Results for सरस्वती सिन्धु (हड़प्पा) सभ्यता

इतिहास- सिन्धु सभ्यता का विनाश (DESTRUCTION OF INDUS CIVILIZATION)

DESTRUCTION OF INDUS CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का विनाश

सिन्धु सभ्यता का विनाश (DESTRUCTION OF INDUS CIVILIZATION)

सिन्धु सभ्यता का विनाश किस प्रकार और कब हुआ ? इस सन्दर्भ में कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः अनेक विद्वानों ने कल्पना तथा अनुमान के आधार पर इस सभ्यता के विनाश के कई कारण बताये हैं, जिनका विवरण निम्नांकित है-

(i) बाहरी आक्रमण- अनेक विद्वानों का अनुमान है कि किसी बाहरी जाति के आक्रमणकारियों ने इस सभ्यता का विनाश किया। सिन्धु सभ्यता के निवासी समृद्ध और शान्तिप्रिय थे। उनके नगरों की सुरक्षा समुचित प्रबन्ध नहीं था और न ही उनके पास अच्छे हथियार थे। इसलिए वे बर्बर जातियों के आक्रमण का शिकार हुए होंगे। मोहनजोदड़ो में सड़कों, गलियों तथा आंगन आदि में अनेक अस्थिपंजर मिले। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि बाहरी लोगों ने उन पर अचानक आक्रमण कर दिया और उनकी हत्या कर दी। किन्तु यह मत उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उत्खनन में जो अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं,वे एक ही नस्ल की हैं । यदि बाहरी आक्रमण हुआ होता तो आक्रमणकारी भी मारे गये होते, तो उनकी भी अस्थियाँ मिलनी चाहिए थीं ।

(ii) जलवायु परिवर्तन- अनेक विद्वानों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण सिन्ध सभ्यता का विनाश हुआ होगा। विद्वानों का मत है कि प्रारम्भ में सिन्धु प्रदेश में वर्षा प्रचुर रूप से होती थी, किन्तु कालान्तर में वर्षा कम होने लगी और धीरे-धीरे प्रदेश रेगिस्तान बन गया। अतः उजाड़ हो गए। नगर विद्वानों के इस अनुमान में कुछ सार प्रतीत होता है,क्योंकि संसार के अनेक क्षेत्रों की जलवायु में तीव्र परिवर्तन हुए, जिससे जो क्षेत्र कभी हरे-भरे थे वे आगे चलकर उजाड़ हो गए थे। यदि सिन्धु सभ्यता में भी कुछ ऐसा ही हुआ हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

(iii) बाढ़- कुछ विद्वानों का अनुमान है कि सिन्धु तथा इसकी सहायक नदियों की बाढ़ों ने मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा नगरों का विनाश किया था। यहाँ पर उत्खनन में सिन्धु नदी के वर्तमान तल से इक्कीस मीटर ऊंचाई पर नदी की रेत तथा मिट्टी मिली है। इससे स्पष्ट होता है कि नदियों में बाढ़ का पानी कभी-कभी इक्कीस मीटर तक ऊंचा चढ़ जाता था।

(iv) भूकम्प- कुछ इतिहासकारों का मत है कि सम्भवतः किसी शक्तिशाली भूकम्प के द्वारा इस सभ्यता का विनाश हुआ होगा।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता की देन एवं विदेशों से सम्बन्ध [CONTRIBUTION OF INDUS CIVILIZATION AND RELATION OF INDUS CIVILIZATION WITH FOREIGIN COUNTRIES]

CONTRIBUTION OF INDUS CIVILIZATION AND RELATION OF INDUS CIVILIZATION WITH FOREIGIN COUNTRIES
सिन्धु सभ्यता की देन एवं विदेशों से सम्बन्ध

सिन्धु सभ्यता की देन [CONTRIBUTION OF INDUS  CIVILIZATION]

इतिहासकारों का मानना है कि सिन्धु घाटी सभ्यता सभी प्राचीन सभ्यताओं में सर्वश्रेष्ठ थी। सिन्धु सभ्यता की देन के विषय में डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने लिखा है, "सिन्धु सभ्यता के लोगों ने सबसे पहले नगर दिए, सबसे पहले नागरिक सभ्यता प्रदान की, सबसे पहले नगर योजना उपलब्ध कराई, बाढ़ से बचने के लिए सबसे पहले पत्थर और ईटों के बाँध दिए और सफाई के लिए सबसे पहले जल निकास व्यवस्था प्रदान की। उनको ही सबसे पहले मिट्टी के बर्तन बनाने का श्रेय प्राप्त है।"

सिन्धु सभ्यता का विदेशों से सम्बन्ध (RELATION OF INDUS CIVILIZATION WITH FOREIGIN COUNTRIES)

सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों के विश्व के अन्य देशों के साथ भी सम्बन्ध थे। यह सम्बन्ध राजनीतिक थे अथवा नहीं ? इसमें सन्देह है, किन्तु यह निश्चित है कि उनके अन्य देशों से व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता के व्यापारिक आदान-प्रदान ने सांस्कृतिक क्षेत्र में भी एक-दूसरे को प्रभावित किया। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि सिन्धु एवं सुमेर सभ्यता में काफी समानता है। सुमेर में अनेक मुहरें  प्राप्त हुई हैं जो सिन्धु सभ्यता की मुहरों से एकरूपता रखती हैं, परन्तु दोनों सभ्यताओं में किसने किसको प्रभावित किया, इस विषय पर विद्वान एकमत नहीं हैं। इसी प्रकार मिस्र में मिले आभूषणों और श्रृंगार के प्रसाधनों से स्पष्ट होता है कि वे सिन्धु सभ्यता के आभूषणों व श्रृंगार प्रसाधनों के लगभग समान ही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धुवासियों का विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध था।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता की विज्ञान एवं तकनीकी [SCIENCE AND TECHNOLOGY OF INDUS CIVILIZATION]

SCIENCE AND TECHNOLOGY OF INDUS CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता की विज्ञान एवं तकनीकी

