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इतिहास: बिन्दुसार - अशोक का साम्राज्य [BINDUSAR - ASHOKA]

[BINDUSAR - ASHOKA]
बिन्दुसार-अशोक 

बिन्दुसार (298 ई.पू.- 273 ई.पू.) [BINDUSAR (298 B.C.-273 B.C.)]

बिन्दुसार मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था। चन्द्रगुप्त के पश्चात् 298 ई.पू. में वह मगध के राजसिंहासन पर आसीन हुआ। बिन्दुसार के प्रारम्भिक जीवन के विषय भी अत्यन्त अल्प जानकारी उपलब्ध है। जैन ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि उसकी माता का नाम दुर्धरा था। तिब्बती लामा तारानाथ के विवरण से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार का प्रधानमंत्री चाणक्य ही था। किन्तु बाद में खल्लाटक व भी उसके प्रधानमंत्री रहे। बौद्ध ग्रन्थ  दिव्यावदान से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार की परिषद में 500 सदस्य थे, जो शासन कार्य में राजा की सहायता करते थे।
बिन्दुसार ने अपने पिता से प्राप्त सम्पूर्ण साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखा। उसके शासनकाल में उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में दो बार विद्रोह हुआ। उसका पुत्र सुसीम, जो तक्षशिला का सूबेदार था, विद्रोह को दबाने में सफल न हुआ। तब बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को, जो उस समय उज्जैन का सूबेदार था, तक्षशिला भेजा। अशोक ने सफलतापूर्वक विद्रोह को शान्त किया।
बिन्दुसार ने अपने पिता को भाँति शान्तिपूर्ण वैदेशिक नीति का पालन करते हुए अन्य देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रखे। बिन्दुसार के समकालीन यूनानी राजाओं ने भी भारत के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखे। स्ट्रैबो के अनुसार सेल्यूकस के उत्तराधिकारी एण्टियोकस ने डायमेकस नामक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।
एथिनियस नमक एक यूनानी विद्वान ने लिखा है कि भारतीय शासक बिन्दुसार ने सीरिया के शासक एन्टीयोकस से अंगूर की शराब, सूखी अंजीर व एक दार्शनिक को भेजने का निवेदन किया था। सीरिया के शासक ने अंजीर और शराब भेज दी और यह लिख भेजा कि यूनानी कानून के अनुसार दार्शनिकों का विक्रय सम्भव नहीं है।
इस विवेचन से बिन्दुसार के विदेशों से सम्बन्धों के अतिरिक्त यह भी ज्ञात होता है कि बिन्दुसार की दर्शन में अभिरुचि थी। बिन्दुसार को मृत्यु 273 ई.पू.में हुई थी।

अशोक (269 ई. पू.-232 ई.पू.) [ASHOKA (269 B.C.-232 B.C.)]

 अशोक  का साम्राज्य 

बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अशोक शासक बना। अशोक का शासनकाल भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है।  वह विश्व इतिहास का महानतम सम्राट था। उसने विश्व में सभ्यता का प्रचार करने के लिए अथक प्रयत्न किए। 
अशोक के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन के सम्बन्ध में अल्प जानकारी उपलब्ध है। अशोक बिन्दुसार का पुत्र था। बौद्ध ग्रन्थ दीपवंश व महावंश में बिन्दुसार की 16 रानियाँ एवं 101 पुत्रों का उल्लेख किया गया है। बौद्ध प्रन्थ 'अशोकावदान' के अनुसार अशोक की माता का नाम शुभ्रदांगी था। सुसीम बिन्दुसार का सबसे बड़ा पुत्र था।
बिन्दुसार ने अपने सभी पुत्रों के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था की थी, किन्तु समस्त राजकुमारों में अशोक सबसे योग्य था। अशोक को प्रशासनिक शिक्षा प्रदान करने हेतु बिन्दुसार ने उसे उज्जैन का सूबेदार नियुक्त किया था। बिन्दुसार के शासनकाल में ही तक्षशिला में विद्रोह हुआ, जिसे दबाने में सुसीम अक्षम रहा, तब बिन्दुसार ने सहोक को इस विद्रोह को दबाने व तक्षशिला में शान्ति की स्थापना करने के लिए भेजा था। अशोक इस उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा। इस प्रकार अशोक ने अपने पिता के शासनकाल में ही काफी प्रशासनिक अनुभव
प्राप्त कर लिया था।

उत्तराधिकार के लिए युद्ध तथा सिंहासनारोहण- 273 ई.पूमें जब बिन्दुसार बीमार पड़ा, तब अशोक उज्जैन में सूबेदार के रूप में कार्यरत् था। पिता के बीमार होने का समाचार पाकर उसने पाटलिपुत्र के लिए प्रस्थान किया, परन्तु जब वह मार्ग में ही था, तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई। पाटलिपुत्र पहुचने पर उसने मगध के राज-सिंहासन पर अधिकार करने का प्रयास किया। युवराज न होने के कारण संभवतः उसे अपने बड़े भाई सुसीम या उत्तराधिकार के इच्छुक अन्य भाईयों से संघर्ष करना पड़ा था। इस संघर्ष में अशोक को सफलता प्राप्त हुई । यह संघर्ष लगभग चार वर्ष तक चला और अन्ततः अशोक को विजयश्री मिली, तत्पश्चात् 269 ई.पू. में अशोक ने औपचारिक रूप से अपना राज्याभिषेक कराया।

कलिंग पर विजय- अशोक की एकमात्र विजय कलिंग की विजय थी। कलिंग मौर्य साम्राज्य की सीमाओं से लगा हुआ एक शक्तिशाली राज्य था।  साम्राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से उसकी विजय अशोक द्वारा आवश्यक समझी गई। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत से व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने के लिए कलिंग की भूमि और उसके समुद्र तट पर अधिकार करना लाभदायक समझा गया। उसने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष अर्थात  261 ई.पू. में अशोक ने कलिंग  पर आक्रमण किया।  यह युद्ध  बहुत भीषण हुआ, परन्तु इस युद्ध में अशोक की विजय हुई।  युद्ध का वर्णन  तेरहवें शिलालेख  मिलता है। अभिलेख के अनुसार, "राज्याभिषेक के आठ वर्ष पश्चात् देवताओं के प्रिय सम्राट प्रियदर्शी (अशोक) ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में  1,50,000 व्यक्ति व पशु बन्दी बनाकर कलिंग से लाए गए व  1,00,000 व्यक्ति युद्ध भूमि में मारे गए तथा उसके कई गुना अन्य करने से नष्ट हो गए।  पश्चात् महामना सम्राट ने दया के धर्म (बौद्ध धर्म) की शरण ली, इस धर्म से  अनुराग किया और इसका सारा सामान में प्रचार किया। इस विनाश की ताण्डव लीला ने जो कि कलिग राज्य को जीतने में हुई, सम्राट के ह्रदय को द्रवित कर दिया व पश्चाताप से भर दिया। 
विजित कलिंग राज्य मगध साम्राज्य का अंग बन गया तथा उसको राजवंश के ही एक राजकुमार के अधीन कर दिया गया। इस प्रदेश की राजधानी तोशाली बनाई गई। जो पूरी जिले में स्थित थी।

कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा वहां की जनता के कष्ट को देखकर अशोक का ह्रदय आवीभूत हो गया। युद्ध की इस भीषणता का अशोक पर गम्भीर प्रभाव पड़ा। अशोक ने युद्ध की नीति को सदैव के लिए त्याग दिया तथा दिग्विजय के स्थान पर 'धम्म विजय' को अपनाया। कलिग की प्रजा व सीमावर्ती प्रदेशों में रहने वाले लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाए, इस सम्बन्ध में अशोक ने दो आदेश जारी किए। ये आदेश धोली (पुरी जिला) को व जोगडा (गंजाम जिला) के शिलालेखों पर अंकित हैं। इन शिलालेखों में अंकित विवरण इस प्रकार है - "सम्राट का आदेश है कि प्रजा के साथ पुत्रवत् व्यवहार, जनता को प्यार किया जाये, अकारण लोगो को दंड व यातना न दी जाए। जनता के साथ न्याय किया जाना चाहिए। सीमान्त जातियों को आश्वासन दिया गया कि उन्हें सम्राट से कोई भय नही करना चाहिए। उन्हें राजा के साथ व्यवहार करने से सुख ही मिलेगा, कष्ट नहीं। राजा यथाशक्ति उन्हें क्षमा करेगा, वे धम्म का पालन करें। यहाँ उन्हें सुख मिलेगा तथा मृत्यु के बाद स्वर्ग।"
इस प्रकार कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक में महान परिवर्तन हुए। कलिंग का युद्ध अशोक के जीवन की अन्तिम सैनिक विजय थी। अशोक की इस शांतिप्रिय नीति ने ही उसे सदैव के लिए अमर बना दिया।

अशोक का साम्राज्य विस्तार-  कलिग पर विजय प्राप्त हो जाने के कारण अशोक के शासनकाल में मौर्य साम्राज्य की सीमा बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत हो गई। नेपाल तथा कश्मीर भी मगध साम्राज्य के अन्तर्गत थे। अशोक के शासनकाल में दक्षिण में मौर्य साम्राज्य की सीमा पन्नार नदी तक विस्तृत थी। उत्तर-पश्चिम में उसके राज्य की सीमा ऐण्टियोकस द्वितीय के राज्य की सीमा से मिलती थी, जिसमें अफगानिस्तान व बलूचिस्तान के प्रदेश भी शामिल थे। पश्चिम में मौर्य साम्राज्य की सीमा पश्चिमी समुद्र तट तक विस्तृत थी।

अशोक का धम्म (Asholka's Dhamma)

अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान हेतु जिन आचार-विचारों को प्रस्तुत किया था, उसे उसके अभिलेखों में ‘धम्म' कहा गया है। अशोक का व्यक्तिगत धर्म बौद्ध धर्म था, परन्तु अपनी प्रजा के नैतिक तथा आध्यात्मिक स्तर को उन्नत बनाने के लिए उसने जिस धर्म पर जोर दिया और उसका प्रचार किया, उसे अभिलेखों में धम्म की संज्ञा दी गई है।

अशोक ने धम्म सम्बन्धी सिद्धान्त को अपने अभिलेखों में अभिव्यक्त किया । अशोक ने अपने प्रथम शिलालेख में लिखा है, "यज्ञ अथवा भोजन के लिए पशुओं की हत्या न करना ही उचित है।” धम्म के एक अन्य सिद्धान्त जिस पर अशोक ने बहुत जोर दिया था, वह था, माता-पिता, गुरु व बड़े बुजुर्गों का उचित आदर करना। मित्र, पड़ौसी और जाति सम्बन्धियों के साथ सम्यक् व्यवहार करना भी धम्म का मुख्य सिद्धान्त था। अपने सप्तम् शिलालेख में अशोक ने संयम, भाव शुद्धि, कृतज्ञता और दृढ़ भक्ति पर जोर दिया है। इसी प्रकार अशोक के सप्तम स्तम्भ लेख में मोद  (प्रसन्नता) और साधुता (सज्जनता) पर जोर दिया गया है। इस प्रकार उसके धम्म प्रचार का मुख्य उद्देश्य समाज में शान्ति और सौहार्द्र की वृद्धि करना था, क्योंकि राष्ट्र की उन्नति के लिए सामाजिक जीवन को उन्नत बनाना जरूरी था।
अशोक का धम्म मानव मात्र के कल्याण तक ही सीमित न था, वह तो प्राणी मात्र को सुख पहुँचाना चाहता था। इसीलिए उसने छायादार वृक्ष लगवाए ताकि मनुष्यों और पशुओं दोनों को सुख मिल सके। इसलिए उसने पशु हत्या का निषेध किया और पशुओं के लिए भी चिकित्सालय स्थापित कराए। अशोक की मुख्य विशेषता इस बात में है कि उसने जिस धम्म का प्रचार किया, उसका स्वयं अपने जीवन में भी व्यवहार किया। इसके अतिरिक्त उसने अपने उत्तराधिकारियों को भी इसी धम्म का अनुसरण करने की सम्मति दी।

अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रसार (Expansion of Buddhlsm by Ashoka)

प्राचीन भारत के इतिहास में मौर्य सम्राट अशोक का इसलिए भी उल्लेख है कि उसने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में सर्वाधिक योगदान दिया। डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है, "अशोक केवल महान् समर विजेता ही न था, बल्कि विद्वान भिक्षुओं के साथ वह धर्म की सूक्ष्म बातों की चर्चा भी कर सकता था। उसने धर्म-प्रचार के ऐसे कार्य किए जो तीन महाद्वीपों तक फैले हुए थे.............और जिसके कारण गंगा घाटी का सम्प्रदाय (बौद्ध धर्म) संसार के महान धर्म में बदल गया।” अशोक ने बौद्ध धर्म का विशेष प्रचार-प्रसार ही नहीं किया,वरन अन्य धर्मों के श्रेष्ठ गुणों को भी बौद्ध धर्म में समाहित कर उसने अपनी प्रजा को उनका अनुसरण करने का उपदेश दिया। अशोक ने धर्म के लिए  बौद्ध प्रचारप्रसार निम्नांकित कार्य किए-

(1) बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को आचरण में लाना—अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए सर्वप्रथम स्वयं बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का पालन उचित ढंग से किया, उसने स्वयं माँस खाना तथा शिकार करना छोड़ दिया। उसने यद्ध न करने का भी संकल्प किया तथा अन्त तक निभाया। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 9वें वर्ष में बौद्ध धर्म को अंगीकार कर लिया था। वह बौद्ध संघ का सदस्य बन गया तथा भिक्षु की भाँति सादा जीवन व्यतीत करने लगा।

(2) बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित करना- बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के पश्चात अशोक ने बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया तथा समस्त राजकीय साधनों को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। इससे प्रजा बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने लगी।

(3) धर्म महामात्रों की नियुक्ति-  बौद्ध धर्म के व्यापक  प्रचार-प्रसार के लिए अशोक ने धर्म महामात्रों की नियुक्तियाँ की। धर्म-महामात्रो का प्रमुख कार्य जनता में धर्म के सिद्धांतों का प्रचार कर लोगों को चरित्रवान बनाना था।

(4) धर्म यात्राएँ - अशोक ने अपनी आमोद-प्रमोद के उदेश्य से की जाने वाली यात्राएं समाप्त कर दीं, इनके स्थान पर वह धर्म यात्राएँ करने लगा। इन धर्म यात्राओं के उद्देश्य के विषय में अशोक ने अपने 8वें शिलालेख में लिखा है , कि इनका उद्देश्य ब्राह्मण व् श्रमण साधुओं का दर्शन और उन्हें उपहार-दान, वृद्धों दर्शन और उन्हें स्वर्ण-वितरण तथा जनपद के लोगों से मिलना, उन्हें धर्म सम्बन्धी उपदेश देना और उनसे धर्म सम्बन्धी प्रश्न करना व उनके उत्तर देना था।

(5) धार्मिक सिद्धान्तों को शिलाओं और स्तम्भों आदि पर अंकित करना- बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अशोक ने बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को अपने साम्राज्य में विभिन्न स्थानों पर उत्कीर्ण कराया, जिससे कि सभी इन्हें पढ़ सकें और इनके अनुकूल आचरण कर सकें।

(6) जनसाधारण की भाषा का प्रयोग - महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों को जनसाधारण द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली पाली भाषा दिया था, जिससे जनता इन्हें सुगमता से ग्रहण कर सकी। इसीलिए अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार पाली भाषा में किया, जो उस समय जनसाधारण की भाषा थी। इससे बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।

(7) सदआचरण तथा धर्म के व्यावहारिक पक्ष पर बल देना- अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ-साथ सद्आचरण तथा धर्म के व्यावहारिक पक्ष पर भी  बल दिया। उसने कर्मकाण्डों, आडम्बरों तथा अनैतिक सिद्धान्तों आलोचना की तथा नैतिक व्यवहार पर बल दिया। अशोक का कथन था कि मनुष्य का सबसे प्रमुख कर्तव्य माता-पिता की सेवा करना है; मित्रों, सम्बन्धियों, ब्राह्मणों तथा श्रमिकों के प्रति उदार बनना है; जीवों की हत्या न करना और थोड़ा धन संग्रह और उसी के अनुसार थोड़ा व्यय करना मनुष्य का धर्म है।

