Results for जैव विविधता

बायोस्फीयर रिजर्व (BIOSPHERE RESERVE)

BIOSPHERE RESERVE
बायोस्फीयर रिजर्व 

बायोस्फीयर रिजर्व (BIOSPHERE RESERVE)

बायोस्फियर रिजर्व ऐसे स्थल होते हैं जहाँ पर (पेड़, पौधे व जन्तुओं) प्राकृतिक (Natural), कम-से-कम प्रभावित (Minimum disturbed), मानव द्वारा रूपान्तरित (Man modified) एवं अवनति प्राप्त (Degraded) पारिस्थितिक तन्त्रों या वन्य जीवों को सुरक्षित रखा जाता है । बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम को सर्वप्रथम यूनेस्को (UNESCO) द्वारा सन् 1971 में मैन एवं बायोस्फियर प्रोग्राम (Man and Biosphere Programme) के अन्तर्गत प्रारम्भ किया गया था ।

बायोस्फियर रिजर्व के उद्देश्य (Objects of Biosphere Reserve)

बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) प्रत्येक पारिस्थितिक तन्त्र के प्रतिनिधि नमूनों की जानकारी रखना।
(2) लम्बे समय तक आनुवंशिक विविधता का संरक्षण करना।
(3) बेसिक एवं व्यावहारिक अनुसन्धान (Basic and Applied research) को बढ़ावा देना।
(4) जैविक संसाधनों के उचित प्रबन्ध को बढ़ावा देना।
(5) अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि करना।
(6) शिक्षा एवं प्रशिक्षण के क्षेत्र में नयी सम्भावनाओं को ढूंढना।
संक्षेप में हम कह सकते हैं बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम (BRP) निम्नलिखित चार सम्मिलित उद्देश्यों (Combined objectives) की पूर्ति हेतु स्थापित किये जाते हैं
(1) संरक्षण (Conservation), (2) शोधकार्य (Research), (3) शिक्षा (Education), (4) स्थानीय भागीदारी (Local involvement)।
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जीव विज्ञान - जैव-विविधता का संरक्षण (CONSERVATION OF BIODIVRSITY)

CONSERVATION OF BIODIVRSITY
जैव-विविधता का संरक्षण 

जैव-विविधता का संरक्षण (CONSERVATION OF BIODIVRSITY)

मनुष्य की जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि (Populaion explosion) के कारण जैव-विविधता में लगातार कमी आ रही है। जिसके कारण वनों की लगातार कटाई हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप जीवों के प्राकृतिक आवास (Natural habitat) समाप्त होते जा रहे हैं। अत: जैव-विविधता का संरक्षण अतिआवश्यक हो गया है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर उपस्थित वनों के क्षेत्रफल में लगातार कमी आती जा रही है और आज उसके 55 भाग पर ही वन शेष बचे हैं। विश्व में प्रतिवर्ष 1,00,000 वर्ग किमी क्षेत्रफल में उपस्थित वनों की कटाई हो रही है। भारतवर्ष में प्रतिवर्ष वनों की कटाई की दर 13,000 वर्ग किमी है। इस प्रकार जैव-विविधता में वनों की कटाई एवं पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभावों के कारण लगातार कमी आ रही है, अत: संरक्षण करना अतिआवश्यक है, अन्यथा एक दिन ऐसा आयेगा जब पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीवधारी समाप्त हो जायेंगे।
जैवविविधता के संरक्षण करने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं
(1) वनों एवं प्राकृतिक सम्पदा (Natural wealth) तथा उसकी जैविक परिपूर्णता (Biological richness) को संरक्षित रखने के लिए।
(2) वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन स्तर (Orone layer ) के विघटन, अम्ल वर्ष (Acid rein) एवं पृथ्वी के बढ़ते हुए तापक्रम पर नियन्त्रण करने हेतु। 
(3) अपनी दैनिक आवश्यकताओं (Daily needs), जैसे- भोजन (Food), रेशे (Fibres), इंधन (Fuel) एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों की पूर्ति हेतु ।
(4) मनुष्य के अस्तित्व की रक्षा करने हेतु, जो कि प्रजाति विविधता में कमी के कुप्रभावों से आशंकित हैं।
(5) नई हर्बल औषधियों (Herbal medicine), पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं (Nuritional needs), पूरक भोजन
(Supplementary food) प्राप्त करने हेतु ।
(6) पर्यावरण सन्तुलन को बनाये रखने के लिए।

जैव-विविधता संरक्षण के उपाय (Methods of Conservation Biodiversity)

जैव-विविधता के महत्वों को देखते हुए इसका संरक्षण करना अतिआवश्यक हैं। जैव-विविधता के संरक्षण हेतु निम्नलिखित तीन स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं-
(1) आनुवंशिक विविधता का संरक्षण (Conservation of genetic diversity) आनुवंशिक विविधता के संरक्षण से उस जाति का संरक्षण सम्भव होता है।
(2) जाति विविधता का संरक्षण (Conservation of species diversity)
(3) पारिस्थितिक तन्त्र की विविधता का संरक्षण (Conservation of ecosystem diversity)।
विविधता का संरक्षण निम्नलिखित दो विधियों के द्वारा किया जा सकता है - 
(A) इन- सिटू संरक्षण (In-situ conservation) एवं
(B) एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ conservation), दोनों प्रकार के संरक्षण एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

(A) इन- सिटू संरक्षण (In-situ conservation)- इसके अन्तर्गत जैव-विविधता का संरक्षण उनके मूल आवासों (Original habitats) में ही किया जाता है। हमारे देश में जैव-विविधता के संरक्षण हेतु भारत सरकार ने सन् 1952 में इण्डियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थापना की है जो कि वन्य-जीवन एवं जैव-विविधता के संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाती है-
(1) राष्ट्रीय उद्यानों (National parks) की सहायता से,
(2) अभ्यारण्यों (Sanctuaries) की सहायता से,
(3) प्राणी उद्यानों (zoological parks) की सहायता से।
जून, 1992 तक हमारे देश राष्ट्रीय उद्यान तथा 41 अभ्यारण्य शरणस्थल (Sanctuaries) स्थापित थे। भारत सरकार ने जन्तुओं को उनके स्वयं के पारिस्थितिक तन्त्र में प्रतिबन्धित विकास (Unhindered evoluto) हेतु  बायोस्फियर रिजर्व (Biosphere reserve) की स्थापना की है।

(B) एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ conservation)- इसके अन्तर्गत जीवों एवं पेड़-पौधों का संरक्षण उनके मूल आवास से दूर ले जाकर किया जाता है। इसके अन्तर्गत पौधों का संरक्षण निम्नलिखित प्रकार के माध्यम से पेड़-पौधों को उनके आवास से दूर स्थापित विभिन्न स्थानों एवं प्रयोगशालाओं में किया जाता है-
(1) वानस्पतिक उद्यानों (Boanical gardens) में,
(2) वानिकी अनुसंधान संस्थाओं (Forestry Research Institutions) में,
(3) कृषि अनुसंधान केन्द्रों (Agricultural Research Institutions) तथा अन्य संरक्षण साधनों के द्वारा।

एक्स-सिटू संरक्षण संरक्षण में पौधों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित तीन तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
(1) बीज बैंक (Seed Bank),
(2) जीन बैंक (Gene Bank),
(3) इन विट्रो स्टोरेज विधि (In vitro storage method)।
भारतवर्ष में वर्तमान स्थिति में लगभग 33 वानस्पतिक उद्यान, 33 विश्वविद्यालयीन जैविक उद्यान (University Biological Gardens), 107 चिड़ियाघर (Zoo), 49 मृग उद्यान (Dear park) तथा 24 प्राकृतिक प्रजनन केन्द्र (Natural Breeding Centres) इन क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
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जीव विज्ञान - लुप्तप्राय या संकटापन्न जीव [ENDANGERED SPECIES]

ENDANGERED SPECIES
ENDANGERED SPECIES

लुप्तप्राय या संकटापन्न जीव (ENDANGERED SPECIES)

अब विभिन्न कारणों से विश्व के कई जीव को कभी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते थे, या तो विलुप्त हो गये हैं या जल्दी ही विलुप्त होने वाले हैं। अकेले हमारे देश में अब तक लगभग 200 किस्म के पशु-पक्षी विलुप्त हो चुके हैं तथा लगभग 800 किस्म के वन्य जीवों के विलुप्त होने की आशंका है। इनमें से भी लगभग 250 किस्म के वन्य जीव तो विलुप्त होने के लिए तैयार हैं। उदाहरणार्थ- पिग्मी, चिम्पांजी, तेंदुआ (Leopard), सिंह (Lion), चीता (Cheetah), बाघ (Tiger), जगुआर (Jaguar, एक प्रकार का चीता), ध्रुवीय भालू, हाथी, पर्वतीय गोरिल्ला, गैंडे की कई जातियाँ तथा कुछ पक्षियों, जातियां विलुप्तप्राय हैं, क्योंकि मनुष्य इनका अन्धाधुन्य उपयोग- शिकार, भोजन, त्वचा इत्यादि के लिए करता आ रहा है।
इसी प्रकार पौधों की बहुत-सी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं तथा शेष विलुप्तता के कगार पर खड़ी हैं।
उदाहरणबारबेरिस, नीलग्रिएन्सिस, बेंटेकिया निकोबेरिका, क्यूप्रेशस केशमेरिआनो आदि।

लप्तप्राय या संकटापन्न प्रजातियों के प्रकार (Types or Endangered Species)

 द इण्डियन प्लाण्ट्स रेड डाटा बुक में संकटापन्न प्रजातियों को निम्नलिखित समूहों में किया गया है-
(1) विलुप्त (Extinct)- ऐसे पौधे, जो कि पूर्व में किसी स्थान विशेष में पाये जाते थे, लेकिन वर्तमान में वे अपने प्राकृतिक स्थानों से लुप्त हो गये हैं, उन्हें ही विलुप्त प्रजातियाँ कहते हैं। ऐसे पौधे जब उनके प्राकृतिक आवास स्थानों पर उपलब्ध नहीं होते, तब इन्हें विलुप्त प्रजाति माना जाता है। अत: इनका संरक्षण असम्भव होता है।