सिन्धु सभ्यता की विज्ञान एवं तकनीकी [SCIENCE AND TECHNOLOGY OF INDUS CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत उत्खनन से प्राप्त सामग्री के आधार पर तत्कालीन विज्ञान एवं तकनीकी के विकास की जानकारी प्राप्त होती है। उत्खनन से प्राप्त तोल और माप के निश्चित साधनों से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग अंकगणित से भलीभाँति परिचित थे। उत्खनन से प्राप्त बाँटों में दशमलव इकाइयों के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जाता है कि सिन्धुवासी दशमलव पद्धति से परिचित थे। सिन्धु सभ्यता की भवन और नगरनिर्माण की निश्चित योजना से स्पष्ट है कि सिन्धुवासी ज्यामिति के उच्च सिद्धान्तों से परिचित थे । विद्वानों का मानना है कि सिन्डवासियों को ज्योतिष विज्ञान के सिद्धान्तों की भी जानकारी थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई के प्रति सिन्डवासियों की जागरूकता इस बात का संकेत है कि सिन्धु सभ्यता के लोग रोगों से बचने का उपाय जानते थे और उन्हें चिकित्सा विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान भी था। उत्खनन से कुछ ऐसे पदार्थ मिले हैं, जो कदाचित औषधि के रूप में प्रयुक्त होते थे; उदाहरणार्थ- मोहनजोदड़ो से शिलाजीत मिला है, हिरन के सींग का चूर्ण औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जाता था, कहीं-कहीं पर समुद्रफेन भी प्राप्त हुआ है ।
सिन्धु सभ्यता में पाषाण प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत बड़े पैमाने पर समानान्तर फलकों का उत्पादन,मनके बनाने की कला और सेलखड़ी की आयताकार मोहरें बनाने की तकनीक शामिल है। इसी प्रकार धातु प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत प्राप्त ताम्र-काँस्य वस्तुएँ, धातु-कर्म तकनीक का संकेत देती हैं। सिन्धु सभ्यता के लोग सोना, चांदी, टिन, सीसा और तबा धातुओं से परिचित थे। सिन्धुवासी इन धातुओं से मात्र परिचित ही नहीं अपितु इन्हें गलाने की तकनीक तथा इनका मिश्रण करने की तकनीक में भी काफी दक्ष थे। उत्खनन से विविध धातुओं से बनी अनेक वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें औजार, हथियार, आभूषण बर्तन, मूर्तियाँ और खिलौने उल्लेखनीय हैं। मोहनजोदड़ो से ताँबे का बना एक कुबड़दार बैल का खिलौना, ताँबे के कलश में रखा हुआ पीतल का बना बकरी का खिलौना, ताँबे और पीतल के बने अन्य खिलौने, स्वर्ण निर्मित नर्तकियों की मूर्तियाँ आदि मिली हैं, इसी प्रकार चन्हुदड़ो से पीतल की बनी एक बतख मिली है, इसके अतिरिक्त सोने-चाँदी के अनेक आभूषण भी प्राप्त हुए हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सिन्ध सभ्यता के लोग धातु-विज्ञान उत्कृष्ट ज्ञान रखते थे।
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगा आदि स्थानों से प्राप्त सामग्री में विद्यमान समानता इस सभ्यता के तकनीकी ज्ञान को स्पष्ट रूप से उजागर करती है। सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत कृषि, नगर-नियोजन, भवन-निर्माण, जल निकासी उद्योग-धन्धों और अन्य क्षेत्रों में जो उन्नति देखने को मिलती ,उससे के लोग विज्ञान और तकनीकी अनुसन्धान में गहन रुचि रखते थे।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता में कला का विकास [DEVELOPMENT OF ART IN INDUS CIVILIZATION]

DEVELOPMENT OF ART IN INDUS CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता में कला का विकास

सिन्धु सभ्यता में कला का विकास [DEVELOPMENT OF ART IN INDUS CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन से अनेक मूर्तियाँ, बर्तन, कलश, मुहरें, आभूषण आदि प्राप्त हुए हैं, जिनसे तत्कालीन कला एवं ललित कला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

(1) स्थापत्य कला- सिन्धु के लोग उच्चकोटि के इंजीनियर थे। विशाल सभ्यता अन्नागार तथा सार्वजनिक स्नानागार बनाना, साधारण कोटि के शिल्पियों का काम नहीं था। उत्खनन में प्राप्त सुनियोजित नगर, भवन, सार्वजनिक स्नानागार व अन्नागार आदि उनकी स्थापत्य कला को प्रमाणित करते हैं।

(2) मूर्तिकला- मूर्तिकला के क्षेत्र में सिन्धुवासियों ने विशेष उन्नति की थी। विभिन्न स्थलों के उत्खनन में मिट्टी, पत्थर और धातु से बनी अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि सिन्धुवासी मूर्तिकला में अत्यंत दक्ष थे
होता है कि सिन्धुवासी मूर्तिकला में अत्यन्त दक्ष थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त मूर्तियों में बैठे हुए पुरुष की मूर्ति सर्वोत्तम, यह मूर्ति किसी देवता अथवा धार्मिक गुरु की प्रतीत होती है। खुदाई में कांसे की नर्तकी की मूर्ति भी मिली है, यह त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी हुई। इन मूर्तियों में सजीवता दृष्टिगोचर होती है और इनमें शरीर के अंगों को स्पष्ट तथा वास्तविक रूप में दर्शाया गया है।

(3) चित्रकला- सिन्धु सभ्यता के लोग चित्रकला से भी परिचित थे। उनकी चित्रकारी के नमूने बर्तनों और खिलौनों
आदि पर देखने को मिलते हैं। इस काल में प्रायः बेल-बूटे, पशु-पक्षी तथा पेड़-पत्तियों के चित्र बनाए जाते थे।

(4) संगीत व नृत्य कला- सिन्धु सभ्यता के लोग नृत्य तथा संगीत कला से भी परिचित थे। खुदाई से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति व ढोल-तबले से मिलते-जुलते चित्रों से स्पष्ट है कि इस काल में संगीत एवं है नृत्य कला भी उन्नत अवस्था में थी।
(5) धातु कला- सिन्धु सभ्यता के लोग धातु कला से भी परिचित थे। धातु कला के अन्तर्गत ये लोग सोने, चांदी और ताँबे आदि के आभूषणों का निर्माण करते थे। ये लोग लोहे से परिचित नहीं थे।

(6) मुहर निर्माण कला- सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों की खुदाई में मुहरें बहुतायत में प्राप्त हुई हैं। ये मुहरें लाख, पत्थर और चमड़े आदि पर बनी हुई हैं। इनमें से बहुत सी मुहरों पर सांड, हाथी, बारहसिंगा आदि पशुओं की आकृतियाँ बनी हुई है।