(8) बौद्ध मठों, स्तूपों व विहारों का निर्माण- बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अशोक ने अनेक मठों, स्तूपों व विहारों का निर्माण करवाया । इन मठों, स्तूपों  व विहारों में बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ निवास करते थे व धर्मोपदेश देते थे, जिससे बौद्ध धर्म का प्रचार होता था।

(9) लोककल्याणकारी कायों का आयोजन- अशोक धर्म को व्यावहारिक रूप देना चाहता था। अतः इस उद्देश्य से उसने लोककल्याणकारी कार्य कराए। अपने 7वें स्तम्भ लेख में अशोक ने कहा है, "मार्गों पर मैंने बरगद के वृक्ष लगवा दिए हैं उनसे मनष्यों व पशुओं को छाया मिलेगी। मैने आमों के बाग लगवाए हैं। प्रत्येक आठ कोस पर मैंने कुंए खुदवाए हैं और विश्रामगृह बनवाए हैं। मनुष्यों और पशुओं के सुख के लिए मैने विभिन्न स्थानों पर प्याऊ लगवाई है........... मैने यह इस अभिप्राय किया है कि लोग धर्म का आचरण करें।" इस प्रकार अशोक ने लोककल्याणकारी कायों के द्वारा भी बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

(10) तृतीय बौद्ध-संगीति का आयोजन- अशोक के शासनकाल में तृतीय बौद्ध-संगीति का पाटलिपुत्र में आयोजन किया गया। इस बौद्ध-संगीति के अध्यक्ष मुगलिपुत्त तिष्य थे। इस बौद्ध-संगीति में बौद्ध संघ में उत्पन्न दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया गया, जिससे बौद्ध धर्म की उन्नति की गति तीव्र हो गयी।

(11) अहिंसा का प्रचार- बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त अहिंसा का अशोक ने प्रचार व पालन किया। उसने अनेक पशु-पक्षियों की हत्या करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। पशु-पक्षियों की हत्या प्रतिबन्धित करने के आदेश के द्वारा चिरकाल से चली आ रही यज्ञ में पशुओं की आहुति देने की प्रथा को भी निषेध कर दिया गया।

(12) दान व्यवस्था- बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार करने के लिए अशोक ने दान व्यवस्था को विशेष महत्व प्रदान किया। असहाय, दीन-दुखियों, निर्धनों तथा रोगियों को राज्य की ओर से दान देने की व्यवस्था प्रारम्भ की गई। अनेक राजकीय संस्थाएँ असहायों को दान देने के साथ-साथ धर्म प्रचार का कार्य भी करती थीं।

(13) धर्म-श्रवण की व्यवस्था- बौद्ध धर्म के स्वरूप को स्पष्ट करने के साथ-साथ उसके व्यापक प्रसार के लिए अशोक ने धर्म श्रवण की व्यवस्था की । इस व्यवस्था में धर्म के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए प्रवचन तथा धार्मिक सम्भाषण दिए जाते थे। अशोक के सातवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि वह समय-समय पर अपनी प्रजा को धार्मिक सन्देश देता था। अशोक जनता से सीधे सम्पर्क कर धार्मिकता का उपदेश देकर तथा उनकी आध्यात्मिक उन्नति के बारे में प्रश्न पूछकरधर्म का प्रचार करता था। राजा द्वारा स्वयं उपदेश देने से प्रजा के मन पर निश्चित रूप से गम्भीर प्रभाव पड़ता होगा तथा इससे धर्म की तीव्र उन्नति हुई होगी ।

(14) बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रचार- अशोक ने भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के अतिरिक्त विदेशों में भी बौद्ध धर्म का प्रसार करने का प्रयास किया। उसने लंका, नेपाल, मिस्र, सीरिया, बर्मा आदि देशों में बौद्ध प्रचारक भेजे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि लंका में तो अशोक ने स्वयं अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को भेजा था। इसके परिणामस्वरूप दूर-दूर तक बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार केवल भारत में ही नहीं वरन विदेशों में भी कराया। इसके साथ ही अशोक ने अपनी प्रजा का अपने उपदेशों द्वारा नैतिक उत्थान कर मानव मात्र का कल्याण किया ।

अशोक के अभिलेख ( Inscriptions of Ashoka)

अशोक ने अपने शासनकाल में जगहजगह अभिलेखों को अंकित कराया। उसने विभिन्न स्थानों पर शिलाओं तथा स्तम्भों पर अपने विचारों को लिखवाया। उसके द्वारा स्थापित शिला-अभिलेख और स्तम्भ-अभिलेख उसके धम्म प्रचार का साधन भी थे। अशोक द्वारा लिखवाये गए अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं, लेकिन कुछ अभिलेखों में खरोष्ठी लिपि व आरमेइक लिपि को भी प्रयोग किया गया है। सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप नामक विद्वान ने अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता हासिल की थी। अशोक द्वारा लिखवाये गये अभिलेखों को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं, जिनका वर्णन अग्रांकित है-

(1) चौदह शिलालेख -  अशोक द्वारा शिलालेखों पर लिखवाये गए ये अभिलेख शाहबाजगढ़ी (पेशावर), मनसेहरा (हजारा), कालसी (देहरादून), गिरनार (काठियावाड़), सोपरा (ठाणे, महाराष्ट्र), धौली (उड़ीसा), जौगढ़ (उड़ीसा) और एरागुड़ी (कुर्नूल) नामक स्थानों पर पाए गए है। इन शिलालेखों की कुल संख्या चौदह है।

(2) लघु-शिलालेख - अशोक द्वारा लिखवाये गए लघु-शिलालेख रूपनाथ (जबलपुर), गुजर्रा (दतिया), सहसराम (शाहबाद, बिहार), भाब्रू (जयपुर), मास्की (रायपुर), ब्रह्मागिरी (मैसूर), सिद्धपुर (मैसूर), जतिंग रामेश्वर (मैसूर), एरागुडी (कुर्नूल), गोविमठ (मैसूर), पालकिगुण्ड (मैसूर), राजुल मांडगिरि (कुर्नूल), अहरौरा (मिर्जापुर), सारो-मारो (शहडोल, मध्य प्रदेश), नेन्नुर (मैसूर) में पाए गए है।

(3) स्तम्भ-अभिलेख- अशोक के स्तम्भ-अभिलेखों की संख्या सात है। ये स्तम्भ अभिलेख पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण कराये गये हैं। ये स्तम्भ अभिलेख मूल रूप से सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) , मेरठ (उत्तर प्रदेश), लोरिया अरराज (बिहार), लौरिया नन्दनगढ़ (बिहार), रामपुरपा (बिहार) तथा कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश) में स्थित थे।

(4) लघु स्तम्भ अभिलेख- अशोक की राजकीय घोषणाएँ जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण है, उन्हें साधारण तौर से लघु स्तम्भ अभिलेख कहा जाता है। ये लघु स्तम्भ अभिलेख साँची, सारनाथ, रुम्मिनदेई (नेपाल), कौशाम्बी व निग्लीवा (नेपाल) नामक स्थानों पर पाये गये हैं।

अशोक का मूल्यांकन एवं उसकी महानता के कारण (Evaluation of Asholaand the causes of his Greatness)

अशोक एक महान सम्राट था। अनेक इतिहासकारों ने अशोक को संसार का महानतम सम्राट कहा है। अशोक मानव-सभ्यता का अग्रदूत, समाज-सेवक तथा प्राचीन भारतीय इतिहास का दैदीप्यमान सितारा था। उसका प्रारम्भिक जीवन चाहे कैसा भी रहा हो, लेकिन कलिंग युद्ध के बाद उसने जिस आदर्श का परिचय दिया, उससे मानवता का महान हित हुआ। अशोक बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्ति था। उसने अपनी प्रजा के भौतिक, आध्यात्मिक तथा नैतिक उत्थान के लिए अथक प्रयत्न किए। उसने 'वसुधैवकुटुम्बकम्' की  जो ज्योति जलाई,वह आज भी विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत है। इसीलिए अशोक को महान सम्राट कहा जाता है। अशोक को महान सम्राट क्यों कहा जाता है? इसके लिए  निम्नांकित कारण उत्तरदायी है -

(1) अशोक का व्यक्तित्व एवं आदर्शवादिता- अशोक बचपन से ही अत्यन्त योग्य एवं मेधावी था। बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि प्रारम्भिक जीवन में अशोक अत्यन्त क्रूर था तथा उसने यातना-गृह का भी निर्माण कराया था, यद्यपि बौद्ध साहित्य का वर्णन सन्देहास्पद है, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि कलिंग-युद्ध के पश्चात् उसकी विचारधारा और व्यक्तित्व में आकस्मिक परिवर्तन हुआ। उसके व्यक्तित्व में हुए परिवर्तन ने ही उसे विश्व का महानतम सम्राट बना दिया। अशोक ने हिंसा के स्थान पर अहिंसा का सहारा लिया तथा वह युद्ध विजेता के स्थान धम्म-विजेता बन गया। कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक का जीवन सरल, पवित्र, त्यागमयी व आदर्शमयी हो गया।

अशोक एक महान आदर्शवादी सम्राट था। अशोक ने सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्रों में महान् आदर्शों का पालन किया। अशोक ने सामाजिक क्षेत्र में जनकल्याण के कार्यों को करते हुए समाज को सुख एवं समृद्धि के पथ पर अग्रसारित किया। अशोक ने धार्मिक क्षेत्र में उदारता एवं सहिष्णता का परिचय दिया। अशोक ने राजनीतिक क्षेत्र में भी उच्च आदर्शवादी सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया। ऐसे उच्च आदर्शों का पालन करके अशोक का महान बनना स्वाभाविक ही था।

(2) महान् शासक- अशोक की गणना विश्व के महानतम शासकों में की जाती है। अशोक ने प्रशासकीय क्षेत्र में जिस त्याग, बलिदान, दानशीलता तथा उदारता का परिचय दिया और मानव को अपना नैतिक स्तर ऊंचा उठाने की प्रेरणा दी, वैसा विश्व के इतिहास में हमें कहीं और देखने को नहीं मिलता है। अशोक ने शासन को कुशल व सुचारु बनाने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था में अनेक सुधार किए तथा 'धर्म-महामात्रों' की नियुक्ति की।  इसके अतिरिक्त अशोक ने 'राजकों को भी नियुक्त किया। 'राजकों' को नियुक्त करने के उद्देश्य के विषय में अशोक ने लिखा है, "जिस प्रकार अपनी संतान को एक कुशल आया को सुपुर्द कर देने के पश्चात् मनुष्य स्वयं निश्चिन्त हो जाता है, उसी मैंने भी प्रांतीय जनता के हितों के लिए इन राजुको को नियुक्त किया है।"  अशोक ने अपने शासनकाल में ऐसे अनेक कार्य बन्द करा दिये जिससे प्रजा का अहित होता था। अशोक ने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्सवों में मद्यपान, माँस-सेवन, नृत्य आदि को समाप्त कर 'धम्म-समाज' व 'धम्म-यात्रा' के महत्व को समझाया। अशोक प्रजा को अपनी सन्तान के समान ही चाहता था, इसका प्रमाण इस तथ्य से भी मिलता है कि उसने घोषणा कराई कि प्रजा के विषय में उसे किसी भी समय सूचना दी जा सकती है। अपने छठे शिलालेख में अशोक ने कहा है, "प्रत्येक समय चाहे में भोजन कर रहा होऊँ या शयनागार में हूँ, प्रतिवेदक प्रजा की दशा से मुझे अवगत करें। मैं सर्वत्र प्रजा-कार्य करूंगा ............ सब लोगों का हित करना मेरा कर्तव्य है और इसका मूल उद्योग तथा कार्य-तत्परता है।" अशोक के इन विचारों ने देश को नवजीवन एवं स्फूर्ति प्रदान की। विद्वान लेखक डॉ.व्ही.ए.स्मिथ ने लिखा है, "यदि अशोक योग्य न होता तो वह अपने विशाल साम्राज्य पर 40 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन न कर सका होता तथा अपना ऐसा नाम न छोड़ गया होता,जिसे लोग दो हजार वर्षों के पश्चात् भी नहीं भूले हैं।"

(3) महान् विजेता- अशोक एक युद्धविजेता के रूप में उतना प्रसिद्ध नहीं है,जितना कि एक 'धम्म-विजेता' के रूप में प्रसिद्ध है कलिंग विजय के पश्चात् अशोक ने 'युद्धघोष' के स्थान पर 'धम्म-घोष’ से विजयें प्राप्त कीं। अशोक ने अन्य शासकों की भांति तलवार से नहीं वरन् शान्ति व अहिंसा के सुदृढ़ अस्त्रों से साम्राज्य विस्तार किया। विश्व इतिहास में ऐसा कोई भी अन्य उदाहरण प्राप्त नहीं होता है। निःसन्देह अशोक एक महान् विजेता था, जो रक्तपात के स्थान पर विजित व विजेता दोनों को ही ‘धम्म' से लाभान्वित करता था।

(4) उदारता एवं लोकहित कार्य- अशोक न केवल मानव वरन् सम्पूर्ण प्राणी जगत के प्रति उदारता का दृष्टिकोण रखता था। इसी कारण अशोक ने पशु-पक्षियों के वध पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। उदारता के अतिरिक्त अशोक ने अनेक लोकहित के कार्य भी किए। अशोक ने लोकहित के लिए छायादार वृक्ष लगवाए, धर्मशालाएँ बनवाई और कुएं खुदवाए। इसके अतिरिक्त अशोक ने मनुष्यों व पशुओं के लिए उपयोगी औषधियों व औषधालयों की भी व्यवस्था की।

(5) कर्तव्यनिष्ठ शासक- अशोक में कर्तव्यनिष्ठा का प्रबल भाव था। उसका मानना था कि उसके लिए सम्पूर्ण प्रजा के कल्याण साधन से अधिक महत्व का कोई दूसरा कार्य नहीं है। अशोक का साम्राज्य काफी विशाल था, फिर भी वह उसके प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक वर्ग की जनता से स्वयं सम्पर्क रखने को बहुत महत्व देता था। उसने घोषणा की थी, "मैं जो कुछ भी पराक्रम करता हूँ, वह उस ऋण को चुकाने के लिए है, जो सभी प्राणियों का मुझ पर है।" वह अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को भी यही कहता था कि प्रजा की समुचित रक्षा करना उनका धर्म है। अशोक के सन्दर्भ में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है, "उसको अपने कर्तव्य का गहरा ध्यान रहता था, जिस कारण उसने अपने पद और स्थान से सम्बन्धित सुख तक को त्याग दिया। हर घड़ी व् हर स्थान पर शासन का कार्य और प्रजा के कल्याण संपन्न करने को वह तत्पर रहता था। अपने साम्राज्य के समस्त साधन उसने मनुष्य-मात्र के दुःखमोचन व् अपने धम्म के प्रचार लिए लगा दिए। "

