुसार सरकार
(b) कानून के अनुसार सरकार
(c)  लोकतान्त्रिक सरकार
(d) ये सभी
उत्‍तर – ये सभी ।

प्रश्‍न 23 – नगरपालिका कमेटी का प्रधान कहलाता है।
(a) पार्षद
(b) मेयर
(c)  कलेक्‍टर
(d) अध्‍यक्ष
उत्‍तर – अध्‍यक्ष ।

प्रश्‍न 24 –  ग्राम पंचायत के कितने पक्ष है।
(a) 1
(b) 2
(c)  3
(d) 4
उत्‍तर – 3 ।

प्रश्‍न 25 – ग्राम न्‍यायालय कहलाता है।
(a) ग्राम सभा
(b) न्‍याय पंचायत
(c)  ग्राम पंचायत
(d) ग्राम अदालत
उत्‍तर – न्‍याय पंचायत ।

प्रश्‍न 26 – भारत की संसदीय प्रणाली इस सिद्धान्‍त पर कार्य करती है।
(a) बहुमत की जीत
(b) आनुपातिक प्रतिनिधित्‍व
(c)  बहुमत
(d) लोकप्रिय लोकतंत्र
उत्‍तर – बहुमत की जीत ।

प्रश्‍न 27 – निम्‍नलिखित में से कौन सा राजनीतिक शक्ति का मुख्‍य स्‍त्रोत है।
(a) संविधान
(b) जनता
(c)  संसद
(d) संसद एवं राज्‍य विधान मण्‍डल
उत्‍तर – जनता ।

प्रश्‍न 28 – त्रिस्‍तरीय (पंचायती राज एवं नगरीय प्रशासन) प्रशासनिक व्‍यवस्‍था का विरोधी कौन था ।
(a) जवाहरलाल नेहरू
(b) के एम मुंशी
(c)  डॉ भीमराव अम्‍बेडकर
(d) जमुना लाल बजाज
उत्‍तर – डॉ भीमराव अम्‍बेडकर ।

प्रश्‍न 29 – प्रजातंत्र को ‘जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा शासन’ किसने कहा ।
(a) अब्राहम लिंकन ने
(b) जार्ज वाशिंगटन ने
(c)  रूजवेल्‍ट ने
(d) चर्चिल ने
उत्‍तर – अब्राहम लिंकन ने ।

प्रश्‍न 30 – ‘बाल संसद’ छात्रों को व्‍यावहारिक ज्ञान देता है।
(a) अर्थशास्‍त्र का
(b) इतिहास का
(c)  भूगोल का
(d) राजनीति विज्ञान का
उत्‍तर – राजनीति विज्ञान का ।

प्रश्‍न 31 – बोल्‍शेविक क्रान्ति के नायक थे ।
(a) मार्क्‍स
(b) लेनिन
(c)  माओ
(d) स्‍टॉलिन
उत्‍तर – लेनिन ।

प्रश्‍न 32 – राज्‍य की कार्यपालिका शाक्ति किसमें निहित होती है।
(a) मुख्यमंत्री में
(b) राज्‍यपाल में
(c)  मन्त्रिपरिषद् में
(d) राष्‍ट्रपति में
उत्‍तर – राज्‍यपाल में ।

प्रश्‍न 33 – राज्‍य सरकार का कार्यकारी अध्‍यक्ष कौन है।
(a) मुख्‍यमंत्री
(b) राज्‍यपाल
(c)  मुख्‍यमंत्री का सचिव
(d) मुख्‍य सचिव
उत्‍तर – राज्‍यपाल ।

प्रश्‍न 34 – भारतीय राज्‍यों में राज्‍यपाल की नियुक्ति कौन करता है।
(a) संघीय मन्त्रिमण्‍डल
(b) उपराष्‍ट्रपति
(c)  प्रधानमंत्री
(d) राष्‍ट्रपति
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 35 – राज्‍यपाल अपना त्‍यागपत्र किसे देता है।
(a) राज्‍य के मुख्‍यमंत्री को
(b) प्रधानमंत्री को
(c)  संसद को
(d) राष्‍ट्रपति को
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति को ।

प्रश्‍न 36 – निम्‍न में से किसको हटाने का प्रावधान संविधान में नहीं है।
(a) उपराष्‍ट्रपति
(b) राष्‍ट्रपति
(c)  गवर्नर
(d) एटार्नी जनरल
उत्‍तर – गवर्नर ।

प्रश्‍न 37 – उपराज्‍यपाल की नियुक्ति कौन करता है।
(a) राष्‍ट्रपति
(b) प्रधानमंत्री
(c)  उपराष्‍ट्रपति
(d) राज्‍यपाल
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 38 – विधान परिषद का कार्यकाल है।
(a) 6 वर्ष
(b) 7 वर्ष
(c)  4 वर्ष
(d) 5 वर्ष


प्रश्‍न 39 – राज्‍यपाल राज्‍य में किसका प्रतिनिधि होता है।
(a) राष्‍ट्रपति का
(b) गृहमंत्री का
(c)  प्रधानमंत्री का
(d) मुख्‍यमंत्री का
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति का ।

प्रश्‍न 40 – सामान्‍य रूप से राज्‍यपाल का कार्यकाल होता है।
(a) 3 वर्ष
(b) 4 वर्ष
(c)  5 वर्ष
(d) 6 वर्ष
उत्‍तर – 5 वर्ष ।

प्रश्‍न 41 – राज्‍यसभा का सभापति कौन होता है।
(a) उपराष्‍ट्रपति
(b) विपक्ष का नेता
(c)  गृहमंत्री
(d) राज्‍यसभा के सदस्‍यों द्वारा निर्वाचित व्‍यक्ति
उत्‍तर – उपराष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 42 – राजस्‍थान में लोकसभा के लिए निर्वाचित सदस्‍यों की संख्‍या है।
(a) 21
(b) 26
(c)  30
(d) 25
उत्‍तर – 25 ।