(7) लेखन कला- सिन्धु सभ्यता की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं से ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों को लिखने की कला का ज्ञान था । सिन्धु वासियों की लिपि चित्रात्मक थी। इस लिपि के प्रत्येकचित्र से किसी  एक विशेष शब्द बोध है। किन्तु अभी तक इस लिपि को पड़ा नहीं जा सका है।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता का राजनीतिक स्वरूप, नगर निर्माण एवं वास्तुकला [POLICAL NATURE, TOWN CONSTRUCTION AND ART OF BUILDING OF INDUS CIVILIZATION]

POLICAL NATURE, TOWN CONSTRUCTION  AND ART OF BUILDING OF INDUS  CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का राजनीतिक स्वरूप, नगर निर्माण एवं वास्तुकला

सिन्धु सभ्यता का राजनीतिक स्वरूप [POLICAL NATURE OF INDUS  CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता के राजनीतिक स्वरूप का निर्धारण करना एक दुष्कर कार्य है, फिर भी विभिन्न विद्वानों ने इस विषय पर विभिन्न मत प्रतिपादित किए हैं। इस सन्दर्भ में हण्टर महोदय का विचार है कि सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक नहीं बल्कि लोकतन्त्रात्मक थी, जबकि मैके के अनुसार मोहनजोदड़ो में एक प्रतिनिधि शासक प्रशासन करता था। इसी सन्दर्भ में व्हीलर महोदय का विचार है कि मोहनजोदड़ो की शासन व्यवस्था धर्म गुरुओं और पुरोहितों के हाथों में केन्द्रित थी। सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत योजनाबद्ध निर्माण को देखते हुए यह माना जाता है कि नगरपालिका जैसी कोई सार्वजनिक संस्था अवश्य रही होगी। इस सन्दर्भ में विद्वान लेखक गार्डन चाइल्ड का कथन है, "सिन्धु सभ्यता के निवास गृहों, सार्वजनिक भवनों, स्नानागारों, विभिन्न मागों आदि का नियोजन तथा व्यवस्थित रूप यह प्रमाणित करता है कि यहाँ का प्रशासन विकसित एवं सुसंगठित था।" सिन्ध सभ्यता के राजनीतिक जीवन के जो भी प्रमाण उपलब्ध हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ का नागरिक जीवन सुरक्षित, शान्तिपूर्ण तथा व्यवस्थित था।

नगर निर्माण एवं वास्तुकला (TOWN CONSTRUCTION  AND ART OF BUILDING)

(1) नगर निर्माण योजना- सिंधु सभ्यता का स्वरूप नगरीय था। सिन्धु सभ्यता की नगर योजना की आधार सामग्री हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, चंहुदड़ों, कालीबंगा, लोथल बगावती से प्राप्त होती है। सिंधु सब्यता कालीन नगरों में  चौड़ी-चौड़ी  सड़के पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाती थीं, जो प्राय: एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। इस प्रकार प्रत्येक नगर अनेक खण्डों में अर्थात् मोहल्लों में बंट जाता था। प्रमुख सड़कों
गलियाँ निकलती थीं, जो एक से दो मीटर चौड़ी होती थीं। मोहनजोदड़ो में एक 11 मीटर चौड़ी सड़क भी थी, जो सम्भवतः राजमार्ग रही होगी। नगरों में जल निकासी की समुचित व्यवस्था होती थी । सड़कों के किनारे नालियाँ होती थीं,जो पक्की व ढकी हुई होती थीं।

(2) भवन निर्माण- सिन्धु सभ्यता के लोग नगर निर्माण की भाँति भवन निर्माण में भी अत्यन्त कुशल थे। इस तथ्य की पुष्टि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त भग्नावशेषों से होती है। सिन्धु सभ्यता में विभिन्न प्रकार के भवन प्राप्त हुए हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है-

(क) साधारण भवन- साधारण लोगों के रहने के मकानों का निर्माण सड़क के दोनों ओर किया जाता था। साधारण भवनों का आकार जरूरत के अनुसार छोटा व बड़ा होता था। ये भवन एक से दो मंजिल तक होते थे।  ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए पत्थरों व ईंटों की सीढ़ियाँ होती थीं। भवन को बनाते समय हवा व प्रकाश का पूर्ण ध्यान रखा जाता था। भवनों में दरवाजे, खिड़कियाँ एवं रोशनदान, रसोईघर,स्नानगृह, आंगन व कुंआ भी होते थे। दरवाजे व छत लकड़ी के बनाए जाते थे। भवनों के दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर गली में खुलते थे । दीवारें बहुत मोटी बनाई जाती थीं। फर्श ईंटों, खड़िया और गारे से बनाया जाता था। भवनों में जल निकास की समुचित व्यवस्था की जाती थी ।

(ख) सार्वजनिक एवं राजकीय भवन- सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन के परिणामस्वरूप यह तथ्य प्रकाश में आया है कि साधारण भवनों के अतिरिक्त यहाँ पर सार्वजनिक एवं राजकीय भवन भी थे। मोहनजोदडो में एक विशाल भवन के अवशेष प्राप्त होते हैं, जो लगभग 10 मीटर लम्बा व 24 मीटर चौड़ा है,इस भवन की दीवारें 1.50 मीटर मोटी हैं। इस विशाल भवन में अनेक कमरे भण्डारागार व दो आगन हैं। मोहनजोदडो में इसी
एक अन्य विशाल भवन और प्राप्त हुआ है, जो 71 मीटर लम्बा और इतना ही चौडा है। इसमें प्रकार का एक विशाल हॉल है, जिसकी छत 20 स्तम्भों पर टिकी हुई है, इसके फर्श पर अनेक स्थानों पर चौकियाँ बनी हुई हैं। सम्भवतः इस भवन का प्रयोग विचार विनिमय के लिए होता होगा।

(ग) सार्वजनिक स्नानागार- मोहनजोदडो की खुदाई से एक विशाल स्नानागार भी प्राप्त हुआ है। यह विशाल स्नानागार एक विशाल भवन के मध्य में स्थित है। स्नानागार का जलाशय आयताकार है। यह 39 फीट चौड़ा व 8 फीट गहरा है। इसके प्रत्येक ओर जल तक पहुँचने के लिए ईंटों की सीढ़ियाँ हैं। जलाशय की दीवार व फर्श पक्की ईटों हआ है। जलाशय में जल निकास की समुचित व्यवस्था की गई थी। जलाशय के चारों ओर बरामदे हैं का बना तथा इनके पीछे कमरे बने हुए हैं। इतिहासकारों का अनमान है कि यह जलाशय सम्भवतः धार्मिक महत्व रखता था तथा पवित्र पर्वों पर लोग इसमें स्नान करते थे ।