(2) लुप्तप्राय (Endangered)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि लुप्त होने की स्थिति में हों एवं यदि वही पारिस्थितिक परिस्थितियाँ बनी रहें, तब उन्हें विलुप्त होने से नहीं बचाया जा सकता है अर्थात् जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा बना रहता है। उन्हें लुप्तप्राय या इनडेन्जर्ड प्रजाति कहते हैं। ऐसी प्रजातियों की संख्या धीरे-धीरे इतनी कम हो जाती है कि उनमें प्रजनन की सम्भावनाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे ये विलुप्त होने लगती हैं।
(3) वल्नरेबल (Valnerable)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि कुछ ही समय में लुप्तप्राय स्थिति में पहुँचने वाली हों, उन्हें ही वल्नरेबल प्रजातियां कहते हैं। यदि इन्हें लगातार उन्हीं पारिस्थितिक स्थितियों का सामना करना पड़ता है, तब ये प्रजातियाँ भी लुप्त होने लगती है। 
(4) दुर्लभ (Rare)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि संसार में कहीं-कहीं पर और बहुत कम संख्या में उपलब्ध हों, उन्हें ही दुर्लभ प्रजातियाँ कहते हैं। ऐसी प्रजातियां प्रारम्भ से ही लुप्तप्राय या वल्नरेबल नहीं होतीं लेकिन धीरे-धीरे लुप्तप्राय स्थिति में आ जाती हैं और अन्त में समाप्त हो जाती हैं।
(5) अपर्याप्त जानकारी (Insufficient knowledge)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जिनके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता है कि वे किस समूह (1 से 4) के अन्तर्गत आते हैं, ऐसी प्रजातियों के बारे में हमें सही जानकारी नहीं मिल पाती, लेकिन धीर-धीर ये लुप्तप्राय स्थिति में आ जाती है।
(6) खतरे से बाहर (Out of dange)- ऐसी समस्त पादप प्रजातियाँजो कि उपरोक्त श्रेणियों (1 से 5) के अन्तर्गत पहुँच चुकी होती हैं, लेकिन उनके संरक्षण के पश्चात् पूर्व के वास्-स्थान पर स्थापित हो जाती हैं, उन्हें इस समूह के अन्तर्गत रखा जाता है।
सन् 1980 में भारतीय वानस्पतिक सर्वे संस्थान (Boanical Suracy of India) ने ‘थ्रेटेण्ड प्लांट ऑफ  इण्डिया' (Threatened Plants of India) नामक पुस्तक में संकटापन्न पौधों का वर्णन किया है। सन् 1984 में बी.एस.आई. (BSI) ने पुन: एक नयी पुस्तक "द इण्डियन प्लाण्ट्स रेड डाटा बुक" (The Indian Plants Red Data Book) का प्रकाशन किया, जिसमें 125 संकटपन्न  आवृत्तबीजी पौधों का वर्णन किया गया हैं।
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जीव विज्ञान - रेड डाटा बुक [RED DATA BOOK]

रेड डाटा बुक 

रेड डाटा बुक  [RED  DATA BOOK]

विश्व संरक्षण संघ (World Conservation Union) जिसे पूर्व में अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदा संरक्षण संघ (I.U.C.N. or IUCNNR) के नाम से जाना जाता था, के अनुसार विश्व के सभी भागों में विभिन्न कारणों से जैवविविधता में लगातार कमी आती जा रही है। यदि यही स्थिति रही तो पृथ्वी से महत्वपूर्ण प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का खतरा और बढ़ जाएगा। इसे ध्यान में रखते हुए IUCN ने एक रेड डाटा बुक (Red data book) प्रकाशित की, जिसमें संकटापन्न जीवों की प्रजातियों के प्रकार तथा उन प्रजातियों का वर्णन किया गया है जो कि विलोपन के खतरे से गुजर रही हैं। यह पुस्तक सर्वप्रथम 1963 में प्रकाशित की गयी थी। 2004 में इसे संशोधित कर प्रकाशित किया गया है।
 IUCN के पाँच वर्ग जो संरक्षण के लिये बनाये गये थे उसका उपयोग विश्व संरक्षण मॉनीटर केन्द्र (World Conservation Motoring centure) ने किया और लगभग 60000 पादप और 2000 प्राणियों की जाति को खतरों से चिन्हांकित कियाइन प्राणियों का वर्णन रेड डाटा बुक (Red Data Book) में किया गया है। रेड डाटा बुक में प्रकाशित जातियों को थ्रेटेन्ड जाति (Threatened species) का नाम दिया गया।  IUCN के तीन वर्ग-संकटापन्न (Endangered), सुभद्य (Vulnerable) एवं दुर्लभ (Rare) प्रजातियाँ इस थ्रेटेन्ड जातियों के अन्तर्गत आते हैं। रेड डाटा बुक में पादप जातियों का वर्णन अधिक है लेकिन कुछ प्राणी समुदाय भी इसके अन्तर्गत आते हैं , जैसे-मछली, जिनकी जातियों की संख्या (343) है, उभयचर जिनकी जातियों की संख्या (50), इसी प्रकार सरीसृप (170), अकशेरुकी (1355), पक्षी (103) एवं स्तनधारियों की (497) जातियाँ शामिल हैं। इसके पश्चात् IUCN ने 1978 में प्लांट रेड डाटा बुक का प्रकाशन किया और सन् 1988 में IUCI ने रेड डाटा लिस्ट ऑफ ग्रेटेड एनिमल्स  (Red Data List of Treatened Animals) का प्रकाशन किया।

इन पुस्तकों को प्रकाशित करने का प्रमुख उद्देश्य निम्नानुसार हैं-
(1) संकटप्राय प्रजातियों के प्रति जनजागरण उत्पन्न करना एवं सूचना प्रसारित करना।
(2) संकटग्रस्त प्रजातियों को पहचानकर उनका अभिलेख तैयार करना।
(3) भूमण्डलीय स्तर पर जैव-विविधता का आकलन कर भूमण्डलीय सूचकांक जारी करना।
(4) स्थानीय स्तर पर संरक्षण की प्राथमिकता निर्धारित करना तथा जैवविविधता को पूर्वावस्था में लाने के लिए प्रेरित करता।
(5) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जैव-विविधता करार कर सभी देशों में इसका पालन सुनिश्चित करना।
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जीव विज्ञान- जैवविविधता के तप्त (प्रमुख) स्थल (Hotspots of Biodiversity)

Hotspots of Biodiversity
Hotspots of Biodiversity

जैवविविधता के तप्त (प्रमुख) स्थल (Hotspots of Biodiversity)

विश्व के ऐसे स्थल जहाँ किसी प्राणी अथवा वनस्पति की अधिकता हो या निरंतर घट रही दुर्लभ प्रजातियां हों, जैव-विविधता के उस बिन्दु या तप्तस्थल Hotspots of biodiversity) कहलाते हैं।

दूसरे शब्दों, विश्व के ऐसे स्थल जहाँ बिना मानवीय हस्तक्षेप के पौधे एवं जीवजन्तु फलते-फूलते हैं। जहाँ पर अत्यधिक मात्रा में वनस्पति व जीव-जन्तुओं की प्रजाति में विविधता पायी जाती है। ऐसे स्थल -बिन्द जैव-विविधता के तप्त स्थल या उष्णा कहलाते हैं।
विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, जो जैव-विविधता से संपन हैं जहाँ जैव-विविधता के प्रजातियों का विलुप्तीकरण तथा आवास विनाशीकरण की संभावना होती है जैव-विविधता के उष्ण बिन्दु हैं। हमारी पृथ्वी पर 12 मेगा जैव-विविधता वाले क्षेत्रों की पहचान की गयी है। जिसमें विश्व की जैवविविधता की 60-70% जातियाँ शामिल हैं। इन सेक्टर्स को मैगजीन सेन्टर्स कहते हैं। भारत इन देशों में से एक है-
(1) मैक्सिको, (2) कोलम्बिया, (3) ब्राजील, (4) पेरू, (5) इक्वेडोर, (6) जायेर , (7) मेडागास्कर, (8) इण्डोनेशिया, (9) मलेशिया, (10) भारत, (11) चीन, (2) आस्ट्रेलिया शामिल हैं।

भारतवर्ष के जैव-विविधता के तप्तस्थल (Hotspots of Biodiversity in India)

भारत में दो तप्तस्थल (Hotspot) पाये जाते हैं जिसमें से- . 1पूर्वी हिमालय (Eastern Himalaya), 2. पश्चिमी घाट (Westem Ghat) हैं। जिनमें बहुत अधिक पौधे (Plants), जन्तुएँ (Animals), कीट, (Insects), पक्षी (Birds), सरीसृप (Reptiles) आदि पाये जाते हैं। निरन्तर वनों के विनाश एवं बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण पश्चिमी घाट की जैवविविधता को सर्वाधिक खतरा है।  
उदाहरण- भारतवर्ष में अध्ययन किये गये पुष्पीय पौधों (Poweing plants) की 15000 प्रजातियों (Species) में से लगभग ,000 प्रजातियाँ (Speciesकेरल के पश्चिमी घाट (Western valeyof Kerala) में पायी जाती हैं। इसी प्रकार भारत में पाये जाने वाले कुल प्राणी-प्रजातियों (Animals species) में से लगभग एकतिहाई (One third or 1/3)  प्राणी केरल के पश्चिमी घाट में पाये जाते हैं। 
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जीव विज्ञान-जैव विविधता में कमी या हानि [LOSS OF BIODIVERSITY]

LOSS OF BIODIVERSITY
जैव-विविधता 

जैव-विविधता में कमी या हानि [LOSS OF BIODIVERSITY]

जैव विविधता में विगत वर्षों से लगातार कमी आती जा रही है जैव विविधता में कमी के प्रमुख कारण मानव का प्रकृति में बढ़ता हस्तक्षेप है।  जैव विविधता में कमी निम्न कारणों से होती है-
(A) प्राकृतिक कारण एवं (B) मानव निर्मित कारण 

(A) प्राकृतिक कारण (Natural Factors)

(1) मृदा, वायु एवं जल प्रदूषण (Soil, air, and water pollution)।
(2) बाढ़, सूखा एवं भूकंप।
(3) अत्यंत कम आबादी का होना या क्रांतिक जनसंख्या का होना।
(4) विदेशी या एक्जॉटिक प्रजातियों का आगमन 
(5) परागण करने वाली स्रोतों (Pollinators) की कमी।
(6) संमरामक रोग।

(B) मानव निर्मित कारक (Man-made factors)-

(1) आवासों का नष्ट होना (Destruction of habitat)- 

मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति जैसे- आवास एवं घास के मैदान बनाने, कृषि, खनन, उद्योगों की स्थापना, राजमार्गों एवं सड़कों के निर्माण विस्तार, बांध आदि बनाने के लिए वनों या पेड़ पौधों एवं जंतुओं के प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर रहा है जिसके कारण वहां पर उपस्थित जीव-जंतु दूसरे स्थानों पर चले जाते हैं अथवा वे शिकारी का शिकार हो जाते हैं अथवा उनके लिए भोजन की कमी हो जाती है तथा वे रोगों का शिकार हो जाते हैं, जिसके कारण जिसके कारण उस स्थान की जैव-विविधता समाप्त हो जाती है। उदाहरण- हमारे देश में अकेले पश्चिमी घाट में तितलियों की लगभग 370 प्रजातियां उपलब्ध है, जिसमें से लगभग 70 प्रजातियाँ आज विभिन्न कारणों से लुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी है

(2) शिकार (Hunting)- 

मनुष्य प्राचीनकाल से ही अपने भोजन एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जन्तुओं का शिकार करता आया है। जन्तुओं में खाल, टस्क, फर, मांस, औषधियाँ, इत्र, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री एवं शोभाकारी या सजावटी सामग्री के लिए उनका शिकार किया जाता है तथा इनका व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, जिनके कारण जन्तु विविधता में कमी आती जा रही हैं।