प्रश्‍न 43 – प्रधानमंत्री है।
(a) राष्‍ट्र प्रमुख
(b) राष्‍ट्र एवं शासन प्रमुख
(c)  शासन प्रमुख
(d) ये सभी
उत्‍तर – शासन प्रमुख ।

प्रश्‍न 44 – संसद का निर्माण होता है।
(a) लोकसभा एवं राज्‍यसभा दोनो से
(b) राष्‍ट्रपति, लोकसभा एवं राज्‍यसभा से
(c)  सिर्फ लोकसभा से
(d) सिर्फ राज्‍यसभा से
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति, लोकसभा एवं राज्‍यसभा से ।

प्रश्‍न 45 – भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के उदारीकरण की प्रक्रिया करने का श्रेय दिया जाता है।
(a) श्रीमती इन्दिरा गाँधी को
(b) राजीव गाँधी को
(c)  पी वी नरसिंहा राव को
(d) अटल बिहारी वाजपेयी को
उत्‍तर – पी वी नरसिंहा राव को ।

प्रश्‍न 46 – चुनाव आयोग का मुख्‍यालय कहॉ है।
(a) मुम्‍बई में
(b) चेन्‍नई में
(c)  कोलकाता में
(d) दिल्‍ली में
उत्‍तर – दिल्‍ली में ।

प्रश्‍न 47 – भारतीय सेना के तीनों अंगों का प्रमुख होता है।
(a) राष्‍ट्रपति
(b) उपराष्‍ट्रपति
(c)  प्रधानमंत्री
(d) रक्षामंत्री
उत्‍तर – राष्‍ट्रपति ।

प्रश्‍न 48 – भारत में लगभग कितने प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है।
(a) 6 प्रतिशत
(b) 8 प्रतिशत
(c)  10 प्रतिशत
(d) 12 प्रतिशत
उत्‍तर – 8 प्रतिशत ।

प्रश्‍न 49 – सच्‍चर समिति ने किस समुदाय की स्थितियों का जायजा लिया ।
(a) हिन्‍दू
(b) मुस्लिम
(c)  सिख
(d) ईसाई
उत्‍तर – मुस्लिम ।

प्रश्‍न 50 – संविधान के किस अनुच्‍छेद के तहत अनुसूचित जातियों को केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों के अन्‍तर्गत प्रशासनिक सेवाओं में स्‍थान आरक्षित किए गए है।
(a) अनुच्‍छेद 340
(b) अनुच्‍छेद 352
(c)  अनुच्‍छेद 253
(d) अनुच्‍छेद 335
उत्‍तर – अनुच्‍छेद 335 ।
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राजनीति विज्ञान- सम्पन्न वर्ग [Creamy Layer]

Creamy  Layer
Creamy Layer

सम्पन्न वर्ग [Creamy Layer]

इन्दिरा साहनी के बाद (Case) में 16 नवम्बर, 1992 को सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण तो स्वीकार कर लिया परन्तु इस शर्त पर कि इन वर्गों के सम्पन्न वर्गों को इस आरक्षण से वंचित रखा जाये।
सम्पन्न वर्ग या 'क्रीमी लेयर' (Creamy Layer) का अभिप्राय पिछड़े वर्ग के ऐसे सदस्यों से है जो सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में आ चुके है।
इसके अन्तर्गत पिछड़े वर्गों के वे सभी लोग सम्मिलित हैं जिनका व्यापक विकास हुआ है। क्रीमी लेयर में किसी व्यक्ति/वर्ग को सम्मिलित करने का आधार आय के स्त्रोत (Criteria of Income)निश्चित स्थिति (Definite Status) तथा सामाजिक विस्तार की स्थिति को माना गया।

प्रसाद समिति (Prasad Committee)

क्रीमी लेयर की पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर भारत सरकार ने न्यायमूर्ति आरएनप्रसाद (पटना न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश) की अध्यक्षता में क्रीमी लेयर विशेषज्ञ की समिति गठन में गया। इस समिति का समिति गठित इस का फरवरी, 1993 किया गया। इस समिति का उद्देश्य भारत में पिछड़े वर्गों के समृद्ध और सम्पन्न लोगों/वर्गों की एक सूची तैयार करनी थी। प्रसाद समिति ने एक पखवाड़े में यह मानक सूची तैयार कर दी। समिति की सभी सिफारिशों को सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
क्रीमी लेयर की परिभाषा के अनुसार अशांकित व्यक्तियों/वर्गों  को इसमें सम्मिलित किया गया है। इसका आशय यह हुआ कि इन वर्गों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। ये व्यक्ति/वर्ग हैं।
(1) संवैधानिक पदों, जैसे- भारत के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, संघ राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा भारत के सम्प्रेषक और महालेखा परीक्षक आश्रितों (पुत्र, पुत्रीपत्ली) को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
(2) माता-पिता में से यदि कोई एक प्रथम श्रेणी का राजपत्रित अधिकारी हो तो उनके आश्रितों को आरक्षण नहीं प्राप्त होगा;
(3) दोनों अभिभावक द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी हों;
(4) अभिभावकों में से कोई या दोनों सेना में कर्नल पद या उससे ऊपर के पद पर हों अथवा नौसेना या वायुसेना या अर्ध सैनिक बलों में इसके समकक्ष पद पर हों;
(5) जिन परिवारों के स्वामित्व में राज्य भूमि हदबन्दी कानून (State Land Ceiling Act) के अन्तर्गत अधिकतम 85% भूमि सिंचित हो;
(6) जिन व्यक्तियों की सकल वार्षिक आय (वेतन या कृषि भूमि से होने वाली आय को छोड़कर) एक लाख रुपये या इससे अधिक हो;
(7) जिन व्यक्तियों के पास लगातार संपत्ति कर कानून में निर्धारित संपत्ति से अधिक संपत्ति हो।
वर्तमान समय में 'क्रीमी लेयर' में पिछड़े वर्ग के उन सदस्यों को शामिल किया जाता है जिनकी वार्षिक आय 6 लाख से अधिक है।
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राजनीति विज्ञान- मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग

मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग
मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग

मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग [M. P. Backward Class Commission]

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 16 नवम्बर1992 को दिये गये निर्णय के परिप्रेक्ष्य में मार्च1993 में मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया
गया। 29 जून, 1995 में इसे अधिनियम के माध्यम से वैधानिक रूप प्रदान किया गया।
संगठन (Composition)- मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम1955 की धारा (2) के अनुसार आयोग में 3 शासकीय सदस्य होंगे। ये सभी ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें पिछड़े वर्ग से सम्बन्धित मामलों में विशेष ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो। इन्हीं में से एक आयोग का सदस्य होगा। सदस्यों में से कम-सेकम एक सदस्य पिछड़े वर्ग का होना चाहिए। इसके अतिरिक्त संचालक, पिछड़ा वर्ग कल्याणआयोग के शासकीय सदस्य होंगे।
अधिनियम की धारा 5 (1) के तहत् आयोग में एक सचिव तथा उसके अधीन अन्य अधिकारी और कर्मचारी होते हैं।
कार्य और शक्तियाँ (Punctions and Powers)-अधिनियम के अनुसार आयोग के कार्य और शक्तियाँ निम्नांकित हैं ;
(1) संविधान अथवा सामान्य विधि द्वारा पिछड़े वर्ग के लोगों को दिये गये संरक्षण को दिशा में प्रयास करना;
(2) पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए बने कार्यक्रमों के समुचित तथा यथासमय कार्यान्वयन की निगरानी करना एवं ऐसे कार्यक्रमों को अधिक प्रभावशाली बनाने हेतु सुझाव देना;
(3) लोक सेवाओं तथा शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के सम्बन्ध में सुझाव देना;
(4) सूची किसी वर्ग को शामिल करने के प्रार्थना-पत्र पर विचार करना। आयोग इस बारे में भी परामर्श देगा कि कौन-से वर्ग पिछड़े वर्गों की सूची से निकाल दिये जायें;
(5) पिछड़े वर्गों में शामिल वर्गों में से इस बात की पहचान करना जो सम्पन्न वर्ग (Creamy Layer) में आते हों; तथा
(6) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो राज्य सरकार द्वारा इसे सौंपे जायें।
उल्लेखनीय है कि सन् 2011 की जनगणना मध्य प्रदेश की कुल के अनुसार जनसंख्या 7,25,97,565 है। इसमें से अनुमानत: आधी जनसंख्या पिछड़े वर्ग में आती है। मध्य प्रदेश के 27 ऐसे जिले हैं जिनकी आधी से अधिक जनसंख्या पिछड़े वर्ग की है।
आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों की शिकायतों की सुनवाई भी की जाती है।
पिछड़े वर्ग की सूची में किसी जाति का नाम सम्मिलित करने हेतु निर्धारित आवेदन पत्र में आवेदन करना होता है।
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राजनीति विज्ञान- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

राष्ट्रीय पिछड़े वर्ग आयोग
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग [National Commission for Backward Classes]

भारत सरकार द्वारा पिछड़े वर्गों की पहचान और इनके निमित्त कल्याणकारी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने हेतु सन् 1993 में 'राष्ट्रीयपिछड़ा वर्ग अधिनियम1993' के तहत् एक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का निर्णय लिया गया उल्लेखनीय है कि इन्दिरा साहनी बनाम अन्य के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने संघ और राज्य सरकारों से एक ऐसे आयोग के गठन को कहा था जो इस बात का परीक्षण कर सके कि किन जातियों को इन वर्गों में शामिल किया जाना चाहिए या किन जातियों को इससे बाहर कर देना चाहिए। इस निर्णय के तारतम्य में ही सरकार द्वारा उपर्युक्त अधिनियम पारित किया गया। प्रथम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन जस्टिस आरएन. प्रसाद की अध्यक्षता में किया गया।
संगठन (Composition)- आयोग में केन्द्र द्वारा निर्देशित निम्नांकित सदस्य होंगे-
(क) अध्यक्ष जो उच्चतम या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो; और (ख) आयोग के सदस्यों में एक समाज विज्ञानी, दो ऐसे सदस्य जो पिछड़े वर्ग के मामलों में विशेष अनुभव रखते हों, एक सदस्य जो भारत सरकार के सचिव स्तर का पदधारक हो या रहा हो। इस प्रकार आयोग में कुल 5 सदस्य होते हैं।
कार्यकाल (Tenure)- आयोग का कार्यकाल 3 वर्ष होता है। इसके पूर्व भी कोई सदस्य केन्द्र सरकार को सम्बोधित पत्र द्वारा अपने पद से इस्तीफा दे सकता है।
आयोग के कार्य (Functions of the Commission) -आयोग के तीन प्रमुख कार्य है-
(1) किसी जाति या वर्ग विशेष के इस अनुरोध की जाँच करना कि उसे पिछड़े वर्ग में शामिल कर लिया जाये;
(2) यदि पिछड़े वर्ग की कोई जाति या वर्ग अपेक्षाकृत विकसित हो गया है तो इसे सूची से निकालने के लिए सरकार को राय देना;
(3) पिछड़े वर्गों से सम्बन्धित किसी मसले पर केन्द्र सरकार को परामर्श देना।
आयोग की सिफारिशें केन्द्र के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।
शक्तियाँ (Powers)- आयोग की धारा 9 (1) के अनुसार अपने में निहित दायित्वों का निर्वहन करते समय आयोग को निम्नांकित शक्तियाँ प्राप्त होंगी
(1) भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को आहूत (Summon) करना;
(2) किसी दस्तावेज को अपने सामने प्रकट करवाना
(3) हलफनामे पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(4) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी सरकारी अभिलेख की माँग करना;
(5) साक्ष्यों और दस्तावेजों का परीक्षण करना।
सचिवों का केन्द्र सरकार द्वारा समय-समय परीक्षण पर (Review of list by Central Government from Time to Time)- केन्द्र द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों की सूची का हर 10 वर्ष पर पुनरीक्षण किया जाता है। पुनरीक्षण के उपरान्त कुछ जातियों को इस सूची से निकाला जा सकता है और कुछ को जोड़ा जा सकता है।
मार्च 2017 में मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के स्थान पर एक नया आयोग बनाने का निर्णय लिया है।
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राजनीति विज्ञान- पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण
Reservation for Backward classes