(6) राष्ट्रीय एकता प्र5दान करना-  चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बांधने के प्रयत्न को अशोक ने पूर्ण किया। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए जो महान प्रयत्न किए, उससे एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में सम्प्रेषण अधिक तीव्र हो गया। परिणामतः सम्पूर्ण देश में एक ऐसी सामान्य भाषा की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी, जो न केवल धार्मिक मामलों में बल्कि आचार-व्यवहार में भी विचार-विनिमय का माध्यम बन सके। अतः अशोक ने सम्पूर्ण देश में एक ही भाषा का प्रयोग करने का आदेश दिया। इस प्रकार पाली भारत की राष्ट्र बन गई। अशोक ने भाषा के अतिरिक्त अन्य सांस्कृतिक क्रिया-कलापों के द्वारा भी राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ता प्रदान की।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अशोक नि:सन्देह एक महान शासक था। उसका चरित्र महान था और उसके आदर्श विश्व की महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पूंजी है। डॉ. राधकुमुद  मुखर्जी ने लिखा है, "राजाओं के इतिहास में मनुष्य और शासक के रूप में किसी के रिकॉर्ड की तुलना अशोक से नहीं की जा सकती है।" अशोक ने अहिंसा के सिद्धान्त का उस समय यदों में हिंसा आदि का नियम था। विद्वान इतिहासकार डॉ. रायचौधरी ने अशोक की प्रशंसा करते हुए लिखा है, "अशोक भारतीय इतिहास के सर्वाधिक रोचक व्यक्तियों में से एक है। वह चन्द्रगुप्त के समान प्रबल, समुद्रगुप्त के समान प्रतिभा सम्पन्न व अकबर के समान निष्पक्ष था। अपने में वह अथक तथा उत्साह में सुदृढ़ था। उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्ति प्रजा की आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नति के लिए लगा दी, जिसे (प्रजा) वह अपने बच्चों के समान समझाता था।"

अशोक के उत्तराधिकारी (Successor of Ashoka)

अशोक की मृत्यु 232 ई. पू. में हुई। उसके बाद लगभग 50 वर्ष तक उसके अनेक उत्तराधिकारियों ने शासन किया। अशोक के उत्तराधिकारियों के बारे में हमारा ज्ञान अपर्याप्त  और अनिश्चित है। विभिन्न पुराण, बौद्ध तथा जैन अनुश्रुतियों में अशोक के इन उत्तराधिकारियों के नामो की जो सूची दी गई है, वे एक-दूसरे से मेल नहीं खाती। लेकिन इतना निश्चित है कि अशोक के उत्तराधिकारियों में ऐसा योग्य कोई नहीं हुआ, जो इतने परिश्रम से निर्मित साम्राज्य की रक्षा कर पाता। कुणाल, दशरथ, सम्प्रति, शालिशुक, देववर्मन, शतधनुष और वृहद्रथ मौर्य वंश के उत्तरकालीन शासक माने गए हैं। मौर्य वंश का अन्तिम शासक वृहद्रथ था, वह अत्यंत अयोग्य और विलासी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी दुर्बलता का लाभ उठाकर 184 ई. पू. में उसकी हत्या कर दी और मगध में एक नवीन राजवंश की नींव डाली, जिसे शुंग राजवंश के नाम से जाना गया।
इस प्रकार 184 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य का पतन हो गया।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण (CAUSES OF THE DECLINE OF MAURYAN EMPIRE)

चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित मौर्य साम्राज्य को अशोक ने उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचाया, परंतु अशोक की मृत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य का पतन शीघ्र ही हो गया। अन्य वंशो के पतन के समान ही मौर्य वंश का पतन न तो आकस्मिक था और न ही कोई एक कारण उसके लिया उत्तरदायी था। विद्वान इतिहासवेत्ता डॉ. रोमिला थापर ने मौर्यों के पतन केे लिए उत्तरदायी कारणों के विषय में लिखा है, "मौर्य साम्राज्य के पतन की सतोषजनक व्याख्या सैनिक अकर्मण्यता, ब्राह्मण, सार्वजनिक विद्रोह या आर्थिक दबाव के आधार पर नहीं की जा सकती। कारण कहीं अधिक मूलभूत थे और इनमें उपयुक्त कारणों से कहीं अधिक मौर्य जीवन का विस्तृत परिप्रेक्ष्य सम्मिलित। "

मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए निम्नांकित कारण मुख्यतः उत्तरदायी थे-
(1) निर्बल एवं अयोग्य उत्तराधिकारी- मौर्यों के पतन के लिए उत्तरदायी कारणों में सर्वप्रथम अशोक के उत्तराधिकारियों का निर्बल एवं अयोग्य होना था। राजतन्त्रीय शासन प्रणाली में राज्य की सफलता एवं विफलता उसके शासक की योग्यता पर निर्भर करती है। अशोक के उत्तराधिकारियों के अयोग्य होने पर उनका पतन स्वाभाविक ही था। इस सन्दर्भ में विद्वान इतिहासकार डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने लिखा है, "सत्य यह है कि साम्राज्य अपने विधान की दुर्बलताओं के फलस्वरूप नष्ट हुआ। शासक अपने व्यक्तिगत गुण विरासत में अपने उत्तराधिकारियों को नहीं दे सकता। अशोक के बाद मौर्य सिंहासन पर बहुत छोटे स्तर के व्यक्ति आये, जो उसके महान व्यक्तित्व की संयोजक शक्ति के हट जाने पर इतने विस्तृत साम्राज्य को एक सूत्र में बाँधकर न रख सके।" इसी प्रकार डॉ. रोमिला थापर ने भी अशोक के उत्तराधिकारियों को मौर्यों के पतन का प्रमुख कारण माना है।

(2) केन्द्रीय शासन की निर्बलता- अशोक के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता के कारण केन्द्रीय शासन निर्बल हो गया था। केन्द्रीय शासन की निर्बलता का लाभ उठाकर मौर्य साम्राज्य के दूरस्थ प्रान्तों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित करनी प्रारम्भ कर दी थी। कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी से स्पष्ट है कि अशोक की मृत्यु के पश्चात् उसके एक पुत्र जलौक ने कश्मीर में अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था। इसी प्रकार तारानाथ के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि वीरसेन नामक एक अन्य राजपुत्र ने गान्धार पर स्वतन्त्र शासन स्थापित कर लिया था।

(3) साम्राज्य का विभाजन- कुछ विद्वान इतिहासवेत्ताओं का विचार है कि अशोक की मृत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य का दो भागों में विभाजन भी मौयों के पतन के लिए उत्तरदायी था। इनके अनुसार साम्राज्य के पूर्वी भाग पर दशरथ तथा पश्चिमी प्रदेश पर कुणाल का अधिकार था। इस प्रकार के विभाजन से मौर्य साम्राज्य की शक्ति निर्बल हो गयी थी। सही सन्दर्भ में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है, "अशोक की मृत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य की शक्ति नष्ट हो चूकी थी और जब तफान उठा, तब उसके प्रान्त शीघ्र ही तितर-बितर हो गये।"
विद्वान इतिहासकार डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार ने भी साम्राज्य के विभाजन को मौयों के पतन का प्रमुख कारण माना है ।

(4) प्रान्तीय शासकों के अत्याचार- ऐतिहासिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि मौर्य साम्राज्य के दूरस्थ प्रान्तों का शासन सन्तोषजनक नहीं था। प्रान्तीय शासक बहुधा प्रजा का उत्पीड़न करते थे। प्रान्तीय प्रजा ने समय-समय पर अपने शासकों के अत्याचारों से क्षुब्ध होकर विद्रोह किए। बौद्ध ग्रन्थ 'दिव्यावदान' में इस प्रकार के दो विद्रोहों का उल्लेख है। दिव्यावदान के अतिरिक्त अशोक के कलिंग अभिलेख में भी राजकीय कर्मचारियों द्वारा प्रजा का उत्पीड़न के किए जाने का उल्लेख है। इस प्रकार राजकीय कर्मचारियों के अत्याचारों से पीड़ित जनता मौर्य  शासन के विरुद्ध हो गयी। विद्वान इतिहासकार डॉ.राधाकुमुद मुखर्जी ने प्रांतीय शासकों के अत्याचारपूर्ण  शासन और तत्जनित जन-विद्रोह को मौर्य वंश के पतन का मुख्य कारण माना है।

(5) अत्याचारी शासक- प्रान्तीय शासकों के अतिरिक्त अशोक के अनेक उत्तराधिकारी भी अत्यंत अत्याचारी थे। 'गार्गी संहिता' में मौर्य शासक शालिशुक के विषय में लिखा है की वह निरंकुश व अत्याचारी शासक था, वह कथन में सदाचारी और व्यवहार में पूर्णतः दुराचारी था। अतः ऐसे शासकों का विरोध होना स्वाभाविक था।

(6) दरबार के षड्यन्त्र- मौर्य दरबार के सदस्य भी अनेक गुटों में विभक्त थे तथा पारस्परिक षड्यन्त्रों में रत् रहते थे । ये लोग अपने निहित स्वार्थों में रत् रहने के कारण राष्ट्रीय हितों को भूल जाते थे। विभिन्न षड्यन्त्रों के कारण मौर्य साम्राज्य को अनेक बार कठिनाई के सामना करना पड़ा। 'मालविकाग्निमित्रम’ से ज्ञात होता है कि राज्य सभा में भी दो दल अपनी-अपनी महत्ता स्थापित करने के लिए निरन्तर खींचातानी कर रहे थे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अशोक द्वारा राजसिंहासन पर अधिकार करने का प्रयास व उसके कारण हुआ गृह-युद्ध है। इसके अतिरिक्त वृहद्रथ के शासनकाल में उसके सेनापति पुष्यमित्र द्वारा वृहद्रथ की हत्या करना, दरबार
में होने वाले षड्यन्त्रों का दूसरा प्रमुख प्रमाण है। इस प्रकार दरबार में व्याप्त गुटबन्दी ने नि:सन्देह मौर्यों के पतन में सहयोग दिया।

(7) विदेशी आक्रमण- मौयों के पतन का एक अन्य कारण विदेशी आक्रमण थे। मध्य व पश्चिमी एशिया के जिन यूनानियों को अशोक ने अपना मित्र व शान्तिवादी बनाने का प्रयास विशृंखलित पाते ही आक्रमण कर दिया। शालिशुक के शासनकाल में ही यवनों ने भारत पर आक्रमण की तैयारी प्रारम्भ कर दी थी तथा उसके पश्चिमी द्वारों को खटखटाने लगे थे। इस सन्दर्भ में विद्वान इतिहासकार डॉ. डी. आर.भण्डारकर ने लिखा है, "अशोक की मृत्यु को 25 वर्ष भी नहीं हुए थे कि भारत के उत्तरी-पश्चिमी आकाश पर काले बादल छाने लगे तथा यूनानी आक्रमणकारियों ने हिन्दुकुश को पार कर लियाजो मौयों की उत्तरीपश्चिमी सीमा था; और उस मौर्य साम्राज्य का ह्रास होने लगा, जो किसी समय एक महान साम्राज्य था।"

(8) अशोक की अहिंसात्मक नीति- विद्वान इतिहासकार डॉ. राय चौधरी ने अशोक की अहिंसात्मक नीति की आलोचना करते हुए लिखा है, "अशोक ने इस नीति को इतने उत्साह और दृढ़ संकल्प के साथ अपनाया कि सैनिक दृष्टिकोण से राष्ट्र एकदम दुर्बल हो गया।" अशोक की  यह नीति प्रत्यक्ष रूप से उसकी मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य के तीव्र विघटन के लिए उत्तरदायी थी। अशोक की अहिंसा की नीति न केवल सैनिक अवनति का कारण बनी, अपितु इसने सम्राट की नियन्त्रण शक्ति को भी कम कर दिया।
यद्यपि उपरोक्त कथन को पूर्णतः सत्य स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने हिंसा का पूर्णतः त्याग नहीं किया था। परन्तु फिर भी उसकी अहिंसात्मक नीति से मौर्य साम्राज्य कमजोर अवश्य हुआ था।

(9) आर्थिक कारण- कुछ इतिहासकारों ने मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था को मौयों के पतन के लिए उत्तरदायी माना है। विद्वान इतिहासकार प्रो. आर.डी. कोशाम्बी का मत है, "उत्तरकालीन मौर्यों के समय में अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त थी। इसी कारण नये-नये कर लगाये गये थे और करों की अधिकता से प्रजा में अवश्य ही रोष उत्पन्न हुआ होगा।"

(10) ब्राह्मण प्रतिक्रिया- मौर्य साम्राज्य के पतन का यह कारण सूक्ष्म किन्तु गम्भीर था। महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री ने इस विषय में लिखा है, "पुष्यमित्र का विद्रोह अशोक की बौद्ध धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण नीति व उसके उत्तराधिकारियों को जैन-मत के प्रति पक्षपातपूर्ण नीति व उसके प्रति ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया का परिणाम था। " इस कथन के समर्थन में अनेक तर्कों के आधार पर हर प्रसाद शास्त्री ने यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि ब्राह्मण प्रतिक्रिया के परिणामस्वरुप ही मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ था।

इस विवेचन से स्पष्ट है कि मौर्य वंश का पतन आकस्मिक नहीं था और न ही कोई एक कारण उसे कमजोर बना रहे थे तथा एक समय ऐसा आया, जब इन कारणों ने संयुक्त रूप से मौर्य साम्राज्य को समाप्त कर दिया। 
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इतिहास- चन्द्रगुप्त मौर्य [CHANDRAGUPTA MAURYA]

CHANDRAGUPTA MAURYA (322 B.C—298 B.C.)
चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य 

चन्द्रगुप्त मौर्य (322 ई.पू.-298 ई.पू) [CHANDRAGUPTA MAURYA (322 B.C—298 B.C.)]

वंश- चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश और जाति के बारे में इतिहासकार एक मत नहीं हैं। यूनानी में लेखक जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को नीच वंश का लिखा है, किन्तु यह मत स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि इसका अर्थ यह हो सकता है कि वह राजघराने का न होकर एक साधारण परिवार में पैदा हुआ हो।

जैन ग्रन्थों में कहा गया कि चन्द्रगुप्त मौर्य एक गाँव के मुखिया की पुत्री से उत्पन्न हुआ था और मौर्य इसलिए कहलाया क्योंकि उस गाँव में मोर पालने वालों की संख्या अधिक थी, किन्तु इससे आगे इस विषय में कुछ नहीं कहा गया। इसलिए इस मत की वैधता भी विवादास्पद है।

ब्राहाण साहित्य और विशाखदत्त द्वारा रचित 'मुद्राराक्षस'आदि के आधार पर चन्द्रगुप्त को शूद्र माना गया किन्तु इस मत को भी स्वीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि चन्द्रगुप्त मौर्य को अपने साम्राज्य निर्माण में चाणक्य की अपार सहायता प्राप्त हुई थी। चूंकि चाणक्य एक कट्टर ब्राह्मण था, अतः यदि चन्द्रगुप्त शूद्र होता तो वह कभी उसकी सहायता नहीं करता।
इसके विपरीत बौद्ध साहित्य चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय मानता है। बौद्ध 'महावंश' के अनुसार चन्द्रगुप्त को ‘मोरिय' नाम के क्षत्रिय वंश का माना गया है । ‘मोरिय’ नाम की क्षत्रिय जाति का उल्लेख गौतम बुद्ध के समय में मिलता है। मोरिय पिप्पलिवन के एक छोटे से गणराज्य के स्वामी थे, जो नेपाल की तराई तथा गोरखपुर जिले के बीच स्थित था। महापरिनिव्वान सुत्त नमक एक अन्य बौद्ध ग्रन्थ से भी मौर्यों के क्षत्रिय होने की पष्टि होती है। बौद्ध ग्रन्थ  दिव्यावदान में भी चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र व मौर्य शासक बिन्दुसार को क्षत्रिय कहा गया है, जिससे मौयों का क्षत्रिय होना प्रमाणित होता है। इसके अतिरिक्त कछ मध्यकालीन लेखों में भी चन्द्रगुप्त मौर्य का क्षत्रिय कहा गया है। प्रोफेसर रायचौधरी ने उपरोक्त सभी मतों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके यह मत प्रतिपादित किया है कि मौर्यों को शूद्र नहीं वरन् क्षत्रिय मानना ही न्यायसंगत एवं तर्कसंगत है। 