(3) अतिदोहन (Over exploitation)- 

प्रकृति में उपस्थित पेड़-पौधों एवं जन्तुओं का विभिन प्रकार से उपयोग किया जाता है। आर्थिक रूप से उपयोगी प्रजातियों के साथ-साथ प्रयोगशाला में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं का उपयोग वृहत स्तर पर होने के कारण उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है और वे विलुप्तता के कगार पर पहुँच चुके हैं। उदाहरण-घटपर्णी, नीटम, साइलोटम पौधे एवं मेढक (राना टिग्रिना) एवं जंतु व्हेल मछली का उपयोग ओषधि बनाने एवं मांस प्राप्त करने में लगातार होने के कारण आज इनकी संख्या भी कम होती जा रही है।
प्रकार पोडोफाइलम एकोनीटम, डायस्कोरिया, राजल्फिया, काप्टिस जैसे पौधों का औषधीय उपयोग होने के कारण इनकी संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। इस प्रकार ये अतिदोहन का शिकार हो चुके हैं।

(4) अजायबघरों व अनुसंधान हेतु संग्रहण (Collection for zoo and researches)-

आज सम्पूर्ण विश्व में जंगली पादप एवं जन्तु प्रजातियों को अध्ययन अनुसंधान कार्य एवं औषधियाँ प्राप्त करने के लिए जैविक प्रयोगशालाओं में संग्रहीत किया जा रहा है तथा मनोरंजन हेतु उन्हें अजायबघरों में कैद किया जा रहा है। बन्दर, चिम्पांजी जैसे- प्राइमेट्स का उपयोग अनुसंधान शालाओं में उनके आन्तरिक संरचना एवं अन्य प्रकार के अध्ययनों में किया जाता है, जिसके कारण इनकी संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। 

(5) विदेशज प्रजाति का परिचय (Introduction of exotic species)-

आज हम विभिन्न प्रकार की विदेशी पादप एवं जन्तु प्रजातियों का आयात कर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। इन विदेशी पादप प्रजातियों के आगमन या परिचय के कारण देशी प्रजातियों के समक्ष भोजन एवं आवास जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

(6) कीटनाशकों का उपयोग (Use of pesticides)-

कीटनाशी एवं खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग ने भी जैव
विविधता को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है। इसके लगातार उपयोग के कारण बहुत-सी पादप एवं जन्तु प्रजातियाँ समाप्त होती जा रही हैं।

(7) प्रदूषण (Polution)-

पर्यावरण प्रदूषण आज सर्वाधिक विकराल समस्या है, जिसके कारण आज वायु, जलमृदा, समुद्र, तालाब आदि प्रदूषित हो चुके हैं। इनके कारण जीवधारियों को साँस लेने हेतु शुद्ध वायु पीने के लिए शुद्ध जल, पौधों की वृद्धि के लिए शुद्ध मृदा एवं जलीय जन्तुओं के आवास हेतु प्रदूषण रहित जल मिलना मुश्किल हो गया है। अत: वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों का शिकार होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप इनकी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार प्रदूषण के कारण भी जैव-विविधता में लगातार
कमी होती जा रही है।

(8) पारिस्थितिक स्थानापन्न (Ecological sub-stitution)-

जब किसी स्थान पर कोई नई प्रजाति का समावेश किया जाता है तो वह प्रजाति उस स्थान के अधिकांश भाग को घेर लेता है, जिसके कारण पूर्व की प्रजातियाँ स्थानाभाव के कारण लुप्त होने लगती हैं।

(9) अन्य कारण (Other causes)-

(i) जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी होना।
(ii) खाद्य श्रृंखला में जीवधारी की स्थिति।
(iii) वितरण समा।
(iv) विशिष्टीकरण की सीमा ।
(v) सामाजिक एवं आर्थिक कारण।
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जीव विज्ञान- जैव-विविधता एवं उसके प्रकार [Biodiversity and it's Types]

Biodiversity and it's Types
Biodiversity

जैव-विविधता [BIODIVERSITY] 

सामान्य परिचय (General Introduction)

प्रकृति में लाखों प्रकार के जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे पाये जाते हैं। इनके आकार एवं प्रकार तथा संरचना में अत्यधिक विविधता पायी जाती है । बायोडायवर्सिटी (Biodiversity) अर्थात् जैवविविधता शब्द पारिस्थितिकी (Ecolog) के अन्तर्गत उपयोग किये जाने वाले शब्द बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (Biological diversity) का नवीन एवं संक्षिप्त स्वरूप है। बायोडायवर्सिटी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्टर जी. रोसेन ने सन् 1986 में पौधों (Pants), जन्तुओं
(Animals) और सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) के विविध प्रकारों (Varieties) और उनमें विविधताओं (variablities) के लिए किया था।
दूसरे शब्दों , "जैव-विविधता समस्त जीवों (Living organisms), जैसे—पादों, जन्तुओं एवं सूक्ष्मजीवों की जातियों की विपुलता (Richness) है जो कि किसी निश्चित आवास (Habitat ) में पारस्परिक अंतक्रियात्मक तन्त्र की भाँति उत्पन्न होती है।"

विश्व की जैव-विविधता (Biodiversity of the world)-

वैज्ञानिकों के द्वारा किये गये विभिन्न अध्ययनों के आधार पर अनुमान लगाया गया कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर जीव-जन्तुओं एवं पौधों को लगभग 5 से 10 मिलियन प्रजातियाँ उपस्थित हैंपरन्तु इनमें से लगभग 2 मिलियन प्रजातियों की ही पहचान की जा सकी है तथा उनका अध्ययन किया गया है। इनकी समूहवार संख्या इस प्रकार हैं-
(I) हरे पौधों एवं कवकों (Fungi) की प्रजातियों की संख्या 3,00000
(ii) कीटों की प्रजातियों की संख्या 8,00000
(iii) उभयचर जीवों की प्रजातियों की संख्या 23,000
(iv) रेप्टाइल्स की प्रजातियों की संख्या 6,300
(v) पक्षी वर्ग के जीवों की प्रजातियों की संख्या 8,700
(vi) स्तनधारी जीवों की प्रजातियों की संख्या 4,100
(vii) सूक्ष्मजीवों की संख्या 2,000 से अधिक।

भारतवर्ष की जैवविविधता (Biodiversity of India)-

भारतवर्ष पादपजात (Flora) एवं प्राणिजात (Fauna) से भरपूर है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के जीवधारियों की संख्या इस प्रकार है

पादप जैवविविधता (Pant Biodiversity)

कवक                   23,000 प्रजातियाँ
आवृतबीजी।         15,000 प्रजातियाँ
ब्रायोफाइट्स          2,564 प्रजातियाँ
टेरिडोफाइट्स।      1,022 प्रजातियाँ
जीवाणु                850 प्रजातियाँ
अनावृतबीजी        64 प्रजातियाँ

जन्तु जैव-विविधता (Animal Biodiversity)

आर्थोपोड़।                     57,525 प्रजातियाँ
निम्न श्रेणी के जन्तु          9,214 प्रजातियाँ
मोलस्क जीव                  5,042 प्रजातियाँ
मछलियां                       2,546 प्रजातियाँ
पक्षी                             1,228 प्रजातियाँ
इकाइनोडर्मेट्स               765 प्रजातियाँ
सरीसृप जीव                  428 प्रजातियाँ
जलस्थली जीव               204 प्रजातियाँ 
स्तनधारी                       372 प्रजातियाँ
प्रोटोकार्डेटा                   116 प्रजातियाँ
हेमीकार्डेटा                   12 प्रजातियाँ 
उपरोक्त डाटा से स्पष्ट है कि भारत में कवक तथा कीट समुदाय के जीव प्रभावी हैं।
यहाँ पर पौधों एवं जन्तुओं की सैकड़ों प्रजातियां ऐसी भी हैं, जिनकी खोज सम्भावित हैं।

जैव-विविधता के प्रकार (Types of Biodiversity)

जैव-विविधता के प्रकार निम्न हैं
(1) आनुवांशिक विविधता (Genetic diversity)- एक ही प्रजाति के जीवों के जीनों में होने वाली विविधताओं को आनुवंशिक विविधता या एक ही प्रजाति के अन्दर होने वाली विविधता (Diversity within species) कहते हैं। ऐसी विविधताओं के उनका कारण एक ही प्रजाति की कई समष्टियाँ (Distinct population) बन जाती हैं। इस प्रकार आनुवंशिक विविधता के कारण ही प्रजाति की जातियों की समष्टियों में विविधता आ जाती है।
(2) प्रजाति विविधता (Species diversity)- इस प्रकार की विविधता दो प्रजातियों के मध्य होती है। इसके अन्तर्गत एक विशेष प्रक्षेत्र (Region) के अन्दर उपस्थित प्रजातियों (Species) के मध्य उपस्थित विविधताएँ आती हैं। ऐसी विविधताओं का समापन उस क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न प्रजातियों की संख्या के आधार पर किया जाता है।
(3) पारिस्थितिक तंत्रीय विविधता (Ecosysterm diversity)- एक पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में कई भूरूप (Land forms) हो सकते हैं तथा प्रत्येक भू-भाग में विभिन्न एवं विशेष प्रकार की वनस्पतियाँ एवं जीव-जन्तु पाये जाते हैं। इस प्रकार किसी पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों की विविधता को ही पारिस्थितिक तंत्रीय विविधता कहते हैंइस विविधता का मापन अपेक्षाकृत कठिन होता है क्योंकि इसके विभिन्न भू-रूपों या उप-परिस्थितियों की सीमाएँ स्पष्ट नहीं होती हैं। अत: पारिस्थितिक तंत्रीय विविधताओं के अध्ययन के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि एक पारिस्थितिक तंत्रों के विभिन्न पारिस्थितिक निकों (Ecological niches) को भांति-भाँति समझा जाये क्योंकि यहाँ पर उपस्थित समुदाय एक विशिष्ट प्रकार की प्रजाति जटिलता (Species complexes) युक्त होता है। ये जटिल जैव-विविधता की संरचना एवं उसके संगठन से सम्बन्धित होते हैं।

पारिस्थितिक विविधता के प्रकार (Type of Ecosystem Diversity)

पारिस्थितिक विविधता तीन प्रकार की होती है—अल्फा विविधता, बीटा विविधता एवं गामा विविधता।
(1) अल्फा विविधता (Alpha diversity)- इसे समुदाय की आन्तरिक विविधता भी कहते हैं। यह विविधता एक समान आवास में पाये जाने वाले एक समुदाय के जीवों में पाई जाने वाली स्थानीय विविधता होती है।
(2) बीटा विविधता (Beta diversity)- ऐसी विविधता आवास में परिवर्तनों या समुदाय में पारिस्थितिक प्रवणताओं, जैसे- ऊचाई, अक्षांश, आर्द्रता प्रवणताओं में अन्तर आने के कारण उत्पन्न होती है। जातियों के आवास में बदलाव का जितना अधिक होता है बीटा विविधता उतनी ही अधिक होती है।
(3) गामा विविधता (Gamma diversity)- इसे क्षेत्रीय विविधता भी कहते है। इस प्रकार की विविधता एक भू-भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले सभी प्रकार के आवास स्थानों में जातियों की प्रचुरता प्रदर्शित करती है।
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अनावृतबीजी या विवृतबीज (gymnosperm, जिम्नोस्पर्म, अर्थ: नग्न बीज)