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण (Reservation for Backward Classes]

प्रधानमन्त्री वी. पी. सिंह ने 7 अगस्त, 1990 को संसद के दोनों सदनों में घोषित किया कि भारत सरकार की सेवाओं और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में पिछड़े हुए वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। प्रधानमन्त्री ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। 13 अगस्त, 1990 को इस सम्बन्ध में सरकारी अधिसूचना जारी की गई।
युवा आन्दोलन (Youth Movement)-मण्डल आयोग की रिपोर्ट पर प्रारम्भ से ही तीव्र विवाद था। लोगों का यह मानना था कि शासन द्वारा पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण देने का निर्णय एकतरफा और आकस्मिक था। यह बात भी स्पष्ट हो गई कि शासन द्वारा लिया गया यह निर्णय राजनीतिक कारणों से प्रेरित था। इसने भावुकता भरे युवा आन्दोलन को जन्म दिया। आन्दोलन के विरोध की तीव्रता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि आरक्षण के विरोध में 150 से अधिक युवाओं ने आत्मदाह की कोशिश की, कुल 63 लोगों की जानें गई।
मण्डल आयोग की सिफारिशें कानूनी पचड़े में भी फस गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अक्टूबर, 1990 को मण्डल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वयन पर स्थगन आदेश जारी कर दिया।न्यायालय ने यह कहा कि सम्बन्धित अधिसूचना को स्थगित किया जाता है लेकिन सरकार
इसके अन्तर्गत लाभान्वित होने वाली जातियों को चिन्हित करने का काम कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद आन्दोलन स्थगित हो गया।

नरसिम्हा राव सरकार की घोषणा (Announcement by Narsimha Rao Government)

25 सितम्बर, 1991 को नरसिम्हा राव सरकार ने घोषणा की कि पिछड़े हुए वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जायेगा। इसके साथ ही यह भी घोषित किया गया कि अब आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा।
सरकार की इस घोषणा को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। इस प्रकरण पर 16 नवम्बर, 1992 को दिये गये निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "दो वर्ष पूर्व राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार द्वारा अन्य पिछड़ी जातियों के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण का जो आदेश लागू किया गया था वह वैध और लागू करने योग्य हैं।" परन्तु इसी के साथ न्यायालय ने इसमें पाँच नये बिन्दु जोड़ दिये-
(1) पिछड़ी जातियों के सम्पन्न व्यक्तियों (Creamy Layer) को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा;
(2) अधिकतम आरक्षण कुल स्थानों का 50% हो सकता है;
(3) आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण की नरसिंह राव सरकार की नीति असंवैधानिक है।
(4) आरक्षण केवल नौकरियों में होगा पदोन्नति में नहीं;
(5) सरकार एक आयोग का गठन करे जो यह पता लगाये कि किन-किन जातियों या लोगों मिलना । गैर-हिन्दुओं, सिक्खों तथा ईसाइयों में भी यह पता लगाया जाना चाहिए।

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू (Reservation Implemented for Backward Classes)

केन्द्र सरकार द्वारा 8 सितम्बर, 1993 से आरक्षण की व्यवस्था लागू कर दी गई। सरकार ने यह निर्धारित किया कि पहले चरण में उन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलेगा जिनके नाम मण्डल आयोग की सूची और राज्य सरकार की सूची दोनों में सम्मिलित हों। ऐसी जातियों की संख्या लगभग 1200 है।
केन्द्र सरकार द्वारा आरक्षण की व्यवस्था लागू किये जाने के उपरान्त राज्यों द्वारा भी इसे लागू किया गया। कुछ राज्यों पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पहले से ही लागू था। विभिन्न राज्यों में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण  भिन्न-भिन्न है। उत्तर प्रदेश में यह 27 प्रतिशत तो मध्य प्रदेश में यह 14 प्रतिशत है।आरक्षण की कोई समय-सीमा नही निर्धारित की गई है।

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राजनीति विज्ञान- पिछड़ा वर्ग आयोग

पिछड़ा वर्ग आयोग
Backward class commission

पिछड़ा वर्ग आयोग [Backward Class Commission]

      युगों से भारतीय समाज मे चले आ रहे सामाजिक विभेद के दोषों को दूर करने तथा समाज मे व्याप्त ऊँच-नीच की भावना को समाप्त करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए एक ऐसे मानक का निर्धारण करना चाहा परिणामस्वरूप ऐसे वर्षों के सदस्यों को विशेष सुविधा देकर उनकी हीनभावना और पिछड़ेपन को दूर किया जा सके।
     इस पष्ठभूमि में अनुच्छेद 340 द्वारा प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की नियुक्ति की।

काका कालेलकर आयोग (Kaka Kalelkar commission)

