Results for जैव विविधता

बायोस्फीयर रिजर्व (BIOSPHERE RESERVE)

BIOSPHERE RESERVE
बायोस्फीयर रिजर्व 

बायोस्फीयर रिजर्व (BIOSPHERE RESERVE)

बायोस्फियर रिजर्व ऐसे स्थल होते हैं जहाँ पर (पेड़, पौधे व जन्तुओं) प्राकृतिक (Natural), कम-से-कम प्रभावित (Minimum disturbed), मानव द्वारा रूपान्तरित (Man modified) एवं अवनति प्राप्त (Degraded) पारिस्थितिक तन्त्रों या वन्य जीवों को सुरक्षित रखा जाता है । बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम को सर्वप्रथम यूनेस्को (UNESCO) द्वारा सन् 1971 में मैन एवं बायोस्फियर प्रोग्राम (Man and Biosphere Programme) के अन्तर्गत प्रारम्भ किया गया था ।

बायोस्फियर रिजर्व के उद्देश्य (Objects of Biosphere Reserve)

बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) प्रत्येक पारिस्थितिक तन्त्र के प्रतिनिधि नमूनों की जानकारी रखना।
(2) लम्बे समय तक आनुवंशिक विविधता का संरक्षण करना।
(3) बेसिक एवं व्यावहारिक अनुसन्धान (Basic and Applied research) को बढ़ावा देना।
(4) जैविक संसाधनों के उचित प्रबन्ध को बढ़ावा देना।
(5) अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि करना।
(6) शिक्षा एवं प्रशिक्षण के क्षेत्र में नयी सम्भावनाओं को ढूंढना।
संक्षेप में हम कह सकते हैं बायोस्फियर रिजर्व प्रोग्राम (BRP) निम्नलिखित चार सम्मिलित उद्देश्यों (Combined objectives) की पूर्ति हेतु स्थापित किये जाते हैं
(1) संरक्षण (Conservation), (2) शोधकार्य (Research), (3) शिक्षा (Education), (4) स्थानीय भागीदारी (Local involvement)।
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जीव विज्ञान - जैव-विविधता का संरक्षण (CONSERVATION OF BIODIVRSITY)

CONSERVATION OF BIODIVRSITY
जैव-विविधता का संरक्षण 

जैव-विविधता का संरक्षण (CONSERVATION OF BIODIVRSITY)

मनुष्य की जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि (Populaion explosion) के कारण जैव-विविधता में लगातार कमी आ रही है। जिसके कारण वनों की लगातार कटाई हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप जीवों के प्राकृतिक आवास (Natural habitat) समाप्त होते जा रहे हैं। अत: जैव-विविधता का संरक्षण अतिआवश्यक हो गया है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर उपस्थित वनों के क्षेत्रफल में लगातार कमी आती जा रही है और आज उसके 55 भाग पर ही वन शेष बचे हैं। विश्व में प्रतिवर्ष 1,00,000 वर्ग किमी क्षेत्रफल में उपस्थित वनों की कटाई हो रही है। भारतवर्ष में प्रतिवर्ष वनों की कटाई की दर 13,000 वर्ग किमी है। इस प्रकार जैव-विविधता में वनों की कटाई एवं पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभावों के कारण लगातार कमी आ रही है, अत: संरक्षण करना अतिआवश्यक है, अन्यथा एक दिन ऐसा आयेगा जब पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीवधारी समाप्त हो जायेंगे।
जैवविविधता के संरक्षण करने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं
(1) वनों एवं प्राकृतिक सम्पदा (Natural wealth) तथा उसकी जैविक परिपूर्णता (Biological richness) को संरक्षित रखने के लिए।
(2) वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन स्तर (Orone layer ) के विघटन, अम्ल वर्ष (Acid rein) एवं पृथ्वी के बढ़ते हुए तापक्रम पर नियन्त्रण करने हेतु। 
(3) अपनी दैनिक आवश्यकताओं (Daily needs), जैसे- भोजन (Food), रेशे (Fibres), इंधन (Fuel) एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों की पूर्ति हेतु ।
(4) मनुष्य के अस्तित्व की रक्षा करने हेतु, जो कि प्रजाति विविधता में कमी के कुप्रभावों से आशंकित हैं।
(5) नई हर्बल औषधियों (Herbal medicine), पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं (Nuritional needs), पूरक भोजन
(Supplementary food) प्राप्त करने हेतु ।
(6) पर्यावरण सन्तुलन को बनाये रखने के लिए।