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एक कोणधारी का शंकु - कोणधारी अनावृतबीजी वृक्षों की सबसे विस्तृत श्रेणी है
अनावृतबीजी या विवृतबीज (gymnosperm, जिम्नोस्पर्म, अर्थ: नग्न बीज) ऐसे पौधों और वृक्षों को कहा जाता है जिनके बीज फूलों में पनपने और फलों में बंद होने की बजाए छोटी टहनियों या शंकुओं में खुली ('नग्न') अवस्था में होते हैं। यह दशा 'आवृतबीजी' (angiosperm, ऐंजियोस्पर्म) वनस्पतियों से विपरीत होती है जिनपर फूल आते हैं (जिस कारणवश उन्हें 'फूलदार' या 'सपुष्पक' भी कहा जाता है) और जिनके बीज अक्सर फलों के अन्दर सुरक्षित होकर पनपते हैं। अनावृतबीजी वृक्षों का सबसे बड़ा उदाहरण कोणधारी हैं, जिनकी श्रेणी में चीड़ (पाइन), तालिसपत्र (यू), प्रसरल (स्प्रूस), सनोबर (फ़र) और देवदार (सीडर) शामिल हैं।साइकस की पौध आंध्रप्रदेश व पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में तैयार की जाती है। इसका बड़ा तना लोगों का ध्यान खींचता है। वर्ष में एक बार इस पर नई पत्तियां आती हैं। इसमें गोबर की खाद डाली जाती है। इसका तना काले रंग का होता है। साइकस के पौधे की कीमत उसकी उम्र के साथ बढ़ती है।

इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-
1. साइकस (Cycas) में काष्ठ (wood) मेनोजाइलिक (Manoxylic) तथा पाइनस (Pinus) में पिक्नोजाइलिक (Pycnoxylic) होती है।
2. सबसे बड़ा अण्डाणु तथा शुक्राणु साइकस का होता है, जो कि एक जिम्नोस्पर्म है।

आर्थिक महत्व -
1. साइकस (Cycas) के तनों से मण्ड (starch) निकालकर खाने वाला साबूदाना (sago) का निर्माण किया जाता है।
2. साइकस के बीज अण्डमान द्वीप के जनजातियों द्वारा खाए जाते हैं।
3. साइकस की पत्तियों से रस्सी तथा झाड़ू बनायी जाती है।

4 . इकस को सागो-पाम (sago palm) कहा जाता है।
5 . साइकस ताड़ जैसे (Palm like) मरुदभिद पौधा है, जिसमें तना लम्बा, मोटा तथा अशाखित होता है। इनके सिरों पर अनेक हरी पतियाँ गोलाकार ढंग से एक मुकुट जैसी रचना बनाती हैं।
6 . शैवाल युक्त साइकस की जड़ को कोरेलॉयड (Corranoid) जड़ कहते हैं।
7 . साइकस (Cycas) को जीवित जीवाश्म (Living fossils) कहा जाता है।

परिचय

विवृतबीज वनस्पति जगत् का एक अत्यंत पुराना वर्ग है। यह टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) से अधिक जटिल और विकसित है और आवृतबीज (Angiosperm) से कम विकसित तथा अधिक पुराना है। इस वर्ग की प्रत्येक जाति या प्रजाति में बीज नग्न रहते हैं, अर्थात् उनके ऊपर कोई आवरण नहीं रहता। पुराने वैज्ञानिकों के विचार में यह एक प्राकृतिक वर्ग माना जाता था, पर अब नग्न बीज होना ही एक प्राकृतिक वर्ग का कारण बने, ऐसा नहीं भी माना जाता है। इस वर्ग के अनेक पौधे पृथ्वी के गर्भ में दबे या फॉसिल के रूपों में पाए जाते हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि ऐसे पौधे लगभग चालिस करोड़ वर्ष पूर्व से ही इस पृथ्वी पर उगते चले आ रहे हैं। इनमें से अनेक प्रकार के तो अब, या लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व ही, लुप्त हो गए और कई प्रकार के अब भी घने और बड़े जंगल बनाते हैं। चीड़, देवदार आदि बड़े वृक्ष विवृतबीज वर्ग के ही सदस्य हैं।
इस वर्ग के पौधे बड़े वृक्ष या साइकस (cycas) जैसे छोटे, या ताड़ के ऐसे, अथवा झाड़ी की तरह के होते हैं। सिकोया जैसे बड़े वृक्ष (३५० फुट से भी ऊँचे), जिनकी आयु हजारों वर्ष की होती है, वनस्पति जगत् के सबसे बड़े और भारी वृक्ष हैं। वैज्ञानिकों ने विवृतबीजों का वर्गीकरण अनेक प्रकार से किया है। वनस्पति जगत् के दो मुख्य अंग हैं : क्रिप्टोगैम (Cryptogams) और फैनरोगैम (Phanerogams)। फैनरोगैम बीजधारी होते हैं और इनके दो प्रकार हैं : विवृतबीज और आवृतबीज; परंतु आजकल के वनस्पतिज्ञ ने वनस्पति जगत् का कई अन्य प्रकार का वर्गीकरण करना आरंभ कर दिया है, जैसे (१) वैस्कुलर पौधे (Vascular) या ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta) और (२) एवैस्कुलर या नॉन वैस्कुलर (Avascular or nonvascular) या एट्रैकियोफ़ाइटा (Atracheophyta) वर्ग। वैस्कुलर पौधों में जल, लवण लवण इत्यादि के लिए बाह्य ऊतक होते हैं। इन पौधों को (क) लाइकॉप्सिडा (Lycopsida), (ख) स्फीनॉप्सिडा (Sphenopsida) तथा (ग) टिरॉप्सिडा (Pteropsida) में विभाजित करते हैं। टिरॉप्सिडा के अंतर्गत अन्य फ़र्न, विवृतबीज तथा आवृतबीज रखे जाते हैं।
विवृतबीज के दो मुख्य उपप्रभाग हैं :
  • (१) साइकाडोफाइटा (Cycadophyta) और
  • (२) कोनिफेरोफाइटा (Coniferophyta)।
साइकाडोफाइटा में मुख्य तीन गण हैं :
  • (क) टेरिडोस्पर्मेलीज़ या साइकाडोफिलिकेलीज़ (Pteridospermales or Cycadofilicales),
  • (ख) बेनीटिटेलीज़ या साइकाडिऑइडेलीज (Bennettitales or Cycadeoidales) और
  • (ग) साइकाडेलीज़ (Cycadales)।
कोनिफेरोफाइटा में चार मुख्य गण हैं :
  • (क) कॉडेंटेलीज़ (Cordaitelles),
  • (ख) गिंगोएलीज (Ginkgoa'es),
  • (ग) कोनीफ़रेलीज (Coniferales) और
  • (घ) नीटेलीज़ (Gnitales)।
इनके अतिरिक्त और भी जटिल और ठीक से नहीं समझे हुए गण पेंटोज़ाइलेलीज़ (Pentoxylales), कायटोनियेलीज़ (Caytoniales) इत्यादि हैं।