काका कालेलकर आयोग का गठन राष्ट्रपति द्वारा 29 जनवरी1953 को किया गया। आयोग के द्वारा अपनी रिपोर्ट सन 1955 में प्रस्तुत की गई। आयोग को उन मानकों के निर्धारण का दायित्व सौंपा गया था जिनके आधार पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े उन वर्गों की पहचान की जा सके जिन्हें पिछड़े वर्ग में शामिल किया जा सके और पिछड़े वर्गों को एक सूची तैयार की जा सके।
आयोग को पिछड़े वर्ग की कठिनाइयों और समस्याओं की पहचान का दायित्व भी सौंपा गया। आयोग ने इस दायित्व को पूरा करने में 2 वर्ष का समय लगाया। आयोग ने 2,399 जातियों और समुदायों की सूची तैयार की। आयोग ने वर्गों की पहचान लिए निम्नांकित मानक निर्धारित किये-
(1) जातिगत संरचना में जाती की निम्न स्थिति;
(2) जाति के सदस्यों में शैक्षिक प्रगति का अभाव;
(3) सरकारी सेवाओं में जाति का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व; तथा
(4) व्यापार, वाणिज्य और उद्योग के क्षेत्र में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व।
पिछड़े वर्ग की सूची बनाने में आयोग ने जाति को ही प्रमुख आधार माना। आयोग का मत था कि जातिग्रस्त समाज की समस्याओं का निराकरण सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर वर्गों को बढ़ावा देकर किया जा सकता है।

आयोग की संस्तुतियाँ (Recommendations of the Commission)

यद्यपि आयोग के पास पर्याप्त आंकड़े नहीं फिर भी आयोग ने निम्नांकित संस्तुतियाँ कीं
(1) कम-से-कम 256 स्थान पिछड़े वर्गों के लिए प्रथम श्रेणी की सेवाओं में आरक्षित किये जायें।
(2) द्वितीय श्रेणी सेवाओं में न्यूनतम 33.5% स्थान आरक्षित किये जायें।
(3) तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी की सेवाओं में न्यूनतम 40% स्थान आरक्षित किये जायें
(4) तकनीकी शिक्षामेडिकल तथा वैज्ञानिक पाठ्यक्रमों में न्यूनतम 70% स्थान पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित किये जायें,
(5) आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए एक अलग मन्त्रालय बनाने की सिफारिश की गई।
यह सहज ही दृष्टव्य है कि कालेलकर आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का आधार जाती को बनाया। आयोग ने विभिन्न जाति -समूहों के पिछड़े भाग का पता नहीं लगाया। भारत सरकार ने आयोग के इस दृष्टिकोण को ठुकरा दिया। आयोग के 11 सदस्यों में से पांच ने आयोग के इस नजरिये से असहमति प्रकट की। भारत सरकार ने यह महसूस किया कि आयोग ने बहुत बड़ी जनसंख्या को पिछड़े वर्ग की सीमा में समाहित कर लिया है।
कालेलकर आयोग की रिपोर्ट को निरस्त करते हुए भारत सरकार ने राज्य सरकारों को पिछड़े वर्ग की पहचान करने हेतु सर्वेक्षण कराने और इन वर्गों को सुविधाएँ उपलब्ध कराने को कहा। सन 1961 में केन्द्र सरकार ने यह निर्णय लिया कि वह पिछड़े वर्गों की कोई सूची नहीं तैयार करेगी
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों की पहचान का जो मानक प्रस्तुत किया गया, वह व्यावहारिक नही सिद्ध हुआ। जिन उद्देश्यों को लेकर इस आयोग का गठन किया गया था, उसकी पूर्ति करने में यह असफल रहा।

मण्डल आयोग (Mandal Commission)

सन् 1977 में जनता पार्टी की सरकार केन्द्र में सत्तारूढ़ हुई। जातीय असमानताओं को निर्धारित करने तथा कमजोर वर्गों के उन्नयन के लिए तथा पिछड़े वर्ग की एक सामान्य परिभाषा निर्धारित करने के लिए इसके द्वारा एक नये पिछड़ा वर्ग आयोग की नियुक्ति की गई।
1 जनवरी 1979 को राष्ट्रपति द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री वी. पी. मण्डल की अध्यक्षता में गठित इस आयोग के अन्य सदस्य थे-एल. आर.नायक, दीवान मोहन लाल, न्यायमूर्ति आर.एस.भोला तथा के. सुब्रह्मण्यम। आयोग के अध्यक्ष सहित सभी सदस्य पिछड़ी जातियों के थे।
आयोग को सरकार द्वारा निम्नांकित दायित्व सौंपे गए- 
(1) सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्गों को परिभाषित करने हेतु कसौटी या मानक निर्धारित करना;
(2) पिछड़े वर्गों के समुचित विकास हेतु उठाये जाने को वाले कदमों की सिफारिश करना, तथा
(3) केन्द्र, राज्यों तथा संघशासित क्षेत्रों को उन सेवाओं में आरक्षण की सम्भावना की जाँच करना जिनमें पिछड़े वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त हुआ है।