प्रारम्भिक जीवन- चन्द्रगुप्त के वंश के समान उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे विद्वान एक मत नहीं है। ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन साहित्य तथा अन्य साक्ष्यों को मिलाकर विद्वान लोगों का मत है कि सम्भवत: चन्द्रगुप्त का जन्म 345 ई.पू. में मुरा नामक स्त्री की कोख से हुआ। उनके पिता मोरिय वंश के प्रमुख थे, वह एक युद्ध में मारे गए और उनका परिवार घोर संकट में पड़ गया, उनकी पत्नी (चन्द्रगुप्त की माँ) ने पाटलिपुत्र में शरण ली और वहीं चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ । चन्द्रगुप्त का पालन-पोषण पहले एक ग्वाले ने किया और फिर एक शिकारी ने किया। कहा जाता है कि बालक चन्द्रगुप्त प्रारम्भ से ही अत्यन्त होनहार था और अपनी मित्रमण्डली के साथ खेलते समय वह राजा की भूमिका किया करता था। एक दिन चाणक्य ने वहाँ से गुजरते समय बालक को मित्र मण्डली के साथ खेलते हुए देखा और उससे बहुत प्रभावित हुआ। चाणक्य अपने साथ उसे तक्षशिला ले गया और वहां उसे राजकुमारों की भाँति समुचित शिक्षा प्रदान की। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि प्रारम्भ में चन्द्रगप्त नन्दवंशीय शासक घननन्द की सेना में एक उच्च पद पर कार्य करता था। किसी कारण नन्दवंशीय शासक उससे रुष्ट हो गया और उसने चन्द्रगुप्त का वध करना चाहा। वह वहाँ से पंजाब की ओर भाग निकला । वहीं उसकी चाणक्य से भेंट हुई। चाणक्य तक्षशिला के समीप रहने वाला एक ब्राह्मण था। उसका वास्तविक नाम विष्णुगुप्त और गोत्र नाम कौटिल्य था। वह राजनीति में पारंगत सम्भवतः विदेशी आक्रमणों से आशंकित था, वह पश्चिमोत्तर भारत में एक राज्य शक्तिशाली स्थापित करना चाहता था। उसे मगध के शासक से बहुत आशा थी । सम्भवतः  उसने मगध नन्दवंशीय शासक से आर्थिक सहायता मांगी, किन्तु उसके बदले में उसे तिरस्कार मिला। कहा  जाता है कि वह मगध के नन्दवंशीय शासक घननन्द की भारी करों की नीति तथा निरंकुश शासन व्यवस्था से भी असन्तुष्ट था। इसलिए उसने नन्दवंश के शासन को समूल नष्ट करने का प्रण लिया। चूंकि दोनों (चन्द्रगुप्त और चाणक्य के उद्देश्य नन्दवंश का विनाश) समान थे, अतः दोनों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए योजना बनाना शुरू किया। चन्द्रगुप्त ने यूनानी शासन से अप्रसन्न जनता के मनोभावों का लाभ उठाकर उन क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयत्न शरू किया। जन-समर्थन प्राप्त करने के साथ-साथ उन्हें धन की भी आवश्यकता थी। बौद्ध ग्रन्थ महावंश की टीका के अनुसार, विन्ध्याचल के वनों में जाकर उन्होंने धन एकत्रित
किया। इसी ग्रन्थ के अनुसार उन्होंने स्थान-स्थान पर सैनिक भर्ती का कार्य भी किया। कालान्तर में चन्द्रगुप्त व चाणक्य के संयुक्त प्रयासों से नन्दवंश का उन्मूलन हुआ व मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर चन्द्रगुप्त मगध का शासक बना।
चन्द्रगुप्त के सिंहासनारोहण की तिथि- चन्द्रगुप्त राजसिंहासन पर कब आसीन हुए, इस विषय में विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। लेकिन अधिकांश विद्वान, डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी के मत और बौद्ध ग्रन्थ में वर्णित तिथि 322 ई. पू. को न्यायसंगत व तर्कसंगत मानते हैं। इस आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य का  सिंहासनारोहण की तिथि 322 ई.पू.में हुआ था।

चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयें (Conquests of Chandragupta Maurya)

चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल सेनानायक व वीर योद्धा था। चन्द्रगुप्त मौर्य व चाणक्य दोनों का ही प्रमुख उद्देश्य नन्द वंश का विनाश कर मगध के राजसिंहासन पर अधिकार करना था। इतिहासकारों में इस विषय पर मतभेद है कि चन्द्रगुप्त ने पहले पंजाब पर अधिकार किया अथवा मगध पर, विभिन्न स्रोतों के आधार पर प्रतीत होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने पहले मगध राज्य पर आक्रमण किया था, किन्तु इस आक्रमण में उन्हें सफलता नहीं मिली तो चन्द्रगुप्त ने यूनानी शासक व आक्रमणकारी सिकन्दर से मिलकर उसे नन्दवंशीय शासक घननन्द के विरुद्ध भड़काया था। चन्द्रगुप्त का विचार था कि सिकन्दर नन्द राजा को परास्त कर स्वदेश लौट जाएगा तो वह परिस्थितियों का लाभ उठाकर मगध पर अधिकार कर लेगा। इस योजना के असफल हो जाने पर उसने पंजाब पर आक्रमण किया तदुपरान्त पुनः मगध पर आक्रमण किया। उसकी विभिन्न विजयों का क्रम निम्नांकित था-
(1) मगध पर प्रथम आक्रमण- मगध पर चन्द्रगप्त व चाणक्य द्वारा किए गए प्रथम आक्रमण के विषय में बौद्ध ग्रन्थ महावंश में वर्णन किया गया है। महावंश के अनुसार चाणक्य ने चन्द्रगुप्त एक शक्तिशाली सेना तैयार करके दी। तब उन्होंने ग्रामों व नगरों को विजित करना प्रारम्भ किया, किन्तु वहाँ लोगों ने चन्द्रगुप्त की सम्पूर्ण सेना को घेर घेर लिया व् उसका  विनाश कर दिया। इस प्रकार आक्रमण विफल हो गया।

(2) यूनानी शासन का उन्मूलन व पंजाब पर अधिकार- चन्द्रगुप्त व चाणक्य की मगध पर अधिकार करने की नवीन योजना के अन्तर्गत प्रथम चरण पंजाब पर अधिकार करना था। पंजाब पर अधिकार करने के लिए यूनानियों का वहाँ से निष्कासन आवश्यक था, क्योंकि सिकन्दर की विजयों के परिणामस्वरूप पंजाब के एक बड़े भू-भाग पर यूनानियों का अधिकार हो गया था। इस समय चाणक्य व चन्द्रगुप्त के सामने दो मुख्य कार्य थे-देश को विदेशियों के आधिपत्य से मुक्त करना और नन्दों के अत्याचारपूर्ण शासन का अन्त करना। यह कार्य सरल नहीं था, क्योंकि उनके पास न तो धन था और न ही सैनिक साधन। अतः उन्होंने पहले इसी ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। पूरी तैयारी करने के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने यूनानियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था। इस युद्ध का वर्णन उपलब्ध नहीं है, फिर भी कुछ यूनानी लेखकों के वर्णन से इस पर प्रकाश पड़ता है। जस्टिन के अनुसार, "सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् भारत ने पराधीणनता के जुए को उतर फेका व क्षत्रपों को मार डाला। इस स्वाधीनता संग्राम का नेता सेंड्रोकोट्स (चन्द्रगुप्त) था.........।"  ऐसा प्रतीत होता है कि 322 ई. पू. के लगभग तक चन्द्रगुप्त  यूनानी क्षत्रप यूडेमस को भारत से भगाकर सम्पूर्ण पंजाब पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था।

(3) मगध पर पुनः आक्रमण-  पंजाब विजय से चन्द्रगुप्त की सैन्य शक्ति बहुत गई। अब चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने मगध के नन्दवंशीय शासक को परास्त करने योजना बनायी। ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भ  में उन्होंने त्रुटिपूर्ण नीति से काम किया था, उन्होंने पहले मगध-साम्राज्य के केन्द्र स्थल आक्रमण किया था, जबकि उन्हें पहले सीमांत प्रदेशों पर आक्रमण करना चाहिए था; इसी कारण प्रारम्भिक आक्रमण विफल रहा । इस बार चन्द्रगुप्त ने मगध साम्राज्य की सीमाओं से आक्रमण प्रारम्भ किया और मार्ग में जो नगर तथा सैन्य छावनियाँ पड़ीं, उन पर अधिकार करते हुए आगे बढ़ा और पाटलिपुत्र को घेर लिया। युद्ध में मगध का नन्दवंशीय शासक घननंद अपने वंशजनों सहित मारा गया। मगध में नन्दवंशीय शासक का पतन करने के पश्चात चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किया।

(4) सेल्यूकस से युद्ध- नन्द वंश के पतन व स्वयं के मगध के सम्राट के रूप सिंहासनारोहण के पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य एक विशाल साम्राज्य का शासक बन गया। जिस समय चन्द्रगुप्त मौर्य अपने इस विशाल साम्राज्य को सुदृढ़ एवं सुसंगठित करने में व्यस्त था, उसी समय सिकन्दर का सेनापति सेल्यूकस भी अपने एशियाई-यूनानी साम्राज्य को प्रबल बनाने का प्रयास कर रहा था। सेल्यूकस सिकन्दर के समान ही महत्त्वाकांक्षी एवं वीर था। अपने राज्य की स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात उसने सिकन्दर द्वारा जीते गए प्रदेशों (जो सिकन्दर की मत्य के पश्चात् स्वतन्त्र हो गए थे) को पुनः अपने अधीन करने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से सेल्यूकस ने पहले बैक्ट्रिया पर आक्रमण किया, जिसमें उसे सफलता मिली। इस सफलता से प्रोत्साहित होकर सेल्यूकस ने तत्पश्चात् भारत की ओर अपना रुख किया। 305 ई.पू.के लगभग सेल्यूक्स सिंधु नदी के तट पर पहुँचा। लेकिन इस युद्ध का क्या परिणाम हुआ ? इस सम्बन्ध में यूनानी इतिहासकारों ने कुछ भी नहीं लिखा। लेकिन स्ट्रेबो के वर्णन से ज्ञात होता है कि सेल्यूकस
और चन्द्रगुप्त के मध्य एक सन्धि हुई थी । इस सन्धि की शतों से यह अनुमान लगाया जा सकता है सेल्यूकस की अवश्य करारी हार हुई होगी। इस सन्धि की शतों के आधार पर सेल्यूकस चन्द्रगुप्त को एरिया (हिरात), परोपनिषदै  (काबुल को घाटी), आकोंशिया (कान्धार) और जेड्रोसिया (बलूचिस्तान) प्रदेश प्रदान किए। सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ किया। चन्द्रगुप्त ने उपहार स्वरूप पाँच सौ हाथी सेल्यूकस को प्रदान किए।
इसके पश्चात् सेल्यूकस ने मौर्य दरबार से सदैव मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाये रखे और अपना एक राजदूत, जिसका नाम मैगस्थनीज था, को मौर्य दरबार में भेजा, जो पाटलिपुत्र में लम्बे समय तक रहा। मेगस्थनीज ने भारत के सन्दर्भ में एक पुस्तक की भी रचना की, जो 'इंडिका' के नाम से जानी जाती है। मौर्य साम्राज्य के साथ यह मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध सेल्यूकस और चन्द्रगुप्त के उत्तराधिकारियों के मध्य भी कायम रहे।

(5) दक्षिण विजय- जस्टिन नामक एक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त ने अपनी छः लाख की सेना से सारे भारत को रौंद डाला। यदि हम इस कथन को अतिश्योक्तिपूर्ण मान भी ले तो भी इससे यह अनुमान लगाना गलत न होगा कि दक्षिण भारत का एक बहुत बड़ा भू-भाग उसके अधीन था। मैसूर से प्राप्त  कुछ शिलालेखों के अनुसार उत्तरी मैसूर में चन्द्रगुप्त का शासन था। चूँकि अशोक कालीन शिलालेखों के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि होती है की उसका साम्राज्य मैसूर तक फैला हुआ था और न तो बिन्दुसार ने तथा न ही अशोक ने दक्षिण में क्षेत्र जीता, इसलिए यह तथ्य सत्य जान पड़ता है कि दक्षिण में पर्याप्त क्षेत्र चन्द्रगुप्त मौर्य ने जीत लिया हो। बौद्ध ग्रन्थ महावंश से भी हमें ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण जम्बूदीप (भारत) पर शासन किया था।

(6) पश्चिमी भारत पर विजय- चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्चिमी भारत पर भी विजय प्राप्त की थी, इसमें कोई संशय नहीं है। रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि पश्चिम में सौराष्ट्र चन्द्रगुप्त मौर्य के अधीन था। सौराष्ट्र विजय के परिणामस्वरूप मालवा व उज्जैन पर भी उसका अधिकार हो गया था। मुम्बई (महाराष्ट्र) के थाणे जिले में सोपारा नामक स्थान से प्राप्त अशोक के शिलालेख से ज्ञात होता है कि सोपारा भी चन्द्रगुप्त के अधीन रहा था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य विस्तार (Empire Extent of Chandragupta Maurya)

इन विजयों के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक व पश्चिम में हिन्दुकुश से पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था। अफगानिस्तान व बलूचिस्तान का विस्तृत भू-भाग, सम्पूर्ण पंजाब, सिन्ध प्रान्त, कश्मीर, नेपाल, गंगा-यमुना का दोआब, मगध, बंगाल, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिण भारत के मैसूर तक का क्षेत्र चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य के समय अंग थे। इतना विस्तृत साम्राज्य इससे पूर्व भारत में किसी राजा ने स्थापित नहीं किया था।

चन्द्रगुप्त मौर्य के अन्तिम दिन (Last Days of Chandragupta Maurya)

चन्द्रगुप्त मौर्य जीवन के अन्तिम दिनों के विषय में जैन साहित्य से जानकारी मिलती है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। चन्द्रगुप्त के शासनकाल के अन्त में भयंकर अकाल पड़ा था। ऐसे समय जैन मुनि भद्रबाहु ने जैन धर्मावलाम्बियों के साथ दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया। चन्द्रगुप्त भी शासन की बागडोर अपने पुत्र को सौंपकर भद्रबाहू के साथ श्रवणबेलगोला चला गया तथा अपने अन्तिम दिन जैन धर्म के अनुयायी के रूप में दक्षिण भारत में ही व्यतीत किए। चन्द्रगुप्त की मृत्यु 298 ई.पू. में हुई।

चन्द्रगुप्त मौर्य का मूल्यांकन (Evaluation of ChandraguptaMaurya)

(1) महान् सेनानायक- चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल योद्धा और महान् सेनानायक था। उसकी गणना भारतीय इतिहास के महान सेनानायकों की जाती है। उसने अपने शासनकाल में पश्चिमोत्तर भारत को यूनानियों के चंगुल से मुक्त कराया था। यदि वह उत्कृष्ट सेनानायक न होता तो यूनानी सेनानायकों को पराजित करना असम्भव हो गया होता।

(2) महान् साम्राज्य निर्माता- चन्द्रगुप्त मौर्य कुशल योद्धा और महान् सेनानायक होने के साथ-साथ एक महान साम्राज्य निर्माता भी था। अपनी विजयों के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य की सीमाओं का दूरस्थ प्रदेशों तक विस्तार किया। उसका साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक वे पश्चिम में हिन्दूकुश से पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था। अफगानिस्तान व बलूचिस्तान का विस्तृत भू-भाग, सम्पूर्ण पंजाब, सिन्धु प्रदेश, कश्मीर, नेपाल, गंगा-यमुना का दोआब, मगध, बंगाल, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिण भारत के मैसूर तक का क्षेत्र।
चन्द्रगुप्त के साम्राज्य के अंग थे।

(3) कुशल प्रशासक- चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल प्रशासक भी था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने ही सर्वप्रथम अत्यंत कुशल प्रशासनिक व्यवस्था को कार्यान्वित किया।  चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक व्यवस्था कितनी कुशल थी, इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि भारत में अंग्रेजों ने भी लगभग उसी प्रकार की व्यवस्था को अपनाया। उसके प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमे केन्द्रीय शासन तथा स्थानीय स्वशासन दोनों का सुन्दर समन्वय था।