साइकाडोफाइटा

टेरिडोरपर्मेलीज़ या साइकाडोफिलिकेली

इस गण कें अंतर्गत आनेवाले पौधे भूवैज्ञानिक काल के कार्बनी (Carboniforous) युग में, लगभग २५ करोड़ वर्ष से भी पूर्व के जमाने में, पाए जाते थे। इस गण के पौधे शुरू में फर्न समझे गए थे, परंतु इनमें बीज की खोज के बाद इन्हें टैरिडोस्पर्म कहा जाने लगा। पुराजीव कल्प के टेरिडोस्पर्म तीन काल में बाँटे गए हैं -
(१) लिजिनॉप्टेरिडेसिई (Lyginopteridaceae), (२) मेडुलोज़ेसिई (Medullosaceae) और कैलामोपिटिए सिई (Calamopiteyaceae)।
लिजिनाप्टेरिडेसिई की मुख्य जाति कालिमाटोथीका हानिंगघांसी (Calymmatotheca hoeninghansi) है। इसके तन को लिजिनॉप्टेरिस (Lyginopteris) कहते हैं, जो तीन या चार सेंटीमीटर मोटा होता था। इसके अंदर मज्जा (pith) में काले कड़े ऊतक गुच्छे, जिन्हें स्क्लेरॉटिक नेस्ट (Sclerotic nest) कहते हैं, पाए जाते थे। बाह्य वल्कुट (cortex) भी विशेष प्रकार से मोटे और पतले होते थे। तनों से निकलनेवाली पत्तियों के डंठल में विशेष प्रकार के समुंड रोम (capitate hair) पाए जाते थे। इनपर लगनेवाले बीज मुख्यत: लैजिनोस्टोमा लोमेक्साइ (Lagenostoma lomaxi) कहलाते हैं। ये छोटे गोले (आधा सेंटीमीटर के बराबर) आकार के थे, जिनमें परागकण एक परागकोश में इकट्ठे रहते थे। इस स्थान पर एक फ्लास्क के आकार का भाग, जिसे लैजिनोस्टोम कहते हैं, पाया जाता था। अध्यावरण (integument) और बीजांडकाय (nucellus) आपस में जुटे रहते थे। बीज एक प्रकार के प्याले के आकार की प्यालिका (cupule) से घिरा रहता था। इस प्यालिका के बाहर भी उसी प्रकार के समुंड रोम, जैसे तने और पत्तियों के डंठल पर उगते थे, पाए जाते थे। अन्य प्रकार के बीजों को कोनोस्टोमा (Conostoma) और फाइसोस्टोमा (Physostoma) कहते हैं। लैजिनॉप्टेरिस के परागकोश पुंज (poller bearing organ) को क्रॉसोथीका (Crossotheca) और टिलैंजियम (Telangium) कहते हैं। क्रॉसोथीका में निचले भाग चौड़े तथा ऊपर के पतले होते थे। टहनियों जैसे पत्तियों के विशेष आकार पर, नीचे की ओर किनारे से दो पंक्तियों में परागकोश लटके रहते थे। टिलैंजियम में परागकोश ऊपर की ओर मध्य में निकले होते थे।
कुछ नई खोज द्वारा लिजिनॉप्टेरिस के अतिरिक्त अन्य तने भी पाए गए हैं, जैसे कैलिस्टोफाइटॉन (Callistophyton), शाप फिएस्ट्रम (Schopfiastrum), या पहले से जाना हुआ हेटेरैंजियम (Heterangium)। इन सभी तनों में बाह्य वल्कुट में विशेष प्रकार से स्क्लेरेनकाइमेटस (sclerenchymatous) धागे (strands) पाए जाते हैं।
मेडुलोज़ेसिई (Medullosaceae) का मुख्य पौधा मेडुलोज़ा (Medullosa) है, जिसकी अनेकानेक जातियाँ पाई जाती थीं। मेडुलोज़ा की जातियों के तने बहुरंगी (polystelic) होते थे। स्टिवार्ट (Stewart) और डेलिवोरियस (Delevoryas) ने सन् १९५६ में मेडुलाज़ा के पौधे के भागों को जोड़कर एक पूरे पौधे का आकार दिया है, जिसे मेडुलोज़ा नोइ (Medullosa noei) कहते हैं। यह पौधा लगभग १५ फुट ऊँचा रहा होगा तथा इसके तने के निचले भाग से बहुत सी जड़ें निकलती थीं। मेडुलोज़ा में परागकोश के पुंज कई प्रकार के पाए गए हैं, जैसे डॉलिरोथीका (Dolerotheca), व्हिटलेसिया (Whittleseya), कोडोनोथीका (Codonotheca), ऑलेकोथीका (Aulacotheca) और एक नई खोज गोल्डेनबर्जिया (Goldenbergia)। डॉलिरोथीका एक घंटी के आकार का था, जिसके किनारे की दीवार पर परागपुंज लंबाई में लगे होते थे। ऊपर का भाग दाँतेदार होता था। कोडोनोथीका में ऊपर का दाँत न होकर, अंगुली की तरह ऊँचा निकला भाग होता था। मेडुलोज़ा के बीज लंबे गोल होते थे, जो बीजगण ट्राइगोनोकार्पेलीज़ (Trigonocarpales) में रखे जाते हैं। इनमें ट्राइगोनोकारपस (Trigonocorpus) मुख्य है। अन्य बीजों के नाम इस प्रकार हैं : पैकीटेस्टा (Pachytesta) और स्टीफैनोस्पर्मम (Stephanospermum)।
कैलामोपिटिएसिई (Calamopityaceae) कुल ऐसे तनों के समूह से बना है, जिन्हें अन्य टेरिडोस्पर्मस में स्थान नहीं प्राप्त हो सका। इनमें मुख्यत: सात प्रकार के तने है, जिनमें कैलामोपिटिस (Calamopitys), स्टीनोमाइलान (Sphenoxylon) अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मीसोज़ोइक टेरिडोस्पर्म (Mesozoic pteridosperm) के पौधे पेल्टैंस्पर्मेसिई (Peltaspermaceae) और कोरिस्टोस्पर्मेसिई (Corystospermaceae) कुलों में रखे जाते हैं। ये ६ करोड़ से १८ करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर उगते थे। इनके अवशेष कोयले या कुछ चिह्न के रूप में मिलते हैं हैं। इनके कुछ मुख्य पौधों के नाम इस प्रकार हैं : लेपिडॉप्टेरिस (Lepidopteris), उम्कोमेसिया (Umkomasia), पाइलोफोरोस्पर्मम (Pilophorospermum), स्परमैटोकोडॉन (Spermatocodon), टेरूचुस (Pteruchus), जुबेरिया (Zuberia) इत्यादि।
टेरिडोस्पर्मेंलीज़ से मिलते जुलते ही एक कुल काइटोनियेसी (Caytoniaceae) को भी गण का पद दिया गया है और इसे काइटोनियेलीज (Caytoniales) कहते हैं। इसके पौधे काइटोनिया (Caytonia) को शुरु में आवृतबीज समझा गया था, परंतु फिर अधिक अनुसंधान पर इन्हें विवृतबीज पाया गया।
इसके तना का एक छोटा टुकड़ा मिला है, जिसे कोई विशेष नाम दिया गया है। पत्ती को सैजिनॉप्टेरिस (Sagenopteris) कहते हैं, जो एक स्थान से चार की संख्या में निकलती हैं। पत्ती की शिराएँ जाल जैसा आकार बनाती हैं। इनमें रध्रों (stomata) के किनारे के कोश हैप्लोकीलिक (haplocheilic) प्रकार के होते हैं। परागकण चार या तीन के गुच्छों में लगे होते हैं, जिन्हें काइटोनैन्थस (Caytonanthus) कहते हैं। परागकण में दो हवा भरे, फूले, बैलून जैसे आकार के होते हैं। बीज की फल से तुलना की जाती है। ये गोल आकार के होते हैं और अंदर कई बीजांड (ovules) लगे होते हैं।

बेनीटिटेलीज़ या साइकाडिऑइडेलीज़ (Bennettitales or Cycadeoidales) गण

इसको दो कुलों में विभाजित किया गया है :
  • (१) विलियमसोनियेसिई (Williamsoniaecae) और
  • (२) साइकाडिऑइडेसिई (Cycadeoidaceae).
बिलियमसोनियेसिई कुल का सबसे अधिक अच्छी तरह समझा हुआ पौधा विलियमसोनिया सीवार्डियाना (Williamsonia sewardiana) का रूपकरण (reconstruction) भारत के प्रख्यात वनस्पति विज्ञानी स्व. बीरबल साहनी ने किया है। इसके तने को बकलैंडिया इंडिका (Bucklandia indica) कहते हैं। इसमें से कहीं कहीं पर शाखाएँ निकलती थीं, जिनमें प्रजनन हेतु अंग पैदा होते थे। मुख्य तने तथा शाखा के सिरों पर बड़ी पत्तियों का समूह होता है, जिसे टाइलोफिलम कटचेनसी (Tilophyllum cutchense) कहते हैं। नर तथा मादा फूल भी इस क्रम में रखे गए हैं जिनमें विलियमसोनिया स्कॉटिका (Williamsonia scotica) तथा विलियम स्पेक्टेबिलिस (W. spectabilis), विलियम सैंटेलेंसिस (W. santalensis) इत्यादि हैं। इसके अतिरिक्त विलियमसोनिएला (Williamsoniella) नामक पौधे का भी काफी अध्ययन किया गया है।
साइकाडिआइडेसी कुल में मुख्य वंश साइकाडिआइडिया (Cycadeoidea), जिसे बेनीटिटस (Bennettitus) भी कहते हैं, पाया जाता था। करोड़ों वर्ष पूर्व पाए जानेवाले इस पौधे का फ़ासिल सजावट के लिए कमरों में रखा जाता है। इसके तने बहुत छोटे और नक्काशीदार होते थे। प्रजननहेतु अंग विविध प्रकार के होते थे। सा. वीलैंडी (C. wielandi), सा. इनजेन्स (C. ingens), सा. डकोटेनसिस (C dacotensis), इत्यादि मुख्य स्पोर बनाने वाले भाग थे। इस कुल की पत्तियों में रध्रं सिंडिटोकीलिक (syndetocheilic) प्रकार के होते थ जिससे वह विवृतबीज के अन्य पौधों से भिन्न हो गया है और आवृतबीज के पौधों से मिलता जुलता है। इस गण के भी सभी सदस्य लाखों वर्ष पूर्व ही लुप्त हो चुके है। ये लगभग २० करोड़ वर्ष पूर्व पाए जाते थे।

साइकडेलीज़

साइकडेलीज़ गण के नौ वंश आजकल भी मिलते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य सब लुप्त हो चुके हैं।
आज कल पाए जानेवाले साइकैंड (cycad) में पाँच तो पृथ्वी के पूर्वार्ध में पाए जाते हैं और चार पश्चिमी भाग में। पूर्व के वंशों में साइकस सर्वव्यापी है। यह छोटा मोटा ताड़ जैसा पौधा होता है और बड़ी पत्तियाँ एक झुंड में तने के ऊपर से निकलती हैं। पत्तियाँ प्रजननवाले अंगों को घेरे रहती हैं। अन्य चार वंश किसी एक भाग में ही पाए जाते हैं, जैसे मैक्रोज़ेमिया (Macrozamia) की कुल १४ जातियाँ और बोवीनिया (Bowenia) की एकमात्र जाति आस्ट्रेलिया में ही पाई जाती है। एनसिफैलॉर्टस (Encephalortos) और स्टैनजीरिया (Stangeria) दक्षिणी अफ्रीका में पाया जाता है।
पश्चिम में पाए जानेवाले वंश में जेमिया (Zamia) अधिक विस्तृत है। इसके अतपिक्त माइक्रोसाइकस (Microcycas) सिर्फ पश्चिमी क्यूबा, सिरैटाज़ेमिया (Ceratozamia) और डियून (Dioon) दक्षिण में ही पाए जाते हैं। इन सभी वंशों में से भारत में भी पाया जानेवाला साइकस का वंश प्रमुख है।
साइकस भारत, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में स्वत: तथा बाटिकाओं में उगता है। इसकी मुख्य जातियाँ साइकस पेक्टिनेटा (Cycaspectinata), सा. सरसिनेलिस (C. circinalis), सा. रिवोल्यूटा (C. revoluta), इत्यादि हैं। इनमें एक ही तना होता है। पत्ती लगभग एक मीटर लंबी होती है। इस पौधे से एक विशेष प्रकार की जड़, जिसे प्रवालाभ मूल (Coralloid root) कहते हैं, निकलती है। इस जड़ के भीतर एक गोलाई में हरे, नीले शैवाल निवास करते हैं। तने मोटे होते हैं, परंतु कड़े नहीं होते। इन तनों के वल्कुट के अंदर से साबूदाना बनानेवाला पदार्थ निकाला जाता है, जिससे साबूदाना बनाया जाता है। पत्तियों में घुसने वाली नलिका जोड़े में स्तम्भ से निकल कर डंठल में जाती है, जहाँ कई संवहन पूल (vascular bundle) पाए जाते हैं। पत्तियों के आकार और अंदर की बनावट से पता चलता है कि ये जल को संचित रखने में सहायक हैं। रध्रं सिर्फ निचले भाग ही में घुसी हुई दशा में पाया जाता है। प्रजनन दो प्रकार के कोन (cone) या शंकु द्वारा होता है। लघु बीजाणु (microspore) पैदा करनेवाले माइक्रोस्पोरोफिल के मिलने से नर कोन, या नर शंकु (male cone और बड़े बीजांड (ovule) वाले गुरु बीजाणुवर्ण (megasporophyll) के संयुक्त मादा कोन (female cone), या मादा शंकु बनते हैं। समस्त वनस्पति जगत के बीजांड में सबसे बड़ा बीजांड साइकस में ही पाया जाता है। यह लाल रंग का होता है। इसमें अध्यावरण के तीन परत होते हैं, जिनके नीचे बीजांडकाय और मादा युग्मकोद्भिद (female gametophyte) होता है। स्त्रीधानी (archegonium) ऊपर की ओर होती है और परागकण बीजांडद्वार (micraphyle) के रास्ते से होकर, परागकक्ष तक पहुँच जाता है। गर्भाधान के पश्चात् बीज बनता है। परागकण से दो शुक्राणु (sperm) निकलते हैं, जो पक्ष्माभिका (cilia) द्वारा तैरते हैं।
पेंटाग्ज़िलेलीज़ एक ऐसा अनिश्चित वर्ग है जो साइकाडोफाइटा तथा कोनीफेरोफाइटा दोनों से मिलता जुलता है। इस कारण इसे यहाँ उपर्युक्त दोनों वर्गों के मध्य में ही लिखा जा रहा है। यह अब गण के स्तर पर रखा जाता है। इस गण की खोज भारतीय वनस्पतिशास्त्री आचार्य बीरबल साहनी ने की है। इसके अंतर्गत आनेवाले पौधों, या उनके अंगों के फॉसिल बिहार प्रदेश के राजमहल की पहाड़ियों के पत्थरों में दबे मिले हैं। तने को पेंटोज़ाइलान (Pentoxylon) कहते हैं, जो कई सेंटीमीटर मोटा होता था और इसमें पाँच रंभ (stoles) पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त राजमहल के ही इलाके में निपानिया ग्राम से प्राप्त तना निपानियोज़ाइलान (Nipanioxylon) भी इसी गण में रखा जाता है। इस पौधे की पत्ती को निपानियोफिलम (Nipaniophyllum) कहते हैं, जो एक चौड़े पट्टे के आकार की होती थी। इसका रंभ आवृतबीज की तरह सिनडिटोकीलिक (syndetocheilic) प्रकार का होता है। बीज की दो जातियाँ पाई गई हैं, जिन्हें कारनोकोनाइटिस कॉम्पैक्टम (Carnoconites compactum) और का. लैक्सम (C. laxum) कहते हैं। बीज के साथ किसी प्रकार के पत्र इत्यादि नहीं लगे होते। नर फूल को सहानिया (Sahania) का नाम दिया गया है।