मण्डलआयोग की सिफारिशें (Recommendations of Mandal Commission)-

आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 दिसम्बर, 1980 को भारत सरकार को सौंपी, जिसे सरकार ने 30 अप्रैल1982 को संसद में प्रस्तुत किया। आयोग ने पिछड़ी जातियों को परिभाषित किया तथा उनकी पहचान के लिए मानदण्ड करते हुए 3,743 जातियों पिछड़ी घोषित किया।
आयोग की मुख्य सिफारिशें निम्नवत् थीं-
(1) सम्पूर्ण पिछड़े वर्गों की जनसंख्या 52 प्रतिशत है और इसके इसी अनुपात में आरक्षण किया जाना उचित है परन्तु संविधान के अनच्छेद 15 (4)और 16 (4) के प्रसंग में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक स्थान आरक्षित नहीं किये जा सकते। चूंकि 22.5 प्रतिशत पहले ही अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित हैं अत: पिछड़ी जातियों की आबादी 52 प्रतिशत होने इनके लिए 27% स्थान सेवाओं में आरक्षित किये जाने चाहिए। पिछड़े वर्ग के जो अभ्यर्थी सामान्य अभ्यर्थियों के बराबर अंक प्राप्त करें उन्हें आरक्षित कोटे में न माना जाये;
(2) सरकारी नौकरियों में पहले से कार्यरत पिछड़े वर्ग के लोगों को पदोन्नति में भी 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।
(3) यदि आरक्षित सीटें न भर पायें तो इन्हे 3 वर्षों तक कायम रखा जाये।
(4) आयु सीमा में पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों को अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के बराबर छूट दी जाए।
(5) 27% आरक्षण राज्य सरकार, राज्य सरकार के अधीन सार्वजनिक क्षेत्रों, केन्द्र सरकार के अधीन सरकारी क्षेत्रों तथा बैंकों की नियुक्तियों में लागू हो।
(6) निजी क्षेत्र के उन उद्योगों में भी पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था हो जिन्हें राज्य से अनुदान मिलता है, तथा
(7) पिछड़े वर्गों के लिए विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में प्रवेश में आरक्षण होना चाहिए।
समीक्षा (Evaluation)—प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग अर्थात् काका कालेलकर आयोग का प्रतिवेदन बहुत अधिक आलोचना का विषय नहीं बना था। इसे न तो क्रियान्वित किया गया और न ही इसे सरकार ने स्वीकार किया। यद्यपि कालेलकर आयोग ने भी जाति को ही पिछड़ेपन का द्योतक माना था फिर भी इसका यह मत था कि व्यक्ति और परिवार को पिछड़ेपन का आधार माना जाना चाहिए। कालेलकर आयोग ने इस बात पर भी बल दिया था कि जाति की कसौटी के अतिरिक्त निर्धनता, मकान और व्यवसाय आदि के पिछड़ेपन को आंकने में महत्वपूर्ण कारक है। इसके विपरीत मण्डल आयोग ने केवल जाति को ही पिछड़े वर्गों का आधार माना और इसी के
उन्हें आरक्षण देने की सिफारिश की। मण्डल आयोग की दृष्टि में व्यक्ति की जाति ही उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का निर्माण करती है।
जनता की मण्डल आयोग की सिफारिशों को लेकर कटु प्रतिक्रिया हुई। उत्तर प्रदेश तथा बिहार में आयोग की सिफारिशों को लेकर कटु प्रतिक्रियाएँ हुईं और तमाम हिंसात्मक घटनाएँ हुई।

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राजनीति शास्त्र- पिछड़े वर्गों का विकास

पिछड़े वर्गों का विकास
राजनीति विज्ञान

पिछड़े वर्गों का विकास (Development of Backward Classes)

"हम यह अनुभव करते हैं कि पिछड़ेपन के लक्ष्य और कामचलाऊ परिभाषा के अभाव में विशेषाधिकारों के लिए जन्म पर आधारित पिछड़े समुदाय बढ़ते जा रहे हैं। एक भूमिहीन श्रमिक को, बिना यह देखे कि वह किस समुदाय का है, सहायता की आवश्यकता है। यही सिद्धान्त बेघरबार, बेरोजगार, अज्ञानी तथा बीमार व्यक्ति पर लागू होता है।"                               -रेणुका अध्ययन दल की एक टिप्पणी
भारतीय संविधान जैसा कि प्रस्तावना से स्पष्ट है, एक सम्प्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना को अपना उद्देश्य घोषित करता है। यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को अपना उद्देश्य मानता है जिसमें हर व्यक्ति की सत्ता में भागीदारी हो। संविधान सभा में इस बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ कि समाज के कमजोर या पिछड़े वर्गों को सामान्य जनों के लगभग समकक्ष लाकर ही एक समतावादी समाज के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है

पिछड़े वर्ग का अभिप्राय (Meaning of Backward Class)

पिछड़े वर्गों में दो प्रकार की जातियों को सम्मिलित कियाजाता है- (क) अनुसूचित जाति तथा जनजाति तथा (ख) अन्य पिछड़े वर्ग। 
जो वर्ग विकास की दौड़ में पीछे हैं परन्तु जिन्हें अनुसूचित जाति या जनजाति की सूची में नहीं शामिल किया गया है, इन्हें ही अन्य पिछड़े वर्ग या Other BackwardClasses (OBC) कहा जाता है। संविधान में कई स्थानों पर 'कमजोर वर्ग' (weaker sections) वाक्यांश शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि संविधान निर्माता इस कोटि में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य वर्गों को रखना चाहते थे किन्तु उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये वर्ग कौन-से होंगे?
सुभाष कश्यप द्वारा सम्पादित राजनीति कोश के अनुसार, "पिछड़े हुए वर्गों का अभिप्राय समाज के उस वर्ग से है जो सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक निर्योग्यताओं के कारण समाज के अन्य वर्गों की तुलना में समाज के निचले स्तर पर हों। संविधान में दो स्थानों (अनुच्छेद 16 एवं अनुच्छेद 340) पर इसका प्रयोग हुआ है परन्तु इसे परिभाषित किया गया है।"
       पिछड़े वर्गों या अन्य पिछड़े वर्गों को न तो अनसचित जाति की श्रेणी में रखा जा सकता है और न ही अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में और न ही इन्हें अपने आप में कोई भी माना जा सकता है। आम तौर पर इन्हें एक ऐसा कमजोर वर्ग माना जा सकता है जिसके सदस्य उच्च जाति समूहों से नीचे और निम्न जातियों से उच्च होते हैं। वस्तुत: पिछड़े वर्ग से अभिप्राय उच्च और निम्न जाति समूहों के मध्य स्थिति समूह से है जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हैं। सरकार द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (Socially Educationally Backard classes) को पिछड़े वर्ग की श्रेणी में रखा गया है।

पिछड़े वर्ग की मुख्य विशेषताएं (Main Characteristics of Backard Classes)