(4) लोककल्याणकारी राज्य का संस्थापक- चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन का उद्देश्य लोककल्याण था। लोककल्याण के उद्देश्य से उसने जनसाधारण की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति पर ध्यान दिया। उसने कृषि, व्यापार, उद्योगों को भरपूर प्रोत्साहन दिया। उसने ब्याज की दरे निधारित करके किसानों, मजदूरों तथा कारीगरों को साहूकारों के शोषण से बचाने का भी प्रयास किया। इस प्रकार उसने
लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना के समुचित प्रबन्ध किए।

(5) कूटनीतिक प्रतिभा से सम्पन्न- चन्द्रगुप्त मौर्य कूटनीतिक प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्ति था। विस्तृत साम्राज्य का निर्माण, उसकी कूटनीति का ही प्रमाण था। कूटनीतिक कौशल के माध्यम से ही उसने सेल्यूकस से सम्पूर्ण अफगानिस्तान का प्रदेश छीन लिया था।
विवेचन से स्पष्ट है कि चन्द्रगुप्त एक कुशल योद्धा, सेनानायक, योग्य शासक व महान् विजेता था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने 24 वर्ष के शासनकाल में जितनी सफलताएं प्राप्त की, उतनी उपलब्धियाँ इतने अल्पकाल में किसी अन्य भारतीय शासक ने प्राप्त नहीं कीं।
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इतिहास- मौर्य वंश [MAURYAN DYNASTY]

MAURYAN DYNASTY
मौर्य वंश  [MAURYAN DYNASTY]

मौर्य वंश  [MAURYAN DYNASTY]

मौर्य वंश का इतिहास जानने के साधन [SOURCES OF THE HISTORY OF MAURYAN DXNASTY]

मौर्यकालीन इतिहास को जानने के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। मौर्यकाल के इतिहास जानने के साधनों को निम्नांकित भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) संस्कृत साहित्य- प्राचीनकाल में रचित संस्कृत भाषा के विभिन्न ग्रन्थ मौर्य-कालीन इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। संस्कृत भाषा में रचित 'अर्थशास्त्र’ मौर्य वंश के इतिहास के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है, क्योंकि यह ग्रन्थ चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री कौटिल्य द्वारा रचित है। मौर्यकाल पर प्रकाश डालने वाले संस्कृत ग्रन्थों में  'पुराण' भी महत्वपूर्ण हैं। पुराणों में न केवल मौर्यवंशीय राजाओं के नाम वरन उनसे सम्बन्धित विभिन्न घटनाओं का भी वर्णन प्राप्त होता है ।
अर्थशास्त्र एवं पुराणों के अतिरिक्त भी संस्कृत भाषा में रचित अन्य ग्रंथों, जैसे- विशाखदत्त द्वारा रचित 'मुद्राराक्षस', क्षेमेन्द्र द्वारा रचित 'वृहतकथामंजरी', सोमदेव द्वारा रचित 'कथासरितसागर' एवं महाकवि कालीदास द्वारा रचित 'मालविकाग्निमित्रम' आदि ग्रंथों से मौर्यों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। 

(2) बौद्ध साहित्य- यद्यपि बौद्ध धर्म की प्रादुर्भाव छठी शताब्दी ई. पू. में हुआ था, किन्तु  बौद्ध धर्म का वास्तविक विस्तार मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में हुआ था। इसलिए बौद्ध लेखकों ने अपनी रचनाओं में अशोक व्  मौर्य साम्राज्य को प्रमुख स्थान दिया। अतः बौद्ध साहित्य से मौर्यकालीन इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। बौद्ध ग्रन्थों में 'दीपवंश, 'महावंश', 'महाबोधिवेश' 'मिलिन्दपह', 'दिव्यावदान' और 'मंजूश्रीमूलकल्प' आदि प्रमुख स्थान रखते हैं। इन बौद्ध ग्रन्थों से मौर्य इतिहास और संस्कृति को जानने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है ।

(3) जैन साहित्य- संस्कृत साहित्य और बौद्ध साहित्य की तुलना में जैन साहित्य ने मौर्यवंशीय इतिहास पर अधिक प्रकाश डाला है। जैन अनुश्रुति के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी था। इस कारण जैन-ग्रंथों  ने मौर्य वंश के इतिहास पर आरम्भ काल से ही प्रकाश डाला है। जैन ग्रन्थों में भद्रबाहु द्वारा रचित 'कल्पसूत्र', हेमचन्द्र द्वारा रचित 'परिशिष्ट-पर्व', प्रभासूरि द्वारा रचित 'विविध तीर्थकल्प', मेरुतुंग द्वारा रचित 'विचार-श्रेणी', श्रीचन्द्र द्वारा रचित 'कथाकोष', रामचन्द्र द्वारा रचित 'पुष्याश्रवकथाकोष' और हरिषेण द्वारा 'वृहत्कथाकोष' आदि ग्रंथों से मौर्यवंशीय इतिहास जानने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है ।

(4) यूनानी वृतान्त- यूनानी वृतान्त भी मौर्यवंशीय इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। यूनानी लेखकों में मैगस्थनीज का नाम अति महत्वपूर्ण है, मैगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में यूनानी राजदूत के रूप में लम्बे समय तक रहा तथा उसने चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था, सैन्य संचालन, राज्य की आर्थिक व सामाजिक स्थिति का गहन अध्ययन किया और 'इण्डिका' नामक ग्रन्थ की रचना की। यूनानी राजदूत मैगस्थनीज का वृतान्त मौर्यवंशीय इतिहास जानने के लिए अत्यन्त उपयोगी है। दुर्भाग्यवश मैगस्थनीज द्वारा रचित ‘इण्डिका' ग्रन्थ मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, परन्तु बाद के यूनानी लेखकों ने ‘इण्डिका' उद्धरणों का समुचित उपयोग अपनी रचनाओं में किया है। मैगस्थनीज के अतिरिक्त भी अनेक यूनानी व्यक्ति, जो मौर्य दरबार में राजदूत रहे, ने भारत के विषय में ग्रंथों की रचना की, किन्तु दुर्भाग्य से इनमें से किसी का भी ग्रन्थ मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। बाद के जिन लेखकों ने प्रचीन यूनानी लेखकों के वृतान्तों के उद्धरण उद्धृत किए, उनमें स्ट्रेबो (Strabo), प्लिनी (Pliny), डियोडोरस (Diodorus), प्लूटार्क (Plutarch), एरियन (Arrian), जस्टिन  (Justin) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके विवरणों से हमें मौर्यवंशीय इतिहास जानने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है ।

(5) पुरतात्विक स्त्रोत- मौर्यवंशीय इतिहास की जानकारी के लिए पुरातत्व सामग्री पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है । विभिन्न अभिलेख, विभिन्न स्थानों पर खुदाई किए जाने पर प्राप्त  हए मिट्टी के बर्तन व मूर्तियाँ आदि से मौर्यवंशीय जानकारी प्राप्त होती है। पुरातात्विक स्रोतों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों का है, जिनसे मौर्यकालीन राजनीतिक स्थिति, धार्मिक स्थिति, सामाजिक नैतिकता एवं बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। 
इस पर विवेचन से स्पष्ट है कि मौर्यवंशीय इतिहास प्रकाश डालने वाली सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे मौर्यकालीन इतिहास का सरलतापूर्वक निर्माण किया जा सकता है।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना (Mauryan Rise of Empire)

ई.पू. चतुर्थ शताब्दी भारत के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है,क्योंकि इसी शताब्दी में भारत में सर्वप्रथम 'राजनीतिक एकता' प्रदान करने वाले मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई थी। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य थे, जिनकी गणना भारत के महानतम् सम्राटों में की जाती है । मौर्य वंश की स्थापना से पूर्व भारतीय इतिहास का तिथिक्रम अत्यन्त स्पष्ट एवं विवादास्पद है, किन्तु मौर्यों के समय से भारत का इतिहास पौराणिक गाथाओं के स्थान पर ऐतिहासिक वृत्त का रूप धारण कर लेता है । भारत का वास्तविक ऐतिहासिक वृतान्त मौर्ययुग से ही मिलता है। यही कारण है कि चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट माना जाता है।
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इतिहास- बौद्ध धर्म- महात्मा बुद्ध [BUDDHISM- LIFE SKETCH OF MAHATMA BUDDHA]

LIFE SKETCH OF MAHATMA BUDDHA
गौतम बुद्ध 

बौद्ध धर्म [BUDDHISM]

महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय [LIFE SKETCH OF MAHATMA BUDDHA]

महात्मा बद्ध के जीवन की घटनाओं का विवरण अनेक बौद्ध ग्रन्थों जैसे ललितबिस्तर, बढ़चरित, महावस्तुसुत्तनिपात से प्राप्त होता है । महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के पास लम्बिनी वनों (लुम्बिनी, नेपाल की तराई में कपिलवस्तु से लगभग चौदह मील की दूरी पर स्थित है।) में 563 ई.पू. में हुआ था। महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन था, जो शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक थे। महात्मा बुद्ध की माता का नाम महामाया था, जो देवदह की राजकुमारी थी। महात्मा बुद्ध के जन्म के सातवें दिन ही उनकी माँ महामाया का देहान्त हो गया था, अतः उनका पालनपोषण उनकी मौसी व विमाता प्रजापति गौतमी ने किया था। महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था (शाक्य लोग गौतम गोत्र थे, इसीलिए सिद्धार्थ को गौतम तथा गौतम बुद्ध के नाम भी के से पुकारा जाता है)।
सिद्धार्थ बचपन से ही एकान्तप्रिय, मननशील एवं दयावान प्रवृत्ति के थे। सिद्धार्थ सांसारिक दु:खों को देखकर करुणा से द्रवित हो जाते थे और इन दु:खों से मुक्ति पाने के उपायों के बारे में सोचते थे। सिद्धार्थ के इस प्रकार के स्वभाव से इनके पिता चिन्तित रहने लगे। इसीलिए उन्होंने भोग-विलास की समस्त वस्तुएँ सिद्धार्थ के चारों ओर एकत्र कर दीं, परन्तु फिर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक भोग-विलास की ओर आकर्षित नहीं हो सका। सांसारिक सुखों के प्रति उदासीनता के कारण इनके पिता ने 16 वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह रामग्राम के कोलिय गणराज्य की राजकुमारी यशोधरा से कर दिया। विवाह के कुछ वर्ष पश्चात् इन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम राहुल रखा गया। पुत्र -जन्म के सुअवसर पर के समस्त राज्य में खुशियाँ मनाई गई, लेकिन सिद्धार्थ ने पुत्र-जन्म का समाचार सुनकर कहा, "आज मेरे बन्धन की श्रृंखला में एक कड़ी और जुड़ गई।" यद्यपि उन्हें समस्त सुख प्राप्त थे, किन्तु उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं थी। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ऐसे चार दृश्य देखे, जिससे उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। एक दिन उन्होंने बाग को जाते समय एक वृद्ध व्यक्ति, दूसरे दिन एक रोगी व्यक्ति, तीसरे दिन एक मृत-व्यक्ति और चौथे दिन एक संन्यासी व्यक्ति को देखा। इन चार दृश्यों ने उनके मन-मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव डाला और उन्हें गृहस्थ जीवन से वैराग्य उत्पन्न हो गया। अतः एक रात वे अपनी पत्नी व पुत्र को सोता हुआ छोड़कर गृह त्यागकर ज्ञान की खोज में निकल पड़े।

गृह त्याग के पश्चात् सिद्धार्थ मगध की राजधानी राजगृह पहुँचे, वहाँ उन्होंने अलार और उद्रक नामक दो प्रसिद्ध ब्राह्मणों से भेंट की और उनसे ज्ञान प्राप्ति का प्रयत्न किया, परन्तु वह उन्हें संतुष्टि नहीं हुई। तत्पश्चात् वे निरंजना  नदी के किनारे उरवेल नामक वन में पहुँचे नदी के जहां उनकी पाँच ब्राह्मण तपस्वियों से भेंट हुई। इन तपस्वियों के साथ मिलकर उन्होंने कठोर तपस्या की, परन्तु इससे भी लाभ नहीं निकला। अतः समझ गए कि शरीर कष्ट देने से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है, अतः उन्होंने अन्न-जल ग्रहण करना आरम्भ कर दिया,  जिसके फलस्वरूप अन्य तपस्वियों ने उनका साथ छोड़ दिया। इसके पश्चात् सिद्धार्थ गया (बिहार) पहुंचे, वहाँ उन्होंने एक वट-वृक्ष के समाधि लगायी और प्रतिज्ञा की कि जब तक ज्ञान प्राप्त नहीं होगा, वे वहां से नहीं हटेंगे। सात दिन व सात रात  समाधिस्य रहने के उपरान्त अठवें दिन बैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई।इस घटना को 'सम्बोधि' कहा गया, जिस वट वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, उस वट-वृक्ष को ‘बोधि वृक्ष' और गया को 'बोधगया' कहा जाने लगा। इस घटना के उपरान्त सिद्धार्थ को भी 'महात्मा बुद्ध' कहा जाने लगा।

ज्ञान प्राप्त होने से महात्मा बुद्ध ने जीवन का एक ऐसा मार्ग खोज निकाला था, जिसका पालन समय, स्थान व विद्यमान संस्कृति की परवाह किए बगैर जा सकता था। महात्मा बुद्ध ने दुखों को दूर करने व मुक्ति के मार्ग को ढूंढ़ लिया था। उनके इस मार्ग को 'मध्यम मार्ग' के नाम से जाना जाता है।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने सारनाथ (बनारस के निकट) पहुँचकर सर्वप्रथम अपने उन पाँच साथियों, जिन्होंने पूर्व में उनका साथ छोड़ दिया था, को उपदेश दिया। ये लोग महात्मा बुद्ध के उपदेश से बहुत प्रभावित हुए और उनके शिष्य बन गए। इन शिष्यों को 'पंचवर्गीय' कहा जाता है। महात्मा बुद्ध द्वारा इन शिष्यों को दिए गए उपदेशों की घटना को 'धर्म-चक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। इसके पश्चात् उन्होंने बनारस, राजगृह, गया, नालन्दा, पाटलिपुत्र आदि स्थानों पर अपने उपदेश दिए। बिम्बसार, अजातशत्रु तथा मुण्ड जैसे शासक और अनेक धनी वैश्य एवं क्षत्रिय उनके अनुयायी एवं समर्थक बन गए थे। कोशल राज्य में महात्मा बुद्ध के अनुयायियों की संख्या सर्वाधिक थी। कोशल के राजा प्रसेनजित और उसकी पत्नी मल्लिका तथा बहनें सोमा व सकुला भी महात्मा बुद्ध अनुयायी बन गई थीं।

महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु भी गए। जहाँ उनकी पत्नी, पुत्र व अनेक शाक्यवंशीय व्यक्ति उनके शिष्य बन गए। महात्मा बुद्ध आजीवन अंग, मगघ, काशी, मल्ल, शाक्य, वज्जि और कोशल आदि सभी नगरों में घूम-घूम कर अपने विचारों को प्रसारित करते रहे। अस्सी वर्ष की अवस्था में वे घूमते हुए पावा पहुँचे, जहाँ उन्हें अतिसार रोग हो गया, इसके पश्चात् वह कुशीनगर पहुंचे, जहाँ 483 ई.पू. में वैशाख पूर्णिमा के दिन उनकी मृत्यु हो गयी । उनकी मृत्यु की घटना को 'महापरिनिर्वाण' कहा जाता है।

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त अथवा महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ (Principles of Buddhism or Teachings of Mahatma Buddha)

महावीर स्वामी की भाँति महात्मा बुद्ध ने भी अपने विचारों का प्रचार मौखिक रूप से ही किया था। महात्मा बुद्ध के शिष्यों ने भी काफी समय तक उनके उपदेशों का मौखिक प्रचार ही किया। लेकिन कुछ समय पश्चात् उनके निकटतम शिष्यों ने उनके उपदेशों और वचनों का संकलन 'त्रिपिटकों' के अन्तर्गत किया। 'त्रिपिटक’, बौद्धों के पाली भाषा में लिखे गए आदि धर्मग्रन्थ माने जाते हैं। त्रिपिटक संख्या में तीन हैं - (i) विनय पिटक, (ii) सुत्त पिटक, और (iii) अभिधम्म पिटक । इन्हीं त्रिपिटकों से बौद्ध-धर्म सिद्धान्तों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। 