कोनिफेरोफाइटा

कॉर्डाइटेलीज

कोनीफेरोफाइटा का प्रथम गण कॉर्डाइटेलीज (cordaiteles) हैं, जो साइकाडोफाइटा के पौधों से कहीं बड़े और विशाल वृक्ष हुआ करते थे। पृथ्वी पर प्रथम वृक्षोंवाले जंगल इन्हीं कारडाइटीज के ही थे, जो टेरिडोस्पर्म की तरह, २५ करोड़ वर्ष से पूर्व, इस धरती पर राज्य करते थे। इनकी ऊँचाई कभी कभी १०० फुट से भी अधिक होती थी। इन्हें तीन कुलों में विभाजित किया गया है :
(१) पिटिई (Pityeae), (२) कारडाइटी (Cordaiteae) और (३) पोरोज़ाइलीई (Poroxyleae)।
पिटिई मुख्यत: तने की अंदरूनी बनावट पर स्थापित किया गया है। इस कुल के पौधों में कैसी पत्ती या फूल थे, इसका ज्ञान अभी तक ठीक से नहीं हो पाया है। एक वंश कैलिजाइलान (Callixylon) का, अमरीका से प्राप्त कर, अच्छी तरह अध्ययन किया गया है, यह एक विशाल वृक्ष रहा होगा, जिसकी शाखा की चौड़ाई लगभग १७-१८ फुट की थी।
कॉर्डाइटी का मुख्य वंश कॉर्डांइटिज़ (Cordaites) है। इसकी लकड़ी को कॉर्डियोज़ालाइन (Cordioxylon) डैडोज़ाइलान (Dadoxylon), जड़ को एमिलान (Amyelon), पुष्पगुच्छ को कॉर्डाऐंथस (Cordaianthus) और बज को कॉर्डाइकार्पस (Cordaicarpus) और समारॉप्सिस (Samaropsis) कहते हैं। पत्ती भी लगभग ३-४ फुट लंबी और १ फुट चौड़ी होती थी। पत्ती के अंदर के ऊतकों की बनावट से ज्ञात है कि ये सूखे स्थानों पर उगते होंगे। कॉर्डाइटीज़ के तने के मध्य का पिथ या मज्जा विशेष रूप से विवाभ (discoid) लगता है। कॉर्डाइटीज़ के फूल एकलिंगी होते थे, जो अधिकतर अलग अलग वृक्ष पर, या कभी कभी एक ही वृक्ष की अलग शाखा पर, लगे होते थे। कॉर्डाइऐंथस पेजोनी के पुंकेसर (stamen), एक शाखा से ३-४ की संख्या में, सीधे ऊपर निकलते हैं। परागकण में दो परतें होती हैं। मादा कोन एक कड़े स्तंभ पर ऊपर की ओर लगा होता है।
पोरोज़ाइली कुल में सिर्फ एक ही प्रजाति पोरोज़ाइकलन है, जिसके तने में भीतर बृहत् मज्जा होती है।

गिंगोएलीज़

कोनीफेरोफाइटा का दूसरा गण हैं, गिंगोएलीज़ (Ginkgoales)। यह मेसोज़ोइक युग से, अर्थात् लगभग ५-७ करोड़ वर्ष पूर्व से, इस पृथ्वी पर पाया जा रहा है। उस समय में तो इसके कई वंश थे, पर आज कल सिर्फ एक ही जाति जीवित मिलती है। यह गिंगो बाइलोबा (Ginkgo biloba) एक अत्यंत सुंदर वृक्ष चीन देश में पाया जाता है। इसके कुछ इने गिने पौधे भारत में भी लगाए गए हैं। इसकी सुंदरता के कारण इसे 'मेडेन हेयर ट्री' (Maiden-hair tree) भी कहा जाता है।
फॉसिल जिंकगोएजीज़ में जिंकगोआइटीज (Ginkgoites) और बइरा (Baiera) अधिक अध्ययन किए गए हैं। इनके अतिरिक्त ट्राइकोपिटिस (Trichopitys) सबसे पुराना सदस्य है। जिंकगो को वैज्ञानिकों ने शुरु में आवृतबीज का पौधा समझा था, फिर इसे विबृतबीज कोनिफरेल् समझा गया, परंतु अधिक विस्तार से अध्ययन करने पर इसका सही आकार समझ में आया और इसे एक स्वतंत्र गण, गिंगोएलीज़ का स्तर दिया गया। यह वृक्ष छोटी अवस्था में काफी विस्तृत और चौड़े गोले आकार का होता है, जैसे आम के वृक्ष होते हैं, परंतु आय बढ़ने से वह नुकीले पतले आकार का, कुछ चीड़ के वृक्ष या पिरामिड की शक्ल का हो जाता है। इसके तने, दो प्रकार के होते हैं : लंबे तने, जो बनावट में कोनीफेरोफाइटा की तरह होते हैं और बौने प्ररोह (dwarf shoots), जो साइकेडोफाइटा जैसे अंदर के आकार के होते हैं। इनकी पत्ती बहुत ही सुंदर होती है, जो दो भागों में विभाजित होती है। पत्ती में नसें भी जगह जगह दो में विभाजित होती रहती हैं। नर और मादा कोन अलग अलग निकलते हैं। बीजांड के नीचे एक 'कॉलर' जैसा भाग होता है।
ऐसा अनुमान है कि इस गण के पौधे कॉर्डाइटी वर्ग से ही उत्पन्न हुए होंगे। इसमें नरयुग्मक तैरनेवाले होते हैं, जिससे यह साइकड से भी मिलता जुलता है। कुछ वैज्ञानिकों के विचार हैं कि ये पौधे सीधे टेरीडोफाइटा (Pteridophyta) से ही उत्पन्न हुए होंगे।

कोनीफरेलीज़

कोनीफरेलीज़ गण, न केवल कोनिफेरोफाइटाका ही बल्कि पूरे विवृत बीज का, सबसे बड़ा और आज कल विस्तृत रूप से पाया जानेवाला गण है। इसमें लगभग ५० प्रजातियाँ और ५०० से अधिक जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें अधिकांश पौधे ठंडे स्थान में उगते हैं। छोटी झाड़ी से लेकर संसार के सबसे बड़े और लंबी आयुवाले पौधे इस गण में रखे गए हैं। कैलिफॉर्निया के लाल लकड़ीवाले वृक्ष (red wood tree), जिन्हें वनस्पति जगत् में सिकोया (sequoia) कहते हैं, लगभग ३५० फुट गगनचुंबी होते हैं और इनके तने ३०-३५ फुट चौड़े होते हैं। यह संसार का सबसे विशालकाय वृक्ष होता है। इसकी आयु ३,०००-४,००० वर्ष तक की होती है।
कोनीफरेलीज़ गण को मुख्य दो कुल पाइनेसी और टैक्सेसी में विभाजित किया गया है। इनमें फिर कई उपकुल हैं परंतु बहुत से विद्वानों ने सभी उपकुलों को कुल का ही स्तर दे दिया है।
पाइनेसी कुल के अंतर्गत चार उपकुल हैं :
(१) एबिटिनी (Abietineae), (२) टैक्सोडिनी, (Taxodineae), (३) क्यूप्रेसिनी (Cupressineae) और (४) अराकेरिनी (Araucarineae)
टैक्सेसी के अंतर्गत दो उपकुल हैं-
(१) पोडोकारपिनी (Podocarpineae) और (२) टैक्सिनी (taxineae)
कई वनस्पति शास्त्रियों ने टेक्सिनी को कुल का नहीं, गण (टैक्सेल्स) का स्तर दे रखा है।