(घ) अन्न भण्डारागार- हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से कुछ अन्य विशाल भवन भी मिले है, जिन्हें इतिहासकार अन्न भण्डारगृह मानते हैं। यह अन्न भण्डारागार हड़प्पा में राजमार्ग के दोनों ओर 1.25 मीटर ऊंचे चबूतरों पर छह-छह की पंक्तियों में बने हुए हैं। अन्न भण्डारागारों की लम्बाई 18 मीटर और चौड़ाई 7 मीटर है।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता का आर्थिक जीवन [ECONOMIC LIFE OF INDUS CIVILIZATION]

ECONOMIC LIFE OF INDUS CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का आर्थिक जीवन

सिन्धु सभ्यता का आर्थिक जीवन [ECONOMIC LIFE OF INDUS CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन से प्राप्त किए गए अवशेषों से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी।

(1) कृषि- सिन्धु सभ्यता के निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। यहाँ कपास, मटर, तिल तथा विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते थे। डॉ.ए. एल.वाशम के अनुसार सिन्धुवासियों को चावल का ज्ञान नहीं था, परन्तु अब लोथल, रंगपुर आदि स्थानों पर चावल के अवशेष प्राप्त होने से यह विचार बन गया है कि सिन्धुवासी चावल की भी खेती करते थे।

(2) पशुपालन- सिंधु सभ्यता के लोग कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी करते थे। पुरातात्विक स्रोतों से ज्ञात होता है कि ये लोग गाय, बैल, भेड़, बकरी व कुता आदि पालते थे, ये लोग सम्भवतः अश्व से अपरिचित थे।

(3) कपड़े बुनना-  सिन्धु सभ्यता के काल में बड़े पैमाने पर सूती कपड़ा बनाया जाता था। विभिन्न स्थलों की खुदाई में सूत कातने के चरखे और तकलियाँ बड़ी मात्रा में प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि सिन्धु सभ्यता के
घर-घर में कताई-बुनाई का काम होता था ।

(4) उद्योग व अन्य व्यवसाय-  सभ्यता के लोग शिल्पकला में अत्यन्त दक्ष थे। ये लोग विविध उद्योग-धन्ये भी किया करते थे। सिन्धु सभ्यता में वस्त्र निर्माण, आभूषण बनाना और मिट्टी के बर्तन बनाना आदि उद्योग-धन्धे प्रचलित थे। इसके अतिरिक्त सिन्धु सभ्यता के लोग कताई-बुनाई, रंगसाजी, कुम्हारगिरी, लोहारगिरी, सुनारगिरी व बढ़ईगिरी आदि के व्यवसाय किया करते थे।

(5) व्यापार- सिन्धु सभ्यता के लोग सुमेरिया, बेबीलोन, अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, मिस्र आदि देशों से व्यापार करते थे। वैदेशिक व्यापार थल व जल दोनों ही मार्गों से किया जाता था। थल पर बैलगाड़ियों एवं जल में जहाजों का प्रयोग किया जाता था। इस सभ्यता के प्रमुख बन्दरगाह लोथल और सोल्काकोह थे।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता का धार्मिक जीवन [RELIGIOUS LIFE OF INDUS CIVILIZATION]

RELIGIOUS LIFE OF INDUS  CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का धार्मिक जीवन 

सिन्धु सभ्यता का धार्मिक जीवन [RELIGIOUS LIFE OF INDUS  CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यताकालीन धार्मिक जीवन के विषय में जानने के लिए पूर्णतः पुरातात्विक स्रोतों का ही सहारा लेना पड़ता है। पुरातात्विक स्रोतों के अतिरिक्त मेसोपोटामिया से प्राप्त लेख (जिनको पढ़ा जा चुका है) सिन्धु सभ्यताकालीन धर्म के विषय में जानकारी प्रदान करने में सहायक हैं। इन स्रोतों से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यताकालीन लोग निम्नांकित पूजा किया करते थे-

(1) मातृ देवी की पूजा-  मातृ देवी सिन्धु सभ्यता के लोगों की प्रधान देवी थीं, जिनकी अनेक मूर्तियाँ खुदाई से प्राप्त हुई हैं। मातृ देवी की कुछ मूर्तियों में उन्हें आभूषण युक्त तथा कुछ में आभूषणविहीन दिखाया गया है । मातृ देवी की मूर्तियाँ धुएँ से रंगी हुई मिली हैं। अर्नेस्ट मैके का विचार है कि पूजा के समय इन मूर्तियों के सामने धूप जलाई जाती होगी। सिन्धु  सभ्यता के लोग मातृ देवी को सम्पूर्ण लोक की जननी एवं पोषिका मानते थे। सम्भवत: मातृ देवी की पूजा के समय बलि भी दी जाती थी।

(2) शिव पूजा- हड़प्पा की खुदाई में एक ऐसी मूर्ति प्राप्त हुई है, जिससे शिव पूजा की जानकारी मिलती है। इस मूर्ति में एक पुरूष देवता को एक उच्च सिंहासन पर योगासन को मुद्रा में बैठा हुआ दिखाया गया है, जिनके तीन
मुख व तीन नेत्र हैं। उनके सिर पर सींगों वाला ऊंचा मुकुट, जो त्रिशूल की शक्ल का है, धारण है। विद्वानों का यह मानना है कि यह शिव  की मूर्ति है। इस मूर्ति के अतिरिक्त हड़प्पा से मोहनजोदड़ो से अनेक लिंगों का प्राप्त होना भी इस बात की पुष्टि करता है कि 'शिव' सिन्धु सभ्यता के प्रमुख देवता थे।

(3) योनि पूजा- सिन्धु सभ्यता की खुदाई से अनेक छल्ले प्राप्त हुए हैं, जो सीप, मिट्टी और पत्थर आदि के बने हुए हैं। इतिहासकारों का मानना है कि ये छल्ले देवियों को योनि के प्रतीक थे, जिनकी पूजा की जाती थी।

(4) पशु पूजा- सिन्धु सभ्यता की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर बैल, भैस आदि पशुओं के चित्र मिलते है, जिनसे उस समय पशु पूजा किये जाने का अनुमान किया जाता है।

(5) सूर्य पूजा— सिन्धु सभ्यता की खुदाई में प्राप्त कुछ मुद्राओं पर सूर्य के चिन्ह मिलते है, जिनसे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धु लोग सूर्य-पूजा करते थे।