पिछड़े वर्गों की सामान्यतया निम्नांकित विशेषताएं बतायी जा सकती हैं
(1) पिछड़े वर्ग का आशय उन वर्गों से किया जाता है जो उच्च जातियों से निम्न और निम्न जातियों के मध्य में होती हैं।
(2) पिछड़े वर्ग प्राय: लघु भू-स्वामी हैं अथवा छोटी नौकरियों में हैं।
(3) मात्रात्मक या संख्यात्मक दृष्टि से पिछड़े वर्गों का आधिक्य है परन्तु इनमें इतनी जातियाँ हैं कि इनमें सांस्कृतिक दृष्टि से समेकता नहीं पायी जाती।
(4) अन्य जातियों की तरह पिछड़े वर्ग की सदस्यता भी जन्म से निर्धारित होती है।
(5) भारतीय संविधान पिछड़ेपन का आधार सामाजिक और शैक्षणिक मानता है।
(6) घोषित पिछड़ी जातियाँ सरकार द्वारा प्रदत्त लाभों और सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अधिकृत है। यही कारण है कि समय-समय पर तमाम जातियाँ यह माँग करती रहती है कि उन्हें पिछड़े वर्ग में सम्मिलित किया जाये, तथा
(7) पिछड़े वर्गों को अन्य वर्षों के बराबर लाने के लिए नौकरियों में आरक्षण किया गया है। ।

संवैधानिकप्रावधान (ConstitutionalProvisions)

जैसा कि ऊपर भी उल्लेख किया है कि संविधान में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन जातियों या वर्षों को पिछड़े वर्गों में सम्मिलित किया जायेगा। ऐसी स्थिति में यह केन्द्र तथा राज्य सरकार के ऊपर है कि वह किन वर्गों/जातियों को इस श्रेणी में सम्मिलित करती है।
अनुच्छेद 15 (4) के अन्तर्गत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के लिए विशेष प्रावधान करने हेतु अधिकृत किया गया है।
अनुच्छेद 16 (4) के अन्तर्गत राज्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह इस वर्ष के लिए सरकारी सेवाओं में स्थान आरक्षित कर सकती है।
अनुच्छेद 340 (1) के अन्तर्गत राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्गों की दशाओं तथा उनकी कठिनाइयों के अनुसंधान के लिए एक आयोग को नियुक्ति करने की शक्ति प्राप्त है। आयोग जगत वर्षों की कठिनाइयों को दूर करने के उपायों के बारे में या
लिये दिये जाने वाले अनुदान या अनुदान की शतों आदि के बारे में सत्र या राज्य सरकारों को अपनी सिफारिश भेजेगा। राष्ट्रपति आयोग द्वारा प्रेषित सिफारिशों को, उन पर की गई कार्यवाहीसहित संसद के समक्ष रखवायेगा।
चूंकि पिछड़े वर्गों को संविधान द्वारा सूचीबद्ध नहीं किया गया है और इस संदर्भ में द्वारा भिन्न-भिन्न सूचियों का निर्माण किया गया है।
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राजनीति विज्ञान- आवश्यकता एवं महत्व

राजनीति विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता एवं महत्व
राजनीति विज्ञान

राजनीति विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता एवं महत्व

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि राजनीति के अध्ययन की क्या आवश्यकता एवं महत्व है? तमाम ऐसे विचारक है जिन्होंने इसे "स्वार्थ निरर्थक, निष्फल, अनावश्यक और हानिप्रद" बताया है। बर्फीले के शब्दों में "राजनीतिक तत्व-चिंतन करने वाले दार्शनिक उन व्यक्तियों के समान है जो पहले तो पैरों से धूल उड़ाते है और बाद में यह कहते है कि उन्हें कुछ नही दिखाई देता।" लेजली स्टीफेन ने लिखा है "वे देश सौभाग्यशाली है जिनके पास कोई राजनीतिक दर्शन नही है क्योंकि ऐसा तत्व-चिंतन प्रायः निकट भविष्य में होने वाली क्रांति का सूचक होता है।" इसीप्रकार एकबार फिर एडमंड बर्क ने कहां , "जब लोगों में राजनीतिक सिद्धांत बनाने की प्रवत्ति उत्पन्न हो तो यह समझ लेना चाहिए कि राज्य का संचालन ठीक प्रकार से नही हो रहा है।"
आलोचकों का मानना है कि राजनीति विज्ञान एक सैद्धान्तिक विषय है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसका सम्बन्ध कानूनी कल्पनाओं तथा निरपेक्ष धारणाओं से है ; यह विवादास्पद प्रश्नों का सही उत्तर दे सकने में असमर्थ है। यह कहा जाता है कि राजनीति सिद्धान्तों की विवेचन और शासनकार्य का संचालन दो भिन्न-भिन्न कार्य हैं। यह देखा गया है कि अच्छे शासक अच्छे विचारक नहीं होते और अच्छे विचारक अच्छे शासन नहीं होते। 
परन्तु यह सिक्के का मात्र एक पहलू है। अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान की भी अपनी निश्चित उपयोगिता है। आशीर्वादम के शब्दों में, "यह राजनीतिक पर शब्दावली के अर्थ को सटीक और निश्चित बताता है। इतिहास के साथ एकीकरण में मात्रा में यह सहायक उपकरण हो सकता है। वर्तमान राजनीति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को समझने के लिए राजनीतिक विचारों का ज्ञान, अमूल्य सहायता प्रदान करता है। यदि मानवीय कौशल से सरकार का निर्माण और सुधार हो सकता है तो राजनीतिक सिद्धान्त के अध्ययन से बढ़कर कोई अन्य अध्ययन मूल्यवान नहीं हो सकता।"
राजनीति विज्ञान मूलतसंगठित मानव समाज और इसमें मनुष्य की भूमिका के अध्ययन विज्ञान से सम्बन्धित है। चूंकि संगठित मानव समाज की स्थापना के लिए एक व्यवस्था निर्माणकारी का होना आवश्यक है अतएव इसके अन्तर्गत राज्य और सरकार का अध्ययन स्वत: समाहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें तमाम राजनीतिक संस्थाओं संविधान, शासन के प्रकारों आदि का अध्ययन स्वत: समाहित हो जाता है। हाल के वर्षों में व्यवहारवादी क्रान्ति के चलते इसमें राजनीतिक गतिविधियों तथा राजनीतिक प्रक्रिया का अध्ययन भी सम्मिलित हो गया है। इन सबके अध्ययन का उद्देश्य मनुष्य को सभ्य और सुसंस्कृत बनाना है। प्रसिद्ध यूनानी चिन्तक अरस्तू का मानना है कि राज्य ही मनुष्य को सद्गुणी बना सकता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के लिए राजनीति विज्ञान का अध्ययन अपरिहार्य है और इस रूप में इसकी उपयोगिता स्वयं सिद्ध है। 
राजनीति विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता और महत्व की विवेचना निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है :