पाइनेसी

(१) एबिटिनी में बीजांड पत्र (oruliferous bract) एक विशेष प्रकार का होता है और परागकण में दोनों तरफ हवा में तैरने के लिए हवा भरे गुब्बारे जैसे आकार होते हैं। इस उपकुल के मुख्य उदाहरण हैं : पाइनस या चीड़, सीड्रस या देवदार, लैरिक्स (Larix), पीसिया (Picea) इत्यादि।
(२) टैक्सोडिनी में बीजांड पत्र और अन्य पत्र आपस में सटे होते हैं और परागकण में पंख जैसे आकार नहीं होते। इनके मुख्य उदाहरण हैं : सियाडोपिटिस (Sciadopitys), सिकोया (Sequoia), क्रिप्टोमीरिया (Cryptomeria), कनिंघेमिया (Cuninghamia) इत्यादि।
क्यूप्रेसिनी के मुख्य पौधे कैलिट्रिस (Callitirs), थूजा (Thuja), जिसे मोरपंखी भी कहते हैं, क्यूप्रेसस (Cupressus), जूनिपेरस (Juniperus) इत्यादि हैं।
अरोकेरिनी के अंतर्गत वाटिकाओं में लगाए जानेवाले सुंदर पौधे अरोकेरिया (Araucaria) और एगैथिस (Agathis) हैं।
पाइनेसी कुल के पौधों में एक मध्य स्तंभ जैसा लंबा, सीधा तना होता है, जिससे नीचे की ओर बड़ी और ऊपर छोटी शाखाएँ निकलती हैं। फलस्वरूप पौधे का आकार एक कोन या पिरामिड का रूप धारण करता है। तने के शरीर (anatomy) का काफी अध्ययन किया गया है। वैस्कुलर ऊतक बहुत बृहत् होता है। वल्कुट (cortex) तथा मज्जा दोनों ही पतले होते हैं। वल्कुट के बाहर कार्क (cork) पाए जाते हैं। जड़ की रचना एक द्विबीजी संवृतबीज से मिलती जुलती है।
इस कुल में अन्य कोनीफरेलीज की तरह दो प्रकार की पत्तियाँ पाई जाती हैं। एक पत्ती के रूप की और दूसरी छोटे पतले कागज के टुकड़े जैसे शल्क पत्र (scale leaf) सी होती है। पाइनस में यह अलग प्रकार की पत्तियाँ अलग शाखा पर निकलती हैं, परंतु ऐबीस (Abies) के पौधे में, दोनों पत्र हर डाल पर भी पाए जा सकते हैं। पत्तियों की आयु काफी लंबी होती है और कोई कोई १०-२२ वर्ष तक नहीं झड़तीं। इनका आकार एक सूखे स्थान में उगनेवाले पौधों की पत्ती जैसा होता है। बाह्यचर्म के कोश लंबे होते हैं, जिनके बाहर के भाग पर मोम जैसा क्यूटिन (cutin) पदार्थ जमा रहता है। र्घ्रां अंदर की ओर घुसा होता है। मीज़ोफिल (mesophyll) भाग के कोश पटूटे की भाँति अंदर को लिपटे (infolded) से रहते हैं। एक प्रकार के कोश द्वारा वैस्कुलर ऊतक घिरे रहते हैं, जिसे छाद (sheath) कहते हैं।
प्रजनन मुख्यत: बीज द्वारा होता है। यह एक विशेष प्रकार के अंग में, जिसे कोन (cone) या शंकु कहते हैं, बनता है। कोन दो प्रकार के होते हैं, नर और मादा। नर कोन में पराग बनते हैं, जो हवा द्वारा उड़कर मादा कोन के बीजांड तक पहुंचते है, जहाँ गर्भाधान होता है। दोनों लिंगी कोन अलग अलग पौधों में पाए जाते हैं, जैसे पाइनस में, या एक ही पौधे में जैसे ऐबिस या कभी कभी क्यूप्रसेसी उफ्कुल के पौधों में। लघुबीजाणुधानी (microsporangium) के निकलने का स्थान स्थिर नहीं रहता। किसी में यह डंठल के सिरे पर और किसी में पत्ती के कोण से निकलती है। पाइनस में तो बौने प्ररोह (dwarf shoot) पर ही यह प्रजनन अंग निकलते हैं। लघुबीजाणुधानी जिस पत्र में लगी रहती है, उसे लघुबीजाणु पर्ण (Microsporophyll) कहते हैं। लघुबीजाणुधानी के बाह्यचर्म से नीचे अधस्त्वचा (hypodermis) के कुछ कोश बढ़ते तथा जीव द्रव से भरे रहते हैं और विभाजित होकर, बीजाणुजन ऊतक बनाते हैं और फिर इन्हीं कोशों के कई बार विभाजन होने पर परागकण और अन्य ऊतक बनते हैं।
बीजांड पैदा करनेवाले अंगों को गुरुबीजाणुपर्ण (megasporophyll) कहते हैं। इनके एक स्थान पर झुंड में होने से एक कोन या मादा शंकु बनता है। बीजांड एक प्रकार के शल्क बीजांडघर शल्क पर, नीचे की ओर लगे होते हैं। योनिका भ्रूणपोष (endosperm) से नीचे की ओर से घिरा रहता है और दो आवरण होते हैं। ऊपर की ओर से घिरा रहता है और दो आवरण होते हैं। ऊपर की ओर एक अंडद्वार होता है जिससे होकर परागकण योनिका के पास पहुंच जाते हैं। यहाँ ये कण जमते हैं और पराग नलिका बनता है, जिसमें नलिका केंद्रक (tube nucleus) नर युग्मक पाए जाते हैं। नर युग्मक और मादा युग्मक के संयोग से अंडबीजाणु बनते हैं, जो फिर विभाजन द्वारा बीज को जन्म देते हैं।
ऐसा अनुमान है कि पाइनेसी कुल का जन्म पृथ्वी के प्रथम बड़े वृक्षवाले गण कारडाईटेलीज़ (Cordaitales) द्वारा ही हुआ है।

टैक्सेसी

दूसरा कोनीफरेलीज़ का कुल है टैक्सेसी। इसके दो उपकुल हैं - पोडोकारपिनी और टैक्सिनी। पोडोकारपिनी में भी परागकण में हवा भरे पक्ष (wings) पाए जाते हैं। इसके उदाहरण हैं, पोडोकारपस तथा डैक्रीडियम। टैक्सिनी के परागकण में पक्ष (wing) नहीं होता। टैक्सस, टोरेया और सिफैलोटेक्सस इसके मुख्य उदाहरण हैं। इनमें भी पाइनस जैसे वैस्कुलर ऊतक होते हैं, परंतु कुछ विशेष उंतर भी होता है।
पत्तियाँ कई प्रकार की पाई जाती हैं। कुछ में छोटे नुकीले (जैसे टैक्सस) या चौड़े पत्ते (पोडौकारपस में) होते हैं, या नहीं भी होते हैं, जैसे फाइलोक्लैडस में। प्रजनन हेतु लघुबीजाणुधानी तथा गुरुबीजाणुधानी नर तथा मादा शंकु में लगी होती हैं। इन शंकुओं में शल्क (scales) के अध्ययन काफी किए गए हैं। प्रत्येक बीजाणुपर्ण (sporophyll) में बीजाणुधानी (sporangium) की संख्या भिन्न भिन्न प्रजातियों में भिन्न होती है, जैसे टैक्सस में चार से सात, टोरेया (torreya) में शुरू में सात, परंतु बीजाणुधानी पकने तक १ या २ ही रह जाती हैं। मादा शंकु इस कुल में (अन्य कोनीफर से) बहुत छोटे रूप का होता है। अधिकतर यह शंकु पत्तीवाले तने के सिरे पर उगता है। बीजांड की संख्या एक या दो होती है। इनमें अध्ययन गण और बीजांडकाय की परतें अलग रहती हैं। पराग दो केंद्रक की दशा में, हवा में झड़कर, मादा शंकु तक पहुंचते हैं और बीजाणु पर पहुँचकर जमते हैं। वहाँ ये बढ़कर एक नलिका बनाते हैं और संसेचन का कार्य संपन्न करते हैं।
इस कुल का संबंध अन्य कुल या गण से कई प्रकार से रखा गया है। ऐसा विचार भी है कि इस कुल के पौधे जीवित कोनीफर में सबसे जमाने से चले आ रहे हैं। इनका संबंध विंकगो या अराकेरिया या कारडाइटीज़ से हो सकता है। ऐसा भी कई वैज्ञानिकों का विचार है कि यह स्वतंत्र रूप से (अन्य कोनीफर से नहीं) उत्पन्न हुए होंगे।
कोनीफरलीज़ गण काफी गूढ़ और विस्तृत है, जिसमें बहुत से आर्थिक दृष्टि से अच्छे पौधे पाए जाते हैं, जैसे चीड़, चिलगोज़ा, देवदार, सिकोया तथा अन्य, जो अच्छी लकड़ी या तारपीन का तेल देनेवाले हैं।