(6) वृक्ष पूजा— सिन्धु सभ्यता के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। उस समय नीम, खजूर, शीशम, बबूल व पीपल आदि वृक्षों की पूजा की जाती थी, किन्तु सर्वाधिक पवित्र वृक्ष पीपल माना जाता था।

(7) मृतक संस्कार- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के उत्खनन से प्राप्त सामग्री से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग मृतक संस्कार के लिए तीन प्रकार की विधियाँ अपनाते थे- 
(i) मृतक को ज्यों-का-त्यों दफनाना, 
(ii) मृतक को पहले पशु-पक्षियों का आहार बनने के लिए खुले में छोड़ना और फिर उसकी अस्थियों को दफनाना, 
(iii) मृतक को जलाकर उसकी राख व अस्थियों को कलश में भरकर भूमि में गाड़ना। उत्खनन में ऐसे अनेक कलश प्राप्त होने से इतिहासकारों ने अनुमान लगाया है कि उस समय मृतक संस्कार की यह विधि सर्वाधिक प्रचलित रही होगी।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता का सामाजिक जीवन [SOCIAL LIFE OF INDUS CIVILIZATION]

SOCIAL LIFE OF INDUS  CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का सामाजिक जीवन

सिन्धु सभ्यता का सामाजिक जीवन (SOCIAL LIFE OF INDUS  CIVILIZATION)

लिखित साक्ष्यों के अभाव में यद्यपि सिन्धु सभ्यता के सामाजिक जीवन के विषय में  जानना एक दुष्कर कार्य है, फिर भी उत्खनन से प्राप्त सामग्री से सिन्धु सभ्यता के लोगों की सामाजिक स्थिति, विशेषकर तत्कालीन खान- पान, वेश-भूषा, आभूषण आदि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

(1) सामाजिक संगठन- सिन्धु सभ्यता का समाज जातियों में विभाजित नहीं था। सम्भवतः उनका समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित था। मुख्यतः उसमें चार श्रेणियाँ थीं । प्रथम, बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें पुरोहित, चिकित्सक और ज्योतिषी आदि सम्मिलित थे। द्वितीय, योद्धा वर्ग जो सैनिक वर्ग था। तृतीय, व्यापारियों, शिल्पियों, कलाकारों आदि का वर्ग था। चतुर्थ, श्रमिक वर्ग था, जिसमें किसान, मजदूर, मछली पकड़ने वाले, गृह सेवक आदि सम्मिलित थे।

(2) भोजन- सिन्धु सभ्यता के निवासियों का मुख्य भोजन गेहूं, जौ, दूध, फल और मछली का माँस था। गेहूं और जौ पीसने के लिए चक्कियाँ नहीं थीं, बल्कि उन्हें ओखलियों में कूटकर उनका आटा बनाया जाता था। यहाँ के लोग मुर्गों, गाय, भैंस, सुआर, घड़ियाल और कछुओं आदि के माँस का भी प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त वे सब्जियों का भी प्रयोग करते थे तथा खजूर भी खाते थे।

(3) वेश-भूषा-- सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों से तत्कालीन लोगों की वेश-भूषा के बारे में जानकारी मिलती है। सिन्धु सभ्यता के स्त्री और पुरुषों की वेशभूषा प्रायः समान थी । कमर से नीचे धोती और कमर से ऊपर बायें कन्धे से दायें कन्धे के नीचे दबने वाला शॉल उनके मुख्य वस्त्र थे। यह सिले हुए होते थे या नहीं, यह स्पष्ट नहीं  है। परन्तु उत्खनन में प्राप्त सुइयों से संकेत मिलता है कि यहाँ के निवासी सिलाई करना जानते थे।

(4) प्रसाधन सामग्री एवं आभूषण- सिन्धु सभ्यता के निवासी आभूषण प्रिय थे। वे विभिन्न प्रकार से अपनी साज-सज्जा किया करते थे। वे अपने केश विविध प्रकार से सजाते थे। स्त्री और पुरुष, दोनों ही लम्बे केश रखते  थे। ये लोग अपने केशों में सोने, चांदी अथवा ताँबे के हेयर पिन लगाते थे। सम्भवतः स्त्रियाँ छोटी को बनाया करती थीं। पुरुष दाढ़ी रखते थे, परन्तु मूछों को साफ करने का प्रचलन था। पुरुष, उस्तरे का प्रयोग जानते थे। स्त्रियाँ  सौन्दर्य प्रसाधनों से पूर्णतः अवगत थीं। चेहरे को सुन्दर बनाने के लिए उन्हें काजल, लिपिस्टिक व विभिन्न रंगों के पाउडर आदि का प्रयोग आता था। वे श्रृंगारदान और श्रृंगार की मेज का भी प्रयोग करती थीं।
आभूषणों का प्रयोग स्त्री और पुरुष समान रूप से करते थे। आभूषण, सोना, चांदी, तांबा और हाथी दांत के बनाये जाते थे। वे कीमती पत्थरों और जवाहरातों का प्रयोग करते थे। पुरुष कंठहार, भुजबन्द और अंगूठी का प्रयोग करते थे, जबकि स्त्रियाँ चूड़ियाँ, कड़े, बुन्दे कण्ठहार, टीका तथा कमरबन्द, पायजेब आदि आभूषणों का प्रयोग करती थीं।

(5) आमोद-प्रमोद के साधन--  सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों की खुदाई में क्रीड़ा तथा मनोविनोद की अनेक वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। उनके मनोरंजन के विभिन्न साधन थे। उनके प्रमुख खेल गेंद और चौपड़ थे। इसके अतिरिक्त नाचना, गाना, बजाना, शिकार करना, साँड़ों के व मुर्गे की लड़ाई देखना भी उनके मनोरंजन के साधन थे। बच्चों के मनोरंजन के लिए खिलौने बनाए जाते थे, जो अधिकांशतः मिट्टी के होते थे।

(6) गृहस्थी के उपकरण-  सिन्धु सभ्यता के लोग घरों में उपयोग आने वाली विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग करते थे, जो मिट्टी, पत्थर, हाथी,  दाँत, ताँबे और कांसे से बनायी जाती थीं। तश्तरियाँ, कटोरे, घड़े, सुराही, फूलदान, अन्य विभिन्न बर्तन, लकड़ी की कुर्सियाँ, मेज, चारपाई, हाथी दांत की सुइयाँ और कंधे, कुल्हाड़ी, चाकू, मछली का काँटा, आरी, ताँबे और मिट्टी के दीपक आदि विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था। मिट्टी की वस्तुओं को पकाया जाता था और उन पर पॉलिश भी की जाती थी।