(1) चार आर्य सत्य- महात्मा बुद्ध ने सारनाथ में अपने प्रथम उपदेश में जनसाधारण को बताया कि मानव-जीवन में आदि से अन्त तक दु:ख ही दु:ख हैं। अतः दुख से मुक्ति प्राप्त करने के लिए उन्होंने चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया, जिनका विवरण निम्नांकित है- 
(अ) दु:ख- महात्मा बुद्ध के अनुसार व्यक्ति के जीवन में दुख ही दुख है। उनका मानना था कि क्षणिक सुखों को सुख मानना अदूरदर्शिता है।
(ब) दुख समुदय- महात्मा बुद्ध के अनुसार दु:ख का मूल कारण तृष्णा, मोह तथा माया है। इनमें सबसे अधिक घातक तृष्णा है। तृष्णा व्यक्ति को स्वार्थी बनाती है।
(स) दुःख निरोध- महात्मा बुद्ध के अनुसार दुखों से मुक्त होने के लिए उसके कारण का निवारण आवश्यक है। महात्मा बुद्ध ने दुःख निरोध को ही निर्वाण माना है। उनका मानना था कि यदि तृष्णा को समाप्त कर दिया जाय तो व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो निर्वाण प्राप्त कर सकता है ।
(द) दुख निरोध मार्ग- यह दुःखों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग है। कोई भी व्यक्ति इस मार्ग का अनुसरण कर दुखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। महात्मा बुद्ध ने जो मार्ग बतलाया वह 'दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा' के नाम से जाना जाता है। महात्मा बुद्ध का मानना है कि शारीरिक यातनाओं अथवा तपस्या द्वारा निर्वाण प्राप्त नहीं किया जा सकता है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए महात्मा बुद्ध ने जो मार्ग सुझाया,उसे 'आष्टांगिक मार्ग' कहा जाता है।

(2) आष्टांगिक मार्ग- महात्मा बुद्ध ने दुखों से मुक्ति प्राप्त करने अथवा निर्वाण प्राप्त करने के लिए आष्टांगिक मार्ग का पालन आवश्यक बताया। आष्टांगिक मार्ग के आठ अंग निम्नांकित हैं-
(अ) सम्यक-दृष्टि- मिथ्या दृष्टि को त्यागकर यथार्थ स्वरूप पर ध्यान देना ही सम्यक दृष्टि है।
(ब) सम्यक संकल्प- कामना और हिंसा से मुक्त आत्म कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक् संकल्प है।
(स) सम्यक्-वाक्- सम्यक वाक् के अंतर्गत व्यक्ति को झूठ, निन्दा व अप्रिय वचन नहीं बोलने चाहिए।
(द) सम्यक्-कर्मान्त- सम्यक-कर्मान्त के अंतर्गत सभी कमरों में पवित्रता रखना, हिंसा तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना आवश्यक है।
(य) सम्यक्-आजीविका- सम्यक्आजीविका के अंतर्गत व्यक्ति को जीविकोपार्जन के लिए पवित्र रास्ता चुनना चाहिए।
(र) सम्यक्-व्यायाम- इसे सम्यक् प्रयत्न भी कहते हैं। इसका अर्थ है सत्कर्मों के लिए निरंतर उद्योग करते रहना।
(ल) सम्यक्-स्मृति- सम्यक-स्मृति का तात्पर्य है- दुर्गुण भावों के प्रति सदैव अचेत रहना, सांसारिक लालसाओं और मोहों को बुद्धि में न आने देना और सदैव बुरे विचारों को दूर रखने के लिए सजग रहना है।
(व) सम्यक् समाधि- उक्त सातों नियमों का अनुसरण कर जो व्यक्ति अपनी बुरी चित्त-प्रवृत्तियों को दूर कर लेता है, वह सम्यक् समाधि का अधिकारी हो जाता है। चित्त की एकाग्रता को ही सम्यक् समाधि कहते हैं। सम्यक् समाधि प्राप्त करने पर व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर लेता है।

(3) मध्यम मार्ग- महात्मा बुद्ध का मानना था कि निर्वाण प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करना तथा शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है। सांसारिक विषयों में लिप्त रहकर ज्ञान प्राप्ति की जा सकती है। निर्वाण या ज्ञान प्राप्त करने के लिए मध्यम मार्ग को अपनाना चाहिए। 

(4) दस शील- महात्मा बुद्ध ने आचरण की पवित्रता तथा नैतिकता के लिए दस शीलों का प्रतिपादन किया। ये दस शील निम्नांकित हैं (i) अहिंसा वत का पालन करना, (ii) सदा सत्य बोलना, (iii) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना, (iv) अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना, (v) ब्रह्मचर्य अर्थात् भोग-विलास से दूर रहना, (vi) नृत्य-गायन का त्याग, (vii) सुगन्धित पदार्थों का त्याग, (viii) असमय भोजन का त्याग, (ix) कोमल शैय्या का त्याग और (x) कामिनी और कांचन का त्याग।

(5) क्षणिकवाद- महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित बौद्ध दर्शन क्षणिकवादी दर्शन भी महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार क्षण-भंगुर है। संसार की वस्तुएँ सत्ता परिवर्तन के कारण बनती-बिगड़ती रहती हैं, इस कारण संसार से मोह करना व्यर्थ है।

(6) अनात्मवाद- महात्मा बुद्ध आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। महात्मा बुद्ध का मानना था कि शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा नाम की कोई वास्तु शेष नहीं रह जाती है। उनका विश्वास था कि शरीर अलग-अलग तत्वों से मिलकर बना है तथा मृत्यु के पश्चात ये तत्व अलग-अलग हो जाते हैं।

(7) कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त- महात्मा बुद्ध का मानना था कि व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसी के अनुसार वह उच्च अथवा निम्न योनि में प्रवेश करता है। यदि वह अच्छे कर्म करता है तो उसे दुखों से मुक्ति मिल जाती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और यदि बुरे कर्म करता है तो उसे बार-बार विभिन्न योनियों में जन्म लेकर अनेक प्रकार के दु:ख भोगने पड़ते है। 

(8) अनीश्वरवाद- कुछ विद्वानों का मानना है कि महात्मा बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व भी स्वीकार नहीं करते थे। महात्मा बुद्ध का मानना था कि विश्व की उत्पत्ति के लिए ईश्वर की आवश्यकता नहीं है वरन् कर्म-कारण की श्रृंखला से विश्व चलता रहता है। महात्मा बुद्ध कर्मवादी होने के कारण ईश्वर सम्बन्धी दार्शनिक विवादों में नहीं पड़े। उनका मानना था कि जिन विषयों के समाधान के लिए पर्याप्त प्रमाण न हों तो उनके समाधान की चेष्टा करना व्यर्थ है। अत: महात्मा बुद्ध को स्पष्ट तौर पर अनीश्वरवादी मानना उचित नहीं है। बल्कि यह कहा जा सकता है कि उन्होंने ईश्वर सम्बन्धी वाद-विवाद में उलझना उचित नहीं समझा।

(9) वेदों में अविश्वास- महात्मा बुद्ध ने वैदिक कर्मकाण्डों तथा रीतियों का विरोध किया। उनका मानना था कि यज्ञ तथा बलि आदि व्यर्थ के आडम्बर हैं।

(10) जाति प्रथा का विरोध- महात्मा बुद्ध जाति प्रथा के भी विरोधी थे वह मनुष्यों की समानता में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि सभी मनुष्य समान है, जाति के आधार पर कोई छोटा-बड़ा नहीं है।

(11) निर्वाण- महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्वाण है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना आवश्यक है । निर्वाण प्राप्त करके ही मनुष्य जन्म-मरण के कष्टों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

बौद्ध धर्म का प्रसार (Expanslon of Buddhlsm)

बौद्ध-धर्म का प्रसार न केवल भारत में वरन विश्व के अनेक देशों में हुआ। बौद-धर्म शनैः-शनैः एक विश्व-धर्म बन गया और एशिया के अनेक देशों में आज भी विद्यमान है।
बौद्ध-धर्म अपने प्रादुर्भाव के थोड़े ही समय में समस्त भारत में फैल गया था। महात्मा बुद्ध के जीवनकाल में ही मगध, कौशल, कौशाम्बी जैसे शक्तिशाली राज्यों के राजाओं एवं प्रजा तथा लिच्छवि, मल्ल तथा शाक्य गणराज्यों की प्रजा ने भी धर्म अपना लिया था। मौर्य सम्राट अशोक और कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध-धर्म, राज्य-धर्म हो गया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और  इत्सिंग के अनुसार बौद्ध-धर्म सातवीं शताब्दी के अन्त तक सारे देश में प्रचलित था।  नवीं तथा दसवीं शताब्दी तक अनेक बौद्ध प्रतिमाएँ महोबा, एलोरा, नासिक, बाघ, अजन्ता तथा दक्षिण के अन्य प्रदेशों में प्राप्त हुई हैं। बारहवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म आंतरिक रूप में दुर्बल होने पर भी भारत में प्रचलित रहा। इसके पश्चात् मुस्लिम युग में बौद्ध धर्म भारत में विलुप्त प्राय: हो गया, परन्तु भारत की सीमाओं के पार वह फलता-फूलता रहा।
तीसरी शताब्दी ई.पू. में मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म भारत के बाहर प्रचलित हुआ। भारत के बाहर मिस्र, मैसीडोनिया, सीरिया, बर्मा और श्रीलंका आदि देशों में बौद्ध धर्म प्रचारक भेजे गए। कनिष्क के शासनकाल में मध्य एशिया में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। मध्य एशिया में काशगर, यारकन्द, खोतान, कूची, तुर्फान आदि स्थानों से प्राप्त अवशेषों से प्रमाणित होता है कि इन स्थानों में बौद्ध धर्म का खूब प्रचार था। मध्य एशिया से बौद्ध धर्म चीन में पहुंचा और वहाँ से उसका प्रसार कोरिया और जापान में हुआ। दक्षिण-पूर्वी एशिया में
हिन्द चीन, थाईलैण्ड, म्यांमार (बर्मा) आदि देशों में बौद्ध धर्म आज भी विद्यमान है।

बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण (Causes of Expansion of Buddhism)

बौद्ध धर्म का प्रसार अत्यधिक तीव्रता से न केवल भारत में वरन् विश्व के अनेक देशों में हुआ । विश्व में श्रीलंका, चीन, जापान, जावा, सुमात्रा आदि अनेक ऐसे देश थे जहाँ बौद्ध धर्म कोअपनाया गया। बौद्ध धर्म के तीव्र गति से प्रसार के प्रमुख कारण निम्नांकित थे-
(1) तत्कालीन प्रचलित धर्म- बौद्ध धर्म के जन्म से पूर्व भारत में वैदिक धर्म प्रचलित था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक वैदिक धर्म इतना अधिक अव्यवहारिक और जटिल हो गया था कि उसका पालन करना जनसाधारण के लिए कष्टकारी था। वैदिक धर्म के अंतर्गत किए जाने वाले यज्ञों और कर्मकाण्डों का जनमानस द्वारा विरोध किया जाने लगा था। ऐसे समय में ही बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे आडम्बर व जटिलता के स्थान पर व्यवहारिकता व सरलता थी। अतः जनसाधारण सहज रूप से बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने लगा।
(2) बौद्ध धर्म की सरलता और व्यवहारिकता- बौद्ध धर्म में धार्मिक अन्धविश्वास, कर्मकाण्ड की जटिलता, कठोर शारीरिक यातनाओं का विधान और यज्ञों का आडम्बर नहीं था। यह धर्म ऐसे नैतिक आचरणों और सदाचार के नियमों पर आधारित था, जो सभी को मान्य थे और व्यवहारिक थे, जिसके परिणामस्वरूप साधारण जनता बौद्ध धर्म की ओर अधिक आकर्षित हुई। 
(3) बौद्ध धर्म की उदारता और सहिष्णुता- बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों में अधिक उदारता, आकर्षण और सहिष्णुता थी। उसमें धर्म प्रचार की कटु, उग्र मनोवृत्ति नहीं थी। इससे जनसाधारण अत्यधिक प्रभावित हुआ और बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो गया।
(4) महात्मा बुद्ध का आकर्षक व्यक्तित्व-  महात्मा बुद्ध का आकर्षक व्यक्तित्व भी बौद्ध धर्म के तीव्र गति से प्रसारित होने का प्रमुख कारण था। महात्मा बुद्ध ने अपने उच्च चरित्र एवं आकर्षक व्यक्तित्व से जनसाधारण के हदय को जीत लिया था। महात्मा बद्ध का व्यक्तित्व सहनशीलता, क्षमा, दया, स्नेह और करुणा का प्रतिरूप था। प्रसिद्ध विद्वान केनेथ ने भी बौद्ध धर्म के प्रसार का मुख्य श्रेय महात्मा बुद्ध के व्यक्तित्व को दिया है। उनके शब्दों में, "जब शुद्ध हृदय व दयाभाव एक ही व्यक्ति में निहित होते है, तो वह व्यक्ति श्रद्धा का पात्र और आराध्य बन जाता है। बौद्ध धर्म की सफलता का यह एक मुख्य कारण था।"
(5) लोकभाषा का उपयोग- महात्मा बुद्ध ने शास्त्रों और ब्राह्मणों की दुरूह संस्कृत भाषा का परित्याग क्र जनता की बोलचाल कि भाषा में उपदेश दिए धर्म चर्चा की, जिसके परिणामस्वरूप उनके उपदेशों को जनसाधारण ने सुगमता से ग्रहण किया तथा उनसे प्रभावित होकर लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी बनने लगे।
(6) महात्मा बुद्ध के उपदेश और धर्म-प्रचार की रोचक शैली-  महात्मा बुद्ध के उपदेश देने तथा अपने सिद्धान्तों का प्रचार करने की शैली बड़ी रोचक और प्रभावोत्पादक थी। उन्होंने धर्म प्रचार और उपदेश के समय न तो दार्शनिक बातों का उपयोग किया और न श्रोताओं को गहन विवादग्रस्त विषयों में डाला। उनके सिद्धान्त और उपदेश दैनिक जीवन से सम्बन्धित होते थे। अपने सिद्धान्तों को समझाने के लिए वह जिन उदाहरणों और उपमाओं का प्रयोग करते थे, उनका सीधा सम्बन्ध मनुष्य के दैनिक जीवन से होता था। महात्मा बुद्ध अपने उपदेशों में हास्य व व्यंग्य का भी प्रयोग करते, जिससे उसमें रोचकता आ जाती थी। 
(7) मध्यम मार्ग का अनुसरण-  महात्मा बुद्ध का मध्यम मार्ग भी उनके धर्म कीका एक कारण था। महात्मा बुद्ध ने एक ओर सांसारिक भोग-विलास का विरोध तो दूसरी ओर घोर तपस्या, शारीरिक यातनाओं, व्रत तथा उपवास का भी विरोध किया। उन्होंने दोनों पक्षों की अति का विरोध किया था, इसलिए जनसाधारण के लिए यह मध्यम माध्यम मार्ग सुगम था। 
(8) राजकीय संरक्षण- बौद्ध धर्म के द्रुतगति से प्रसारित होने का एक प्रमुख कारण उसे राजकीय संरक्षण प्राप्त होना भी था। महात्मा बुद्ध के जीवन-काल में ही मगध, अवन्ति, कौशाम्बी और कोशल राज्यों के राजा उनके अनुयायी हो गये थे। महात्मा बुद्ध के निर्वाण के बाद भी अनेक राज्यों और राजाओं ने बौद्ध को अपनाया था। मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अशोक ने स्वयं अपने महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को लंका भेजा था। इस प्रकार राजकीय संरक्षण के माध्यम से बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य अत्यन्त सुगमता व तीव्रता के साथ हुआ।
(9) बौद्ध संघ- महात्मा बुद्ध केवल एक धर्म-प्रचारक ही नहीं थे, वरन उनमें संगठन की अपूर्व क्षमता भी विद्यमान थी। महात्मा बुद्ध यह भली-भांति जानते थे की संगठन के आभाव में किसी भी धर्म का विकास संभव नहीं है, अतः  उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के लिए संघों की स्थापना की और उनके रहने के लिए मठों की स्थापना की, इन मठों ने बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण सहायता की। 
(10) बौद्ध सभाओं का योगदान- बौद्ध धर्म के प्रसार में चार बौद्ध सभाओं ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन बौद्ध सभाओं को 'बौद्धसंगीतियों' के नाम से भी जाना जाता है।