नीटेलीज़

कोनीफेरोफाइटा का सबसे उन्नत गण है, नीटेलीज़। इस गण में तीन जीवित पौधे हैं : नीटम (Gnetum), एफिड्रा (Ephedra) और वेलविट्शिया (Welwetschia) आज के कई वैज्ञानिकों ने इन तीनों प्रजातियों की रूपरेखा तथा पाए जानेवाले स्थान की भिन्नता के कारण अलग अलग आर्डर का स्तर दे रखा है। फिर भी कुछ गुण ऐसे हैं जैसे वाहिका (Vessel) का होना, संयुक्त शंकु (compound cone), अत्यंत लंबी माइक्रोपाइल, पत्तियों का आमने सामने (opposite) होना इत्यादि, जो तीनों प्रजातियों में मिलते हैं। इस गण के पौधों को कोनीफेरफ्रोाइटा से इसीलिए हटाकर एक नए ग्रुप क्लेमाइढोस्पर्मोफाइटा में रखा जाने लगा है।
एफिड्रा, जिससे एफिड्रीन जैसी ताकत की औषधि निकलती है, एक झाड़ी के आकार का पौधा है। इसकी लगभग चालीस जातियाँ पृथ्वी के अनेक भागों में पाई जाती हैं। पश्चिम में मेक्सिको, ऐंडीज़ परगुए, फ्रांस, तथा पूर्व में भारत, चीन इत्यादि, में यह उगता है। भूमध्य रेखा के दक्षिण में यह नहीं पाया जाता। इसकी मूसली जड़ (tap root) मजबूत और बड़ी होती है। इसके तने पतले हरे रंग के होते हैं, जिनपर पत्तियाँ नहीं के बराबर होती हैं। ये पत्तियाँ इतनी छोटी होती हैं कि आहार बनाने का कार्य तने द्वारा ही होता है। इनके तन में गौण ऊतक में वाहिनियाँ पाई जाती हैं। मज्जारश्मि (medullary ray) चौड़ी और लंबी होती है। संवहन (vascular) नलिका एंडार्क साइफोनोस्टील (endarch siphonostele) होता है। इनमें एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ टैनिन पाया जाता है। वल्कुट में क्लोरोफिल पाए जाते हैं। इनके बाहर रध्रं होते हैं, जो गैसों के आदान प्रदान तथा भाप के बाहर निकलने के लिए मार्ग प्रदान करते हैं।
एफिड्रा में नर और मादा शंकु अलग अलग पौधे पर निकलता है। केवल एफिड्रा की एक जाति, ए. फोलिपेटा, में ही एक पौधे पर दोनों प्रकार के शंकु पाए जाते हैं। नर शंकु से दो, तीन अथवा चार चक्र में लघुबीजाणुधानियाँ (microsporangiums) निकलती हैं। जहाँ से ये निकलती हैं, वहाँ चार-पाँच से आठ जोड़े तक शुल्क होते हैं, जिसमें दो जोड़े बाँझ होते हैं। बीजाणुधानी की संख्या ४-५ या ६ तक होती है। मादा शंकु काफी लंबा तथा २-३ या ४ चक्र में हरे रंग का होता है। सहपत्रों (bracts) की संख्या भी नर से अधिक होती है। अंडकोशिका (egg cell) के चारों ओर कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) भरा होता है। परागकण चिपचिपे द्रव के बूंद में फंस जाता है और लंबे बीजांडद्वार द्वारा खिंचकर अंड तक पहुँचता है। तीन या चार भ्रूण तक एक बीजांड में देखे गए हैं।
वेल्विशिया (Welwitschia) दक्षिण अफ्रीका के पश्चिम तट पर ही उगता है और कहीं भी नहीं पाया जाता। यह तट के कुछ मील के भीतर ही सीमित है। प्रथम इसे टमबोआ मिरैविलिस कहा गया था, परंतु बाद में इसके आविष्कारक डॉ॰ वेल्विश के नाम पर इसे वेल्विश या मिरैविसि कहा गया। यह अत्यंत मरुद्भिदी (xerophytic), अर्थात् सूखे स्थान पर उगनेवाले पौधों जैसा, होता है। जहाँ यह उगता है वहाँ वर्ष भर की पूरी वर्षा लगभग एक इंच ही होती है। शक्ल सूरत तो गाजर जैसी होती है, पर इससे बहुत बड़ा, लगभग ३-४ फुट चौड़ा, होता है। पौधे के ऊपर एक मोदा आवरण बाह्यवल्क (periderm) होता है। मुख्यत: दो ही पत्तियाँ होती हैं, जो बहुत मोटे चमड़े के पट्टे की तरह होती हैं। मध्य भाग में लैंगिक जनन के अंग, जो पकने पर झड़कर गिर जाते हैं, निकलते हैं और वे निकलने के स्थान पर एक क्षतचिन्ह छोड़ देते हैं। पौधे की प्रथम दो पत्तियाँ ही, संपूर्ण जीवन भर बिना झड़े, लगभग ६०-७० या १०० वर्ष तक, लगी रहती हैं। तेज हवा के झोंके से पत्तियाँ लंबाई में, शिराओं की सीधी लाइन में, फट जाती हैं। शिखा से पत्ती सूखती चलती है और नीचे से बढ़ती चलती है। जड़ तो बहुत गहराई तक जाती है।
वेल्विशिया के पौधे के काटने से पता चलता है कि तने तथा जड़ में कैल्शियम ऑक्सैलेट की बहुमुखी सूई के आकार की कंटिका (spicule) की तरह की कोशिकाएँ होती हैं। संवहन ऊतक (vascular tissue) भी कई प्रकार के पाए जाते हैं। नर शंकु और मादा शंकु अलग अलग बनते हैं। बीजांड प्रारंभ में हरे होते हैं, पर पकने पर चमकीले लाल हो जाते हैं। प्रत्येक शंकु में ६०--७० बीजांड होते हैं। उत्पत्ति और अन्य रूप से भी यह पौधा अपना साथी नहीं रखता और ऐसा लगता है कि इसने पौधे की किसी अन्य जाति को भी उत्पन्न नहीं किया है। यह एक जीवित फॉसिल है।
नीटेलीज़ (Gnetales) गण का मुख्य वंश नीटम (Gnetum) है। यह द्विबीजी है तथा आवृतबीज से बहुत मिलता जुलता है। यह लता तथा वृक्ष के रूप में उगता है। यह देश भूमध्य सागरीय नम स्थानों में ही पाया जाता है और इसकी लगभग ३० जातियाँ मिलती हैं। विवृतबीज में यह वंश सबसे अधिक विकसित माना जाता है। माहेश्वरी और वाणिल ने अपनी पुस्तक 'नीटम' में लिखा है कि भारत में नीटम निमोन (G. gnemon) आसाम में, नी. उलवा (G. ulva) पश्चिम तथा पूर्वी तट पर, नी. आबलांगम बंगाल में, नीटम कंट्रैक्टम केरल में, नी. लैटिफोलियम अंडमान, निकोबार में तथा नीटम ऊला अन्य भागों में पाया जाता है।
नीटम के तने की बनावट काफी जटिल होती है। बाह्य त्वचा के बाहर का भाग मोटी दीवार से बना होता है। रध्रं गहरे गड्ढे में बनता है, वल्कुट की कोशिकाएँ पतली होती हैं और उनमें क्लोरोफिल कभी कभी पाया जाता है। मज्जा पतली कोशिका की दीवार होती है। नीटम नीमोन में गौण वृद्धि साधारण ढंग की होती है, परंतु लतरवाली जातियों में ऐसी वृद्धि एक विशेष प्रकार की होती है, जिसमें वल्कुट ही एधा सक्रियता (ambial activity) उत्पन्न करता है। संवहन ऊतक २--३ चक्र में बन जाते हैं, जैसे नीटम ऊला में। संवाहिनी (vessel) के छोर की दीवार एक ही छिद्र से मिली रहती है। ट्रकीड (trachied) के किनारे की दीवारों पर गर्त (pit) होती हैं। मज्जका रश्मि (medullary ray) काफी चौड़ी और ऊँची होती है।
पत्ती बड़े अंडे के आकार की होती है, जिसमें शिराएँ द्विबीज शल्क पत्ती की भाँति जाल बनाती हैं। ये छोटे तने पर अधिक निकलती हैं। ऐसा समझा जाता था कि इनके रध्रं आवृतबीज जैसे सिनडिटोकीलिक होते हैं, पर हाल ही में माहेश्वरी और वासिल (१९६१) ने इसे अन्य विवृतबीज जैसा ही, हैप्लोकीलिक, पाया हैं, जिसमें गौण कोशिका की उत्पत्ति द्वारकोशिका (guard cell) से स्वतंत्र होती है।
सभी जातियों में नर तथा मादा प्रजनन अंग अलग अलग पौधे पर उगते हैं। नर फूल, जिनकी संख्या ३ स ६ या ७ तक होती है, एक गोलाई में निकलते हैं। परागकोश की संख्या प्रति पुष्प १, २, या चार होती है। मादा शंकु में भी 'कॉलर' (स्कंध मूल संधि) जैसा भाग होता है, जिसके ऊपर ४ से १० तक बीजांड लगे होते हैं। ये भी एक गोलाई में निकलते हैं। नीटम का संवृतबीजों का पूर्वज भी कहा गया है।
इन सभी गणों के अतिरिक्त कुछ फॉसिल (fossil) विवृतबीज भी मिले हैं, जिन्हें नए गण, या समूह, में रखा गया है, जैसे वॉजनोवस्किएलीस (Vojonovkyales) और ग्लॉसॉप्टरिस विवृतबीज।
वाजनोवस्किएलीज गण की स्थापना सन् १९५५ में न्यूवर्ग (Neuburg) ने रूस के परमियन और अंगारा फ्लोरा से की।
इसका मुख्य पौधा वाजनोवस्किया पैरेडाक्सा (Vojnovskya paradoxa) है, जो झाड़ी जैसा वृक्ष था और पंखे जैसी जिसकी पत्तियाँ थीं। चेकेनोवस्किया (Czekanowskia) भी एक ऐसा ही पौधा था।
ग्लॉमॉप्टरिस के कई पौधे भारत तथा अफ्रीका के गोंडवाना भूमि से अनुसंधान द्वारा प्राप्त हुए हैं। इनके मुख्य उदाहरण हैं : ग्लासॉप्टरिस (Glossopteris) तथा गैंगमॉप्टरिस की पत्ती (Gangamopteris), ओटोकैरिया (Ottokaria) इत्यादि।



अनावृतबीजी या विवृतबीज (gymnosperm, जिम्नोस्पर्म, अर्थ: नग्न बीज) अनावृतबीजी या विवृतबीज (gymnosperm, जिम्नोस्पर्म, अर्थ: नग्न बीज) Reviewed by rajyashikshasewa.blogspot.com on 10:01 PM Rating: 5

कोणधारी या शंकुधारी (अंग्रेज़ी: coniferous, कॉनिफ़ॅरस)

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उत्तरी कैलीफ़ोरनिया में एक कोणधारियों का जंगल
कोणधारी या शंकुधारी (अंग्रेज़ी: coniferous, कॉनिफ़ॅरस) वृक्षों की एक क़िस्म है। यह ठन्डे या कम गरम इलाक़ों में पनपते हैं और इनपर कोण या शंकु उगते हैं। इन पेड़ों का जनन इन्ही कोणों के ज़रिये होता है। ऐसे पेड़ों के पत्ते भी अक्सर चपटे होने की बजाए लम्बी तीलियों जैसे होते हैं। वैज्ञानिक रूप से इन पेड़ों को 'पाइनोफ़ाइटा' (Pinophyta), 'कॉनिफ़ॅरोफ़ाइटा' (Coniferophyta) या कॉनिफ़ॅरे (Coniferae) कहा जाता है। चीड़ (पाइन)तालिसपत्र (यू), प्रसरल (स्प्रूस), सनोबर (फ़र) और देवदार(सीडर) के पेड़ इसी कोणधारियों की श्रेणी में आते हैं।
कोणधारी या शंकुधारी (अंग्रेज़ी: coniferous, कॉनिफ़ॅरस) कोणधारी या शंकुधारी (अंग्रेज़ी: coniferous, कॉनिफ़ॅरस) Reviewed by rajyashikshasewa.blogspot.com on 9:55 PM Rating: 5

सनोबर (अंग्रेज़ी: fir, फ़र)


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सनोबर
Fir
Red fir.jpg
कैलिफ़ोर्निया में एक लाल सनोबर का वृक्ष
वैज्ञानिक वर्गीकरण
Kingdom:पादप
विभाग:कोणधारी (Pinophyta)
वर्ग:पिनोप्सिडा (Pinopsida)
गण:पायनालेज़ (Pinales)
कुल:पायनेसीए (Pinaceae)
वंश:एबीज़ (Abies)
मिलर
जातियाँ
४५-५५ ज्ञात जातियाँ
सनोबर (अंग्रेज़ी: fir, फ़र) एक सदाबहार कोणधारी वृक्ष है जो दुनिया के उत्तरी गोलार्ध (हॅमिस्फ़ीयर) के पहाड़ी क्षेत्रों में मिलता है। इसकी ४५-५५ जातियाँ हैं और यह पायनेसीए नामक जीवैज्ञानिक कुल का सदस्य है। सनोबर १० से ८० मीटर (३० से २६० फ़ुट) तक के ऊँचे पेड़ होते हैं। इनके तीली जैसे पत्ते टहनी से जुड़ने वाली जगह पर एक मोटा गोला सा बनाते हैं जिस से आसानी से पहचाने जाते हैं। वनस्पति-विज्ञान की दृष्टि से इनका देवदार (सीडर) के वृक्ष के साथ गहरा सम्बन्ध है। भारतीय उपमहाद्वीप में यह हिमालय के क्षेत्र में मिलते हैं।

प्रयोग

सनोबर की लकड़ी हलकी और नरम होने के कारण निर्माण के लिये इस्तेमाल कम होती है। इसकी बजाय इसे गूदकर इससे प्लायवुड आदि के फट्टे बनाए जाते हैं। पेड़ काटे जाने के बाद इस लकड़ी पर कीड़े आसानी से आक्रमण करके इसे छेद देते है और यह नमी का शिकार होकर ढह भी सकती है, इसलिए इसे घर से बाहर प्रयोग नहीं किया जा सकता, हालांकि घर के अंदर रखने वाली चीज़ें इसकी बन सकती हैं।[2] सनोबर का प्रयोग काग़ज़ बनाने के लिये भी बहुत होता है।[3]

भारतीय उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक महत्व

सनोबर के वृक्ष हिमपात के मौसम में भी हरे-भरे रहते हैं जबकि भारतीय उपमहाद्वीप के पहाड़ी क्षेत्रों में कई अन्य पेड़ पतझड़ के मौसम में अपने पत्ते खो देते हैं। इनके सर्दियों में भी स्थाई सौन्दर्य का कई रचनाओं में वर्णन मिलता है, मसलन हरिवंशराय बच्चन ने इनका बखान करते हुए लिखा:[4]
पेड़ सनोबर के लगते हैं कुहरे में भी हरियाले,
हिम की परतों के नीचे हैं बहते चमकीले नाले।
अपने पतले और ऊँचे आकार के लिये भी यह वृक्ष आकर्षक माना जाता है और आधुनिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप में 'सनोबर' एक लड़कियों का नाम है। पहले ज़माने में यह पुरुषों का नाम भी हुआ करता था, मसलन 'गुल-सनोबर' की कथा में गुल लड़की का नाम था और सनोबर लड़के का - १९५३ में इस नाम की बनी हिन्दी फ़िल्म में शम्मी कपूर ने सनोबर का पात्र अदा किया था।
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