(7) औषधियाँ- उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों को मानवीय चिकित्सा का ज्ञान था। वे शिलाजीत का प्रयोग जानते थे। कुछ पशुओं की हड्डियों तथा वृक्षों के पत्तों व छालों को औषधि के रूप में प्रयोग करना भी उन्हें आता था। इस तथ्य से ज्ञात होता है कि भारतीयों का आयुर्वेद का चिकित्सा ज्ञान सिन्धु सभ्यता के काल से ही प्रारम्भ होता था। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सिन्धु सभ्यता में खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के उदाहरण भी कालीबंगा और लोथल से प्राप्त होते हैं।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता के निर्माता [FOUNDERS OF INDUS CIVILIZATION]

FOUNDERS OF INDUS  CIVILIZATION
FOUNDERS OF INDUS  CIVILIZATION

सिन्धु सभ्यता के निर्माता [FOUNDERS OF INDUS  CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे ? यह एक अत्यन्त विवादास्पद प्रश्न है। सिन्ध सभ्यता के निर्माता भारतीय अर्थात् स्थानीय ही थे, अथवा विदेशी यह निर्धारित करना भी एक कठिन कार्य है। विभिन्न विद्वानों ने द्रविड़ों, सुमेरों और आयों आदि को इस सभ्यता का निर्माता माना है।

(1) द्रविड़- अधिकतर विद्वानों, जिनमें राखलदास बनर्जी प्रमुख, का मत है कि द्रविड़ लोग सिन्धु सभ्यता के निर्माता थे । विद्वान व्हीलर ने भी ऋग्वेद में वर्णित 'दस्यु' अथवा 'दास' को सिन्धु सभ्यता के निर्माता माना है।  उनका मानना है कि आर्यों ने इन्हीं दस्युओं से युद्ध किया और उन्हें पराजित कर वे भारत में आगे बढ़े और यहाँ बस गए। वेदों में भी आर्यों  और असुरों के युद्धों का वर्णन है। इससे स्पष्ट होता है कि असुर अर्थात् द्रविड़ ही सिन्धु सभ्यता के निर्माता थे।
आर्यों से पराजित हो जाने के पश्चात् द्रविड़ लोग दक्षिण भारत की ओर चले गए और धीरे-धीरे वे वहाँ बसते चले गये। इसके प्रमाण दक्षिण भारत में प्राप्त बर्तनों, उपकरणों व आभूषणों के रूप में मिलते, जो सिन्धु घाटी में प्राप्त बर्तनों,उपकरणों व आभूषणों के समान हैं। इसके अतिरिक्त बलूचिस्तान में रहने वाली ब्राहुई जाति की भाषा और द्रविड़ भाषा में काफी समानता है। इससे स्पष्ट है कि सिन्धु घाटी की द्रविड़ भाषा से ब्राहुई भाषा की उत्पत्ति हुई हो। लेकिन जब तक यह भाषा सही और पूर्ण रूप से पढ़ी नहीं जाती, तब तक भाषा का यह प्रमाण संदिग्ध है। 

(2) सुमेर- कुछ विद्वान सिन्धु सभ्यता को सुमेर सभ्यता से सम्बन्धित मानते हैं, क्योंकि सिन्धु सभ्यता के अनेक उपकरण व सामग्री उनसे मिलतेजुलते हैं, जैसे- ताँबे व कांसे के पात्र, पकाई हुई ईटें व चित्रलिपि आदि । विद्वान इतिहासवेत्ता गार्डन चाइल्ड का मत है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता सुमेरियन थे, परन्तु इसके लिए अकाट्य और विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। 

(3) आर्य- कुछ विद्वानों जिनमें लक्ष्मणस्वरूप पुसाल्कर एवं रामचन्द्रन प्रमुख हैं,का मत है कि सिन्धु सभ्यता आर्यों की ही सभ्यता थी और आर्य ही इस सभ्यता के निर्माता थे। लेकिन आर्यों को सिन्धु सभ्यता का निर्माता स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि आर्यों की सभ्यता और सिन्धु सभ्यता में निम्नांकित प्रमुख अन्तर थे-
(i) आर्य सभ्यता प्रामीण और कृषि प्रधान थी, सिन्धु सभ्यता नगरीय और व्यापार प्रधान थी। 
(ii) आर्य युद्ध प्रिय थे और वे ढाल-कवच आदि का युद्ध में उपयोग करते थे। सिन्ध सभ्यता के लोग शान्तिप्रिय थे और उनके पास युद्ध करने के आयुधों का अभाव था।
(iii) आर्य गाय की पूजा करते थे, जबकि सिन्ध सभ्यता में बैल अधिक सम्माननीय था।
(iv) आर्य सभ्यता के लोग ताँबा,सीसा, कांसा, सोना, चाँदी, लोहा आदि धातुओं का प्रयोग करते थे, लेकिन सिन्धु सभ्यता के लोग पत्थर, लकड़ीताँबा और कांसे का ही विशेष रूप से प्रयोग करते थे।
(vi) सिन्धु सभ्यता के निवासी मूर्तिपूजक थे तथा वे शिव-पूजा, मातृ-पूजा व लिंग-पूजा करते थे। जबकि आर्य सभ्यता के लोग मूर्ति पूजा नहीं करते थे, वे सूर्य, अग्नि, पृथ्वी, इन्द्र, सोम, वरुण आदि की स्तुति मन्त्रों से पूजा करते थे।
उपरोक्त विभिन्नताओं  के कारण इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सिंधु सभ्यता के  उपलब्थ नर-कंकालों से ज्ञात होता है कि यहां पर विभिन्न प्रजातियों के लोग रहते थे।  आर्यों के आगमन से पूर्व ही यहाँ के निवासियों ने विभिन्न प्रजातियों के संपर्क से प्रभावित होकर एक नवीन विकसित सभ्यता का विकास कर लिया था।
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता का काल [PERIOD OF INDUS CIVILIZATION]