प्रथम बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध की मृत्यु के कुछ समय उपरांत 483 ई.पू. में राजगृह में हुई। इस बौद्ध सभा की अध्यक्षता कस्सप ने की थी तथा इसमें पाँच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस बौद्ध सभा में बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को विनय पिटक और अभिधम्म पिटक नामक ग्रंथों में संकलित किया गया था। द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई. प.में वैशाली में आयोजित की गयी थी। इस बौद्ध सभा की अध्यक्षता मगध के शासक कालाशोक ने की थी, इस सभा में भिक्षुओं में उत्पन्न हए विवाद को दूर करने का प्रयत्न किया गया था। तृतीय बौद्ध संगीति मौर्य सम्राट  अशोक के शासनकाल में हुई थी। इस बौद्ध सभा की अध्यक्षता तिस्स ने की थी, इस बौद्ध सभा में सुत्त पिटक नामक ग्रंथ की रचना हुई। अंतिम व चतुर्थ बौद्ध संगीति कुषाण वंशीय शासक कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुण्डलवन में हुई थी। इस बौद्ध सभा की अध्यक्षता वासुमित्र नामक विद्वान ने की थी, इस बौद्ध सभा में बौद्ध धर्म की महायान शाखा को मान्यता प्रदान की गई तथा तीनों पिटकों पर टीकाएँ लिखी गई। इन बौद्ध सभाओं से भी बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ।

बौद्ध धर्म के पतन के कारण (Causes of the Downfall of Buddhism)

बौद्ध धर्म दीर्घकाल तक भारत का ही नहीं अपितु एशिया का महत्वपूर्ण धर्म बना रहा, परन्तु कालान्तर में भारत में यह धर्म लुप्त प्रायः हो गया और एशिया में भी इसका प्रभाव क्षीण हो गया। इस धर्म के पतन के प्रमुख कारण निम्नांकित थे-
(1) बौद्ध धर्म के मूल दोष- बौद्धधर्म का प्रादुर्भाव और प्रचार एक सरल व व्यवहारिक धर्म के रूप में हुआ था परन्तु कालान्तर में बौद्ध धर्म विविध नियमों और निषेधों से परिपूर्ण हो गया था। जिन कुरीतियों व प्रथाओं का
महात्मा बुद्ध ने विरोध किया था, वे बौद्ध धर्म में भी आ गई थीं। बौद्ध धर्म मूर्ति-पूजा का विरोध करता था, किन्तु कालान्तर में महात्मा बुद्ध की ही पूजा होने लगी। महात्मा बुद्ध के जीवन-काल में धर्म का प्रचार लोक भाषा में किया जाता था, किन्तु बाद में बौद्ध धर्म का प्रचार संस्कृत में किया जाने लगा, अतः बौद्ध धर्म ने स्वतः ही
लोकप्रियता खोना प्रारम्भ कर दिया।
(2) बौद्ध धर्म का सम्प्रदायों में विभाजन- महात्मा बुद्ध द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म पाँचवी शताब्दी तक 18 सम्प्रदायों में विभक्त हो गया था, जिनमें हीनयान, महायान और वज्रयान सम्प्रदाय प्रमुख थे। इन सम्प्रदायों के विचारों में मतभेद थे । इन मतभेदों ने जनसाधारण के बौद्ध धर्म के प्रति विश्वास को नष्ट कर दिया।
(3) बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार- बौद्ध धर्म के अंतर्गत बौद्ध-संघों की स्थापना बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से की गई थी। कालान्तर में यही बौद्ध-संघ बौद्ध धर्म के पतन का कारण बने। महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को शुद्ध आचरण व सदाचार की शिक्षा प्रदान की थी। किन्तु शनैः-शनैः उनके अनुयायी चरित्रहीन हो गए। बौद्ध संघों में धन और स्त्रियों के प्रवेश करने से भ्रष्टाचार और विलासिता व्याप्त हो गयी। यह भ्रष्टाचार बौद्ध धर्म के बौद्धिक, नैतिक आध्यात्मिक पतन का कारण बना।
(4) ईश्वर में अविश्वास- बौद्ध धर्म का ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं था। कालान्तर में बौद्ध धर्म में बोधिसत्वों की उत्पत्ति और महायान सम्प्रदाय द्वारा उनको सक्रिय बनाने की चेष्टा तथा निर्वाण की विचारधारा में परिवर्तन भी बौद्ध धर्म को हिन्दू देवी-देवताओं के मुकाबले खड़ा नहीं कर सके । जनसाधारण के लिए हिन्दुओं के देवी-देवता अधिक आकर्षक थे, क्योंकि वे सदैव मनुष्य की सहायता के लिए तत्पर थे। इस कारण जनसाधारण के व्यवहारिक जीवन में बौद्ध धर्म सदैव दुर्बल रहा और हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान से उसकी यह दुर्बलता और अधिक स्पष्ट हो गई।
(5) हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान- बौद्ध धर्म के पतन में हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान ने भी सहयोग दिया। मौर्य वंशीय शासकों के उपरान्त भारत में शुंग वंशीय व कण्व वंशीय राजाओं ने शासन किया, जो ब्राह्मण धर्म अर्थात् हिन्दू धर्म के अनुयायी थे। अतः इन शासकों ने हिन्दू धर्म को संरक्षण दिया। इसी प्रकार गुप्त वंशीय शासक भी हिन्दू धर्म के अनुयायी थे, अतः  उन्होंने हिन्दू धर्म को राजधर्म बनाया और संस्कृत भाषा को भी राजभाषा घोषित किया। इस प्रकार हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान से बौद्ध धर्म पतन की ओर अग्रसर होने लगा।
(6) राजकीय संरक्षण का अभाव- कुषाण वंश के शासन के पश्चात् अन्य राजवंशों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान नहीं किया। हर्षवर्धन व कुछ पाल शासकों के अतिरिक्त प्रायः अन्य सभी शासकों ने हिन्दू धर्म का पालन किया। अत: राजकीय संरक्षण के अभाव में बौद्ध धर्म का पतन प्रारम्भ हो गया ।
(7) हूणों तथा मुसलमानों के आक्रमण—पाँचवीं शताब्दी के पश्चात् भारत में हणों के निरंतर आक्रमण होने लगे। जिन प्रदेशों पर इनके आक्रमण हुए, वहाँ उन्होंने बौद्ध-विहारों, मन्दिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे बौद्ध धर्म को गहरा आघात लगा। बारहवीं शताब्दी में तुर्कों ने भारत पर निरंतर आक्रमण करके बौद्ध-विहारों, मन्दिरों, चैत्यों, स्तूपों और शिक्षण संस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओं-भिक्षुणियों की हत्या कर दी । इसके परिणामस्वरूप बचे हुए बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ तिब्बत, नेपाल आदि देशों में भागने पर विवश हुए। अतः बौद्ध धर्म भारत से विलुप्त प्रायः हो गया।

बौद्ध धर्म की भारतीय संस्कृति को देन (Contribution of Buddhism to the Indian Culture)

बौद्ध धर्म ने भारतीय संस्कृति की श्रीसम्पन्नता में वृद्धि की। भारतीय संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र में बौद्ध धर्म ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। बौद्ध धर्म ने भारतीयों में अहिंसा, सहिष्णुता, परोपकार, दया व मानव कल्याण की भावनाओं को विकसित किया तथा उन्हें जाति प्रथा का विरोध करना सिखलाया। बौद्ध धर्म की भारतीय संस्कृति को देन विषय का अध्ययन निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है-
(1) सरल, सबोध और लोकप्रिय धर्म का प्रसार- बौद्ध धर्म की यह एक महान देन है कि भारत में सरल, सुबोध और विशुद्ध आचारवादी लोकप्रिय धर्म का प्रसार हुआ। इस धर्म को साधारण से साधारण व्यक्ति भी समझ सकता था और इसे अपना सकता था। इस धर्म का प्रमुख लक्ष्य सभी लोगों के दु:खों का निवारण करना और सभी को निर्वाण उपलब्ध कराना था।
(2) सामाजिक समानता- बौद्ध धर्म ने भारतीय समाज में प्रचलित जाति प्रथा, ऊंच-नीच और छुआ-छूत का विरोध किया । इससे समाज में , स्वतंत्रता और सामाजिक समानता, उदारता, सहनशीलता की भावनाएँ प्रसारित हुई।
(3) सहिष्णुता- बौद्ध धर्म ने सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया । महात्मा बुद्ध अपने धर्म-प्रचार में सदैव शान्त, सौम्य और विशाल हृदय रहते थे, उनमें कठोरता और कटुता नहीं थी। वह अन्य धर्मों की भी कभी निन्दा नहीं करते थे और
न ही लोगों पर अपना धर्म जबरदस्ती लादते थे। वे अपने विचारों और सिद्धान्तों के प्रचार में बड़े ही उदार और सहिष्णु थे। इसीलिए बौद्ध संघों ने भी कालान्तर में सहिष्णुता की प्रवृत्ति अपनायी।
(4) साहित्यिक देन- बौद्ध धर्म ने भारतीय साहित्य के कोष में भी महत्त्वपूर्ण वृद्धि की। बौद्ध धर्म के विद्वानों द्वारा पालि और संस्कृत भाषा में बौद्ध-दर्शन और धार्मिक विचारधारा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण साहित्य की रचना की गयी। इसके साथ ही महात्मा बुद्ध के जीवन को आधार बनाकर संस्कृत एवं जनभाषाओं में भी साहित्य लिखा गया। इन सबने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया।
(5) दार्शनिक देन- भारतीय दर्शन के विकास में भी बौद्ध धर्म का अभूतपूर्व योगदान रहा, क्योंकि बौद्ध धर्म ने बौद्धिक तथा विचारों की स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया था। बौद्ध विचारकों और दार्शनिकों ने तत्व ज्ञान की विविध समस्याओं पर स्वतंत्रतापूर्वक मनन और चिन्तन किया, जिसके परिणामस्वरूप दर्शन-शास्त्र के क्षेत्र में नवीन विचारधाराओं का प्रादुर्भाव हुआ तथा नवीन दार्शनिक सम्प्रदायों का उदय हुआ। बौद्ध विद्वान नागार्जुन ने शून्यवाद और माध्यमिक दर्शन का प्रतिपादन किया। इनके अतिरिक्त विज्ञानवाद, प्रतीत्य-समुत्पाद, सर्वास्तिवाद, सौत्रान्तिक, अनित्यवाद और योगाचार आदि अन्य दार्शनिक विचारधाराएँ और प्रणालियाँ प्रारम्भ हुई। नागार्जुन, अश्वघोष, असंगवसुमित्रधर्मकीर्ति एवं दिग्नार आदि प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक थे, जिन्होंने बौद्ध दार्शनिक साहित्य का सृजन किया।
(6) कला के क्षेत्र में देन- बौद्ध धर्म की सर्वोत्कृष्ट अद्वितीय देन कला के क्षेत्र में है। बौद्ध धर्म के प्रभाव से वास्तुकला, चित्रकला और मूर्तिकला का पर्याप्त विकास हुआ। गया का बौद्ध मंदिर, बौद्ध कला की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है। अजन्ता,एलोरा, बारबरा व बाघ की गुफाओं में बौद्धकालीन स्थापत्य कला व चित्रकला की अनुपम कृतियाँ हैं।
(7) विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार- भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रसार भी बौद्ध धर्म की प्रमुख देन है। वास्तव में बौद्ध धर्म प्रथम भारतीय धर्म था, जिसने देश की सीमाओं को पार कर विदेशों में अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। बौद्ध धर्म के प्रचारक भारत से निकलकर श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, तिब्बत, चीन, जापान, स्याम, कम्बोडिया आदि दूर दूर के देशों में गए और भारतीय संस्कृति का प्रसार किया।
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इतिहास- जैन धर्म [JAINISM]

JAINISM
महावीर स्वामी 

जैन धर्म [JAINISM]

"जैन दर्शन को एक वाक्य ही संग्रहीत किया जा सकता है। जीव तथा अजीव के पारस्परिक संपर्क से ऊर्जाओं का निर्माण होता है जिसके कारण जन्म, मृत्यु तथा जीवन के विभिन्न अनुभवों का आविर्भाव होता है। इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है तथा पूर्व निर्मित ऊर्जा का भी विनाश हो सकता है, यदि निर्वाण को प्राप्त करने के लिए आवश्यक संयमित जीवन व्यतीत किया जाए।"          - डॉ. हीरा लाल जैन

जैन धर्म की प्राचीनता के विषय में कुछ समय पूर्व तक विद्वानों में मतभेद था, पहले विद्वानों का विचार था कि महावीर स्वामी ही जैन धर्म के संस्थापक थे, किन्तु अब नवीन शोध कार्यों से यह प्रमाणित हो चुका है कि जैन धर्म अत्यन्त प्राचीन है,सम्भवतः वैदिक काल में ही इसकी स्थापना हो गयी थी । महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे। इनसे पूर्व 23 तीर्थकर जैन धर्म का प्रचार कर चुके थे। जैन जनश्रुतियों के अनुसार जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर  ॠषभदेव थे। इस प्रकार जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक ऋषभदेव थे।

जैन धर्म के 24 तीर्थकर निम्नांकित थे-
1. ऋषभदेव, 2. अजितनाथ, 3. सम्भवनाथ, 4. अभिनन्दन, 5. सुमतिनाथ, 6. पद्मप्रभु, 7. सुपार्श्र्वनाथ, 8. चन्द्रप्रभु , 9. सुविधि, 10. शीतल, 11. श्रेयांस, 12. वासुपूज्य, 13. विमल, 14. अनन्त, 15. धर्म, 16. शान्ति, 17. कुन्थ, 18. अर, 19. मल्लि, 20. मुनि सुबत, 21. नेमिनाथ, 22. अरिष्टनेमि, 23. पार्श्वनाथ,  24. महावीर स्वामी ।

महावीर स्वामी, 599 ई.पू. - 527 ई.पू. [MAHAVIR SWAMI, 599 B.C. - 527 B.C.]