1. राज्य के विकास और उपयोगिता की ज्ञान (Knowledge of Development and Utility of state)-

राज्य और सरकार हमारे सामाजिक जीवन की अति महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। इनका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव है। हमारे अधिकांश कार्य राजकीय नियमों द्वारा नियन्त्रित होते हैं राजनीति विज्ञान के अध्ययन से व्यक्ति राज्य और सरकार के भूत और वर्तमान स्वरूप से परिचित होता है। अपने इसी ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वह सरकार के कार्यों में न केवल सहभागी बन सकता है वरन् सरकार के कार्यों का बेहतर मूल्यांकन भी कर सकता है। उच्चतर राजनीतिक जिनका चेतना राज्य के बेहतर संचालन में मददगार होती है।

2. सामान्य राजनीतिक अवधारणाओं से परिचय (Acuaintance the Political Concepts)-

राजनीति विज्ञान के अध्ययन से व्यक्ति तमाम ऐसी राजनीतिक अवधारणाओं से भली-भांति परिचित हो जाता है जिनका नाम तो वह दैनिक जीवन में सुनती है । परन्तु उन्हें भली-भाँति समझता नहींजैसे-लोकतन्त्रसम्प्रभुता, एकता और अन्य और हित समूह, जनमत आदि। इसका एक बड़ा लाभ यह भी है कि व्यक्ति जोशीले नेताओं के हाथों बेवकूफ नहीं बनता। राजनीति विज्ञान के अध्ययन से एक जागरूक इन्सान का जन्म होता है जो लोकतन्त्र या किसी भी शासन की सफलता की पहली शर्त है।

3. आदर्श नागरिक का निर्माण-

 राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता एक आदर्श नागरिक के निर्माण की। नागरिक की शिक्षा राजनीति, कानून,
नागरिक सेवा आदि की अनिवार्य जानकारी का आग्रह करती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जानना चाहिए। उसे सरकार के स्वरूप कार्यप्रणाली तथा उद्देश्यों के बारे में भी जानकारी रखनी चाहिए। यह जानकारी उसे राजनीति विज्ञान से मिलती है।

4. सहयोग और समायोजन की शिक्षा (Education of Co-operation and Adjusment)-

राजनीति विज्ञान सहयोग, समायोजन और सामंजस्य की शिक्षा देता है। राजनीति को शक्ति के लिए संघर्ष माना जाता है। परन्तु संघर्ष के इस वातावरण में येनकेन प्रकारेण सामंजस्य की स्थापना भी की जाती है। राजनीति विज्ञान का अध्ययन व्यक्ति को एक दूसरे दृष्टिकोण समझाने और तदनुकूल निर्णय लेने की बेहतर क्षमता प्रदान करता है। यथार्थ में, राजनीति विज्ञान संघर्ष के साथ-साथ सामंजस्य और सहिष्णुता का भी अध्ययन करता है।

5. राजनीतिक चेतना के विकास में सहायक (Helpful in the Growth political Consciousness)-

राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है यह मनुष्य को राजनीतिक दृष्टि से चैतन्य बनाता है। व्यक्ति एक राजनीतिक प्राणी है, अर्थात व्यक्ति की कुछ आवश्यकताएं ऐसी हैं जिनकी पूर्ति सिर्फ राज्य द्वारा ही की जा सकती है। परन्तु इसी से समानान्तर व्यक्ति में यह एहसास होना भी आवश्यक है कि राजनीतिक व्यवस्था के प्रति उसके कुछ दायित्व है जिनकी पूर्ति पर व्यवस्था का सम्यक परिचालन निर्भर है। राजनीतिक जागरूकता इस वर्ष में भी महत्वपूर्ण है कि इसके द्वारा राजनेताओं पर नियंत्रण का कार्य तो सम्पन्न होता ही है। इसके कारण ही निर्वाचन के दौरान जनमानस सही प्रत्याशी के चयन में समर्थ होता है।
कुल मिलाकर राजनीति विज्ञान का अध्ययन और भी महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि राजनीति से व्यक्ति का साबका (संपर्क)  प्रारम्भ से अंत तक पड़ता है। रोबर्ट एण्डल ने लिखा है, "एक नागरिक का सरकार, कस्बे, स्कूल, चर्च, ट्रेड यूनियन, क्लब, राजनीतिक दल, नागरिक समुदाय तथा इसी प्रकार के अन्य के समुदायों स्तर पर राजनीति से सामना होता है। राजनीति मानव-अस्तित्व का अपरिहार्य तत्व है। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में राजनीति में रत है।" राजनीति विज्ञान का ज्ञान संविधान निर्माताओ, विधायकों, कार्यपालकों तथा न्यायधीशों को अवश्य होना चाहिए, क्योंकि इन्हें स्थिति विशेष के संदर्भ में नियमों का निर्माण और पालन करवाना होता है। वैसे राजनीति विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता और उपयोगिता सभी के लिए है, जैसा कि हरिदत्त वेदालंकार ने लिखा है, ".......इसके अध्ययन से हमे अतीत का ज्ञान, वर्तमान का परिचय और उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का सामर्थ्य मिलता है, राजनीति प्रश्नों को समझने और समाधान करने की दिव्य दृष्टि मिलती है, प्रसिद्ध विचारकों के विचारों के अनुशीलन से अपूर्व बौद्धिक आनंद उपलब्ध होता है।"
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