PERIOD OF INDUS  CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता का काल

सिन्धु सभ्यता का काल [PERIOD OF INDUS  CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता की तिथि के विषय में विद्वान् इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं के विचारों में पारस्परिक मतभेद हैं। कुछ विचारक इस सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानते हैं। सर जॉन मार्शल के अनुसार सिन्धु सभ्यता की तिथि 3250 ई. पू. से 2750 ई. पू. थी, जबकि अर्नेस्ट मैके इसे 2800 ई. पू. से 2500 ई.पू. मानते हैं। माधोस्वरूप वत्स का विचार है कि यह सभ्यता 3500 ई.पू. से 2700 ई.पू. की है, जबकि राजबलि पाण्डेय का मानना है कि यह सभ्यता चार हजार ई. पू. से भी प्राचीन है । धर्मपाल अग्रवाल ने कार्बन-14 (14) पद्धति द्वारा सिन्धु सभ्यता की तिथि 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी है,जबकि आल्विन इसे 2150 ई.पू.से 1750 ई.पू .मानते हैं।
उपरोक्त सभी विचारों और समस्त साक्ष्यों का अध्ययन करने के उपरान्त धर्मपाल अग्रवाल ने यह मत प्रतिपादित किया कि सिन्धु सभ्यता की तिथि 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. थी। उपरोक्त तिथियों में यही तिथि अधिक विश्वसनीय मानी जा सकती है। यद्यपि सिन्धु सभ्यता की तिथि में मतभेद , किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक थी। 
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इतिहास- सिन्धु सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल [IMPORTANT PLACES OF INDUS CIVILIZATION]

IMPORTANT PLACES OF INDUS CIVILIZATION
सिन्धु सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल

सिन्धु सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल [IMPORTANT PLACES OF INDUS CIVILIZATION]

(1) हड़प्पा- हड़प्पासिन्धु सभ्यता का महत्वपूर्ण एवं प्रमुख स्थल माना जाता है। यह नगर पश्चिमी पंजाब के मॉण्टगुमरी जिले में लाहौर से लगभग 100 मील की दूरी पर स्थित है। 1921 ई. में रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थल की खुदाई करायी थी।  यह नगर सिन्धु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था। इसमें  समानान्तर चतुर्भुज के आकार का एक दुर्ग था, जिसमें छह कोठार मिले हैं। यहाँ के निवासी पक्के मकानों में रहते थे।

(2) मोहनजोदड़ो- मोहनजोदड़ो भी सिन्धु सभ्यता का प्रमुख नगर था। 1922 ई. में राखलदास बनर्जी ने इस स्थान की खोज की थी। मोहनजोदड़ो, वर्तमान पाकिस्तान के सिन्धु प्रान्त में लरकाना जिले में स्थित है। मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ- 'मृतकों का टीला' है। इस नगर का यह नाम इस कारण पड़ा, क्योंकि इस नगर की खुदाई में सात तहें मिली, अतः यह नगर सात बार बना और सात बार नष्ट हुआ। इस नगर का निर्माण एक निश्चित योजना के आधार पर किया गया था। यहाँ सड़कों तथा नालियों का समुचित प्रबन्ध था। यहाँ के प्रत्येक मकान में स्नानागार भी होता था।

(3) चंहुदड़ो- चन्हुदड़ो, मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। सिन्धु नदी यहाँ से वर्तमान में लगभग 21 किलोमीटर दूर से बहती है, किन्तु सिन्धु सभ्यता के काल में वह इसके बिल्कुल समीप बहती थी। चन्हुदड़ो, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की तुलना में बहुत छोटा नगर था। डॉ. अर्नेस्ट मैके को इस स्थल की खुदाई में तीन संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सबसे नीचे के स्तर में सिन्धु संस्कृति के चिह्न पाए गए हैं। डॉ,मैके का मत है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता चहुदड़ो में तीन सौ वर्ष तक आबाद रहे। यहाँ के लोग पक्की ईंटों की इमारतें बनाते थे।

(4) लोथल- पुरातत्वविदों के अनुसार यह नगर एक बन्दरगाह था। यह गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर स्थित था। वर्ष 1954-55 ई. में भारत के पुरातत्व विभाग ने इस स्थल की खुदाई करवाई थी। यहाँ की खुदाई में जो सबसे महत्वपूर्ण चीज मिली है, वह एक विशाल गोदी (जहाजों के ठहरने का स्थान)  है। इसमें जहाजों को समुद्र की ओर ले जाने का समुचित प्रबन्ध था। यह गोदी 215 मीटर लम्बी और 37 मीटर चौड़ी है। विश्व में अन्यत्र कहीं इतने प्राचीन युग की कृत्रिम गोदियों का उदाहरण नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त यहाँ से अनेक प्रकार के ८
आभूषण, मुद्राएँ तथा मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं।

(5) कालीबंगा- कालीबंगा, राजस्थान प्रान्त के गंगानगर जिले में प्राचीन सरस्वती नदी के किनारे स्थित है। कालीबंगा में दो टीले प्राप्त हुए हैं। इन टीलों की खुदाई से ज्ञात हुआ कि दोनों टीलों के चारों ओर रक्षा-दीवारों का निर्माण किया गया था। उत्खनन से प्राप्त सामग्री के आधार पर पता चलता है कि एक टीले का प्रयोग निवास के लिए किया जाता था और दूसरे टीले का प्रयोग किले के रूप में होता था, वहाँ पूजा-पाठ आदि के स्थान भी बने हुए थे। यहाँ से अनेक प्रकार के बर्तन, ताँबे के औजार, चूड़ियाँ, मिट्टी की मूर्तियाँ तथा खिलौने आदि भी प्राप्त हुए हैं। 

(6) बणावली- बणावली, हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित है। यहाँ से प्राप्त अवशेष बहुत कुछ कालीबंगा से मिलते जुलते हैं।

(7) सुत्कागेंडोर- यह स्थान करांची के पश्चिम में लगभग 300 मील की दूरी पर स्थित है। 1962 ई. में जॉर्ज डेल्स ने यहाँ सिन्धु नगर, दुर्ग और बंदरगाह का पता लगाया था। यद्यपि आज यह स्थान समुद्र तट से दूर है, परन्तु ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्राचीनकाल में यह समुद्र तट पर स्थित एक बन्दरगाह था, जहाँ से सिन्धु सभ्यता के लोग बेबीलोन के साथ व्यापार करते थे।