महावीर स्वामी, जैन धर्म के संस्थापक नहीं ,वरन् वह जैन धर्म के चौबीसवें व अन्तिम तीर्थकर थे। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में अपेक्षित सुधार करके इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया था। महावीर स्वामी का जन्म वैशाली (बिहार) के निकट कुण्डग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। महावीर स्वामी के बचपन का नाम 'वर्धमान' था। महावीर स्वामी के पिता का नाम का नाम सिद्धार्थ था, जो कुण्डग्राम के राजा थे। महावीर स्वामी की माँ का नाम त्रिशला था,जो लिच्छवि शासक चेटक की बहिन थीं । राज परिवार उत्पन्न होने के कारण महावीर स्वामी का प्रारम्भिक जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण व्यतीत हुआ। महावीर स्वामी बचपन से ही गम्भीर एवं चिन्तनशील प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के समय महावीर स्वामी की आयु 30 वर्ष थी, तभी उन्होंने संन्यास धारण कर लिया तथा ज्ञान प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगे। तेरह माह पश्चात जाडे के मौसम में उन्होंने वस्त्र त्यागकर नग्नावस्था में तप किया। कल्पसूत्र और 'आचरांग सूत्र' के अनुसार महावीर स्वामी
ने ज्ञान-प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की। तपस्वी जीवन के 12 वर्ष पश्चात जम्भियग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के चित्र पर साल वृक्ष के नीचे महावीर स्वामी को ‘कैवल्य ज्ञान' (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके कारण उन्हें ‘केवलिन' पुकारा गया। अपनी इन्द्रियों को जीतने के कारण वे ‘जिन’ कहलाए और अपने पराक्रम के कारण 'महावीर के नाम से विख्यात हुए।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर स्वामी ने धर्म प्रचार का कार्य प्रारम्भ किया। महावीर स्वामी को 42 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त हुआ था, उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम 30 वर्ष धर्म प्रचार में ही व्यतीत किए। महावीर स्वामी ने अनेक राज्यों में स्वयं जाकर जैन धर्म का प्रचार किया। उन्होंने काशी, अंग, मगघ, मिथिला व कौशल आदि राज्यों में घूम-घूम कर अपने धर्म का प्रचार किया। 527 ई.पू. में 72 वर्ष की अवस्था में पावापुरी (जिला—पटना) में महावीर स्वामी की मृत्यु हुई। 

जैन धर्म के सिद्धान्त अथवा महावीर स्वामी की शिक्षाएँ (Principles of Jainism or the Teachings of Mahavir Swami)

महावीर स्वामी जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं थे, वे जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे, उन्होंने जैन धर्म का पुनरुद्धार किया था। महावीर स्वामी ने जैन धर्म के सिद्धान्तों को सुव्यवस्थित किया तथा जैन संघ की स्थापना की थी। महावीर स्वामी ने सत्य का पता लगाने में वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार किया तथा तीर्थकरों के कैवल्य ज्ञान और उनके वचनों को ही प्रामाणिक माना।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों एवं महावीर स्वामी की शिक्षाओं का अध्ययन निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-
(1) त्रिरत्न-  जैन धर्म में मोक्ष की प्राप्ति के लिए त्रिरत्नों का पालन करना आवश्यक बतलाया गया है । ये त्रिरत्न हैं- (अ) सम्यक-दर्शन-- सत्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा ही सम्यक-दर्शन है। सम्यक-दर्शन का तात्पर्य जैन तीर्थकरों में विश्वास रखने से है।
(ब) सम्यक् ज्ञान-  सम्यक ज्ञान, सत्य व असत्य के अन्तर को स्पष्ट करता है। जब मनुष्य परोक्ष तथा अपरोक्ष दोनों प्रकार की वस्तुओं का  ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब वह ज्ञानसम्यक-ज्ञान  के नाम से पुकारा जाता है।
(स) सम्यक्-चरित्र- अहितकारी कार्यों का निषेध तथा हितकारी कार्यों का आचरण ही सम्यक्-चरित्र है।

जैन धर्म के अनुसार यदि व्यक्ति इन त्रिरत्नों को प्राप्त कर लेता है, तो वह अपनी आत्मा को बन्धन मुक्त कर सकता है।

(2) पंच महाव्रत- महावीर स्वामी ने जैन धर्म के अनुयायियों को पंच महाव्रत का उपदेश दिया था। इन पंच महाव्रतों में प्रथम चार व्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) का प्रतिपादन के जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ ने किया था तथा पाँचवें व्रत (ब्रह्मचर्य) का प्रतिपादन महावीर स्वामी ने किया था। जैन धर्म के पंच महाव्रत निम्नांकित हैं- 

(अ) अहिंसा- अहिंसा का अर्थ है- जीव मात्र के प्रति दया का व्यवहार करना, जीवों की हत्या न करना।
(ब) सत्य- सत्य के अन्तर्गत मिथ्या का वचन का परित्याग करना आवश्यक था। इस व्रत के अनुसार व्यक्ति को सदैव सत्य बोलना चाहिए । सत्य बोलने के लिए व्यक्ति को लोभ, मोह, माया एवं क्रोध से दूर रहना चाहिए।
(स) अस्तेय- चोरी करना, बिना चुंगी दिए माल बेचना, चोरी का माल बेचना, कम तोलना आदि सभी अस्तेय के अन्तर्गत आते हैं। इनसे बचने का प्रयत्न करना चाहिए।
(द) अपरिग्रह- अपरिग्रह व्रत के अन्तर्गत उन सभी वस्तुओं का परित्याग है जिनके द्वारा इन्द्रिय सुख की उत्पत्ति होती है ।
(य) ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वासनाओं के परित्याग से है। सभी इन्द्रिय या विषय-वासनाओं को त्यागकर संयम का जीवन व्यतीत करना ब्रह्मचर्य व्रत कहलाता है।

(3) अनीश्वरवादिता- जैन धर्म ईश्वर को सृष्टि के रचयिता एवं पालनकर्ता के रूप में ही स्वीकार नहीं करता है। जैन धर्म के अनुसार संसार अनादि और अनंत है तथा छह द्रव्यों- धर्म, अधर्म, पुदगुल व जीव द्वारा स्थिर है। जैन धर्म के अनुसार ईश्वर नाम की कोई ऐसी सत्ता नहीं है. जो जीव-जन्तुओं के सुख या दु:ख की निर्धारक हो । जैन धर्म के अनुसार केवल स्वकर्मों से ही सुखदु:ख मिलता है ।

(4) आत्मवादिता- जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। जैन धर्म के अनुसार न केवल मनुष्यों व जानवरों में बल्कि प्रत्येक जीव, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में भी आत्मा होती है। प्रत्येक जीव में अलग-अलग आत्मा होती है। जैन धर्म के अनुसार आत्मा सर्वदृष्टा है परन्तु कर्म-जाल तथा मोह के बन्धन इसकी शक्ति को क्षीण कर देते हैं। आत्म सुख-दुख अनुभव करती है। यदि आत्मा को मुक्त करना है तो उसे कर्म के बन्धनों से भी मुक्त करना होगा। 

(5) वेदों में अविश्वास- जैन धर्म के अनुयायी वेदों में विश्वास नहीं करते हैं। वेदों में ईश्वर और सृष्टि के बारे में, जो  कुछ कहा  गया है, उस पर इनका विश्वास नहीं है। जैन धर्म ने  ब्राह्मण धर्म में व्याप्त कुरीतियों की भी आलोचना की है। अहिंसात्मक नीति का पालन करने के कारण जैन धर्म, ब्राह्मण धर्म में प्रचलित पशु-बलि व यज्ञों का भी घोर विरोधी है।

(6) कर्म व पुनर्जन्म में विश्वास- जैन धर्म कर्म को प्रधानता देता है तथा पुनर्जन्म में विश्वास करता है। जैन धर्म के अनुसार, इस संसार में जो भी जन्म लेता है, उसे अपने वर्तमान जीवन के कर्मों और पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। कर्म का पुनर्जन्म के साथ सीधा सम्बन्ध है। कर्मों के आधार पर ही अगला जन्म होता है । मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करके ही जन्म-पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है ।

(7) निवृत्ति मार्ग- जैन धर्म में निवृत्ति मार्ग को प्रधानता दी गई है । जैन धर्म के अनुसार संसार दु:खों से परिपूर्ण है, अतः दुःखों से निवृत्ति आवश्यक है। जैन धर्म में दु:खों का वास्तविक कारण तृष्णा माना गया है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को तृष्णा त्यागकर निवृत्ति का मार्ग अपनाना चाहिए। 

(8) अहिंसा- कर्म और पुनर्जन्म के समान ही अहिंसा का सिद्धान्त भी जैन धर्म में विशेष महत्व रखता है। 'अहिंसा परमो धर्म'  यह विचार जैन धर्म का मूलमन्त्र है। जैन धर्म के अनुसार जड़ व चेतन दोनों प्रकार की वस्तुओं में जीव का अस्तित्व है। जैन धर्म के अनुसार जीव की हत्या न करना ही पर्याप्त नहीं है वरन् हिंसा के विषय में सोचना, बोलना व दूसरों को हिंसा करने देना भी अधर्म है।

(9) समानता व सदाचार पर बल- जैन धर्म, ब्राह्मण धर्म की प्रचलित जाति प्रथा (वर्ण-व्यवस्था) का विरोध करता है। जैन धर्म के अनुसार शूद्र व ब्राह्मण में कोई अन्तर नहीं है। निर्वाण प्राप्त करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है, चाहे वह शूद्र हो अथवा ब्राह्मण। इसके अतिरिक्त जैन धर्म सदाचारी एवं नैतिक जीवन व्यतीत करने पर बल देता है।

(10) निर्वाण- जैन धर्म में निर्वाण अर्थात् मोक्ष-प्राप्ति को ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना जाता है। महावीर स्वामी के अनुसार कर्म-बन्धन से मुक्ति पाना ही मोक्ष अथवा निर्वाण है। कर्मबन्धन से मुक्ति पाने के लिए यह आवश्यक है कि पूर्व-जन्म के दुष्कर्मों का नाश किया जाए और वर्तमान जन्म में सत्कर्म किए जाएँ। जैन धर्म निर्वाण प्राप्त करने के लिए 'त्रिरत्न' को भी आवश्यक मानता है।

जैन धर्म का प्रसार (Expansion of Jainism)

महावीर स्वामी ने समाज के सभी वर्गों में अपने धर्म का प्रचार करने का प्रयास किया था। महावीर स्वामी के राजघराने से सम्बन्धित होने के कारण अनेक राजवंशों ने जैन धर्म को आश्रय प्रदान किया था, जिससे जैन धर्म का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ था। जैन धर्म का संगठित करने एवं इसके और अधिक प्रसार करने के लिए महावीर स्वामी ने ‘जैन संघ' की स्थापना की थी। महावीर स्वामी के समय में जैन धर्म कोशल, विदेह, मगध, अंग, काशी, मिथिला गया था। महावीर स्वामी के पश्चात् जैन संघ और प्रचारकों ने जैन धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात भी जैन धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता रहा । कालान्तर में जैन धर्म के प्रसार का मुख्य आधार जैन धर्म के अनुयायियों का भारत के विभिन्न प्रदेशों में जाकर बसना था। इस प्रकार जैन धर्म का प्रसार उड़ीसा, दक्षिण भारत, मथुरा, उज्जयिनी, जूनागढ़ और गुजरात तक हुआ। मौर्यवंश व गुप्त वंश के शासनकाल के मध्य में जैन धर्म पूर्व में उड़ीसा से लेकर पश्चिम में मथुरा तक फैला हुआ था।

महावीर स्वामी की मृत्यु के लगभग दो सौ वर्ष पश्चात् जैन धर्म मुख्यत: दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया- (1) दिगम्बर जैन और (2) श्वेताम्बर जैन, ये दोनों सम्प्रदाय आज तक विद्यमान हैं। श्वेताम्बर जैन-मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर जैन-मुनियों के लिए नग्न रहना आवश्यक है। इस विभाजन के बावजूद भी जैन धर्म की प्रगति होती रही और उत्तर भारत, काठियावाड़, गुजरात, राजस्थान, मैसूर और हैदराबाद आदि प्रदेशों में उसका प्रसार हुआ। किन्तु जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या सदैव सीमित रही, आज भी उनकी संख्या अधिक नहीं

जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन (Contribution of Jainism to Indian Culture)

यद्यपि जैन धर्म का प्रचा-रप्रसार अधिक नहीं हो पाया, फिर भी जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया और भारतीय दर्शन, साहित्य तथा कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन विषय का अध्ययन निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-
(1) अहिंसा का सिद्धान्त- अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य देन है। यह सत्य है कि जैन धर्म द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सिद्धान्त कोई नवीन सिद्धान्त नहीं था, परन्तु यह भी सत्य है कि अहिंसा का प्रचार जितना जैन धर्म द्वारा किया गया, उतना किसी अन्य धर्म ने नहीं किया। महावीर स्वामी ने पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों तक की हत्या न करने का अनुरोध अपने अनुयायियों से किया था। जैन धर्म के इस सिद्धान्त का हिन्दुओं पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा। यह अहिंसा के सिद्धान्त का ही प्रभाव है कि समस्त देश में 'दया' ही धर्म का प्रधान अंग माना जाता है ।

(2) कर्म व पुनर्जन्म का सिद्धान्त- जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को दूसरी देन 'कर्म व पुनर्जन्म' का सिद्धान्त है। कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धान्त में भारतीय जैन धर्म से पहले भी विश्वास करते थे, किन्तु जैन धर्म के प्रवर्तकों तथा प्रचारकों ने इस सिद्धान्त को इतना वैज्ञानिक और सुबोध से बना दिया कि भारत का जन-जन यह जान गया कि "जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे" अर्थात् जैसा कर्म तुम करोगे, उसका फल तुमको अवश्य मिलेगा। यह सिद्धान्त अब भारत में इतना प्रचलित हो गया है कि यह भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गया है।

(3) दर्शन के क्षेत्र में देन- जैन धर्म ने भारतीय दर्शन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दर्शनशास्त्र में जैन धर्म का 'स्यादवाद' अपना विशिष्ट महत्व रखता है। 'स्यादवाद' जैन धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है । इसका अभिप्राय यह है कि जो बात कही जा रही है, वह किसी विशेष अपेक्षा से कही जा रही है, परन्तु यह बात अन्य दृष्टिकोणों से या अपेक्षाओं से भी कही जा सकती है और नहीं भी कही जा सकती है। ‘स्यादवाद’ के अतिरिक्त भी अनेक मौलिक सिद्धान्तों को जैन धर्म ने भारतीय संस्कति को प्रदान किया है।

(4) सामाजिक देन- समाज के क्षेत्र में भी जैन धर्म की देन महत्वपूर्ण है। जैन धर्म को आश्रय प्रदान करने वाले शासकों ने जैन धर्म से प्रेरित होकर समाज के निर्धन वर्ग के लिए अनेक औषधालयों, विश्रामालयों  व पाठशालाओं का निर्माण कराया। शासकों के इन समाजकार्यों से प्रेरित होकर समाज के अन्य वर्गों में भी निर्धनों के प्रति दया-भाव जाग्रत हुए। जैन धर्म ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए भी सार्थक प्रयत्न किए। महावीर स्वामी ने समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था (जाति प्रथा) का भी विरोध किया, जिससे सामाजिक समानता की भावना का प्रादुर्भाव हुआ।

(5) साहित्यिक देन- जैन धर्म में अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की गयी । श्वेताम्बर तथा दिगम्बर जैन सम्प्रदायों ने अनेक धार्मिक ग्रन्थों का सृजन किया, जिनमें अंग और कल्पसत्र प्रमुख ग्रन्थ हैं। हेमचन्द्र सूरी नामक विद्वान ने व्याकरण कोष, छन्द, शास्त्र तथा व्याकरण पर अनेक ग्रन्थ लिखे। जैन विद्वानों ने अपने साहित्य की रचना मुख्यत: प्राकृत नामक लोकभाषा में की । प्राकृत भाषा को समृद्ध बनाने में जैन धर्म का विशेष योगदान रहा।

(6) कला के क्षेत्र में देन- जैन धर्म का कला के क्षेत्र में भी अपूर्व योगदान रहा। जैन धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तथा तीर्थकरों की स्मृति को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए कलात्मक मन्दिरों, स्तूपों, मठों, स्तम्भ,प्रवेश-द्वार, गुफाओं और निर्माण कराया। मध्य प्रदेश में खजुराहो में अनेक जैन मन्दिर हैं। इनमें पार्श्वनाथ, शान्तिनाथ तथा आदिनाथ के मन्दिर विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

(7) धार्मिक देन- जैन धर्म के प्रचारकों ने तत्कालीन प्रचलित ब्राह्मण धर्म के अन्धविश्वासों तथा कर्मकाण्डों की व्यापक आलोचना की, जिससे ब्राह्मणों को अपने धर्म की कुरीतियों और दोषों का ज्ञान हुआ। अपने धर्म के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए यह  आवश्यक हो गया कि वे (ब्राह्मण) उसमें सुधार करें। अतः जैन धर्म के कारण तत्कालीन प्रचलित ब्राह्मण धर्म पहले की अपेक्षा अधिक सरल और आडम्बरहित हो गया।
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