(8) कोटदीजी- यह स्थान मोहनजोदड़ो से पूर्व में लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 1955 एवं 1957 ई. में फजल अहमद खाँ ने यहाँ उत्खनन कराया था और यहीं से सिन्धु सभ्यता के अवशेष प्राप्त किए थे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सिन्धु सभ्यता के नीचे यहाँ पर एक अन्य सभ्यता, जिसे ‘कोटदीजी सभ्यता' कहा गया, के अवशेष भी प्राप्त हुए। फजल अहमद खाँ का अनुमान है कि प्राचीन ‘कोटदीजी सभ्यता' किसी समय अग्निकाण्ड के परिणामस्वरूप नष्ट हुई थी, उसके पश्चात् यहाँ सिन्धुवासियों ने अपनी बस्ती बसाई।

(9) रोपड़- यह स्थान पंजाब में स्थित है। यहाँ 1953-56 . में यज्ञदत्त शर्मा ने उत्खनन कार्य कराया था, जिससे यहाँ सिन्धु सभ्यता की अति महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई थी। यह उस समय सतलज नदी पर स्थित था, यहाँ पत्थर और मिट्टी के मकान बने थे । यहाँ एक कब्रिस्तान भी मिला है। यहाँ से एक मुद्रा भी प्राप्त हुई है। इसके अतिरिक्त यहाँ से मिट्टी के बर्तन, आभूषण एवं ताँबे की कुल्हाड़ी आदि भी प्राप्त हुए हैं।

(10) रंगपुर- यह स्थान लोथल से करीब 50 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। श्री रंगनाथ राव ने यहाँ 1953-54 ई. में खुदाई कराई थी। उनका मानना है कि जब बाढ़ के कारण लोथल क्षत-विक्षत हो गया तो वहाँ के लोगों ने भागकर रंगपुर में अपनी बस्ती बसाई। यहाँ भी सिन्धु-सभ्यता के पूर्व सिन्धु-सभ्यता के लोग रहते थे। सिन्धु सभ्यता की सामग्री में यहाँ प्राप्त कच्ची ईंटों के दुर्ग, नालियाँ, मृदभाण्ड, बाँट, पत्थर के फलक और मिट्टी के पिण्ड आदि
उल्लेखनीय हैं।
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इतिहास- सरस्वती सिन्धु (हड़प्पा) सभ्यता का विस्तार [EXTENSION OF THE SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION]

EXTENSION OF THE  SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION
EXTENSION OF INDUS CIVILIZATION

सरस्वती सिन्धु (हड़प्पा) सभ्यता का विस्तार [EXTENSION OF THE SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION]

सिन्धु सभ्यता का क्षेत्र हड़प्पा और मोहनजोदड़ो तक ही सिमित  नहीं था, अपितु अत्यधिक विस्तृत था। सिन्धु सभ्यता का विस्तार विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के क्षेत्रों बहुत अधिक विस्तृत था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सिन्धु सभ्यता पश्चिम में मकराना तट-प्रदेश पर सुत्कागेंडोर से पूर्व जिला मेरठ के आलमगीरपुर तक और उत्तर में जम्मू के मांदा से लेकर दक्षिण में किम सागर संगम पर भगतराव तक फैली हुई थी। समस्त समकालीन
सभ्यताओं में सिन्धु सभ्यता नि:सन्देह सबसे विस्तृत थी। क्षेत्र की दृष्टि से यह मिस्र और सुमेरिया सभ्यता से कहीं अधिक विशाल थी । प्रोफेसर आर.एन. राव का मानना है कि सिन्धु  सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम 1600 किलोमीटर व उत्तर से दक्षिण 1100 किलोमीटर के क्षेत्र में था। विद्वान इतिहासवेत्ता पिगट का विचार है कि सिन्धु सभ्यता के अन्तर्गत इस विशाल प्रदेश की व्यवस्था व प्रशासन दो राजधानियों उत्तर में हड़प्पा व दक्षिण में मोहनजोदड़ो के द्वारा होता है। 
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इतिहास- सरस्वती सिन्धु (हड़प्पा) सभ्यता की खोज तथा नाम [DISCOVERY & NAME OF THE SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION]

DISCOVERY & NAME OF THE  SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION
सरस्वती सिन्धु सभ्यता

सरस्वती सिन्धु (हड़प्पा) सभ्यता की खोज तथा नाम [DISCOVERY & NAME OF THE  SARASWATI INDUS (HARAPPA) CIVILIZATION]


"यह महान सभ्यता मध्य-पूर्व की ऋणी नही है, और न यह विश्वास करने का ही कोई कारण है कि इस सभ्यता के निर्माता कोई देशान्तरवासी थे, इन नगरों का निमण उन लोगों ने किया जो सम्भवत: सिन्धु घाटी में शताब्दियों से रहते थे। हड़प्पा निवासी, जब उन्होंने अपनी नगर-योजना बनाई, भारत के निवासी थे तथा एक हजार वर्ष तक उनमें कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ।"  -ए एल वाशम

सभ्यता की खोज तथा नाम  [DISCOVERY & NAME OF THE CIVILIZATION]

1921 ई. तक यह सामान्य धारणा थी कि भारत की प्राचीनतम सभ्यता आर्यों की वैदिक सभ्यता है, किन्तु सिन्धु सभ्यता की खोज ने इस धारणा को असत्य प्रमाणित कर दिया। 1921 ई. में रायबहादुर दयाराम साहनी ने सिन्धु नदी की घाटी में स्थित हड़प्पा नामक स्थान पर सर्वप्रथम इस महत्वपूर्ण सभ्यता के अवशेषों का पता लगाया।1922 ई. में राखलदास बनर्जी ने हड़प्पा से 640 किमी दूर स्थित मोहनजोदड़ो में उत्खनन के द्वारा एक भव्य नगर के अवशेष प्राप्त किए । प्रारम्भ में उत्खनन कार्य सिन्धु नदी की घाटी में ही किया गया था तथा वहीं पर इस सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए थे, अतः सर जॉन मार्शल ने इस सभ्यता को 'सिन्धु सभ्यता' कहा। अब जबकि इस सभ्यता के अवशेष सिन्धु नदी की घाटी से दूर गंगा-यमुना के दोआब और नर्मदा-ताप्ती के मुहानों, कश्मीर में मांडा तक प्राप्त हुए हैं, इस सभ्यता का नाम ‘सिन्धु-सभ्यता' उचित प्रतीत होता। कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने इस पुरातत्व परम्परा के आधार पर कि सभ्यता का नामकरण उसके सर्वप्रथम ज्ञात स्थल के नाम पर आधारित होता है, इस सभ्यता को 'हड़प्पा-सभ्यता' कहा है, किन्तु अभी तक 'सिन्धु-सभ्यता' नाम ही अधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध है।
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