जैव-विविधता संरक्षण के उपाय (Methods of Conservation Biodiversity)

जैव-विविधता के महत्वों को देखते हुए इसका संरक्षण करना अतिआवश्यक हैं। जैव-विविधता के संरक्षण हेतु निम्नलिखित तीन स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं-
(1) आनुवंशिक विविधता का संरक्षण (Conservation of genetic diversity) आनुवंशिक विविधता के संरक्षण से उस जाति का संरक्षण सम्भव होता है।
(2) जाति विविधता का संरक्षण (Conservation of species diversity)
(3) पारिस्थितिक तन्त्र की विविधता का संरक्षण (Conservation of ecosystem diversity)।
विविधता का संरक्षण निम्नलिखित दो विधियों के द्वारा किया जा सकता है - 
(A) इन- सिटू संरक्षण (In-situ conservation) एवं
(B) एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ conservation), दोनों प्रकार के संरक्षण एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

(A) इन- सिटू संरक्षण (In-situ conservation)- इसके अन्तर्गत जैव-विविधता का संरक्षण उनके मूल आवासों (Original habitats) में ही किया जाता है। हमारे देश में जैव-विविधता के संरक्षण हेतु भारत सरकार ने सन् 1952 में इण्डियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थापना की है जो कि वन्य-जीवन एवं जैव-विविधता के संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाती है-
(1) राष्ट्रीय उद्यानों (National parks) की सहायता से,
(2) अभ्यारण्यों (Sanctuaries) की सहायता से,
(3) प्राणी उद्यानों (zoological parks) की सहायता से।
जून, 1992 तक हमारे देश राष्ट्रीय उद्यान तथा 41 अभ्यारण्य शरणस्थल (Sanctuaries) स्थापित थे। भारत सरकार ने जन्तुओं को उनके स्वयं के पारिस्थितिक तन्त्र में प्रतिबन्धित विकास (Unhindered evoluto) हेतु 7  बायोस्फियर रिजर्व (Biosphere reserve) की स्थापना की है।

(B) एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ conservation)- इसके अन्तर्गत जीवों एवं पेड़-पौधों का संरक्षण उनके मूल आवास से दूर ले जाकर किया जाता है। इसके अन्तर्गत पौधों का संरक्षण निम्नलिखित प्रकार के माध्यम से पेड़-पौधों को उनके आवास से दूर स्थापित विभिन्न स्थानों एवं प्रयोगशालाओं में किया जाता है-
(1) वानस्पतिक उद्यानों (Boanical gardens) में,
(2) वानिकी अनुसंधान संस्थाओं (Forestry Research Institutions) में,
(3) कृषि अनुसंधान केन्द्रों (Agricultural Research Institutions) तथा अन्य संरक्षण साधनों के द्वारा।

एक्स-सिटू संरक्षण संरक्षण में पौधों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित तीन तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
(1) बीज बैंक (Seed Bank),
(2) जीन बैंक (Gene Bank),
(3) इन विट्रो स्टोरेज विधि (In vitro storage method)।
भारतवर्ष में वर्तमान स्थिति में लगभग 33 वानस्पतिक उद्यान, 33 विश्वविद्यालयीन जैविक उद्यान (University Biological Gardens), 107 चिड़ियाघर (Zoo), 49 मृग उद्यान (Dear park) तथा 24 प्राकृतिक प्रजनन केन्द्र (Natural Breeding Centres) इन क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
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जीव विज्ञान - लुप्तप्राय या संकटापन्न जीव [ENDANGERED SPECIES]

ENDANGERED SPECIES
ENDANGERED SPECIES

लुप्तप्राय या संकटापन्न जीव (ENDANGERED SPECIES)

अब विभिन्न कारणों से विश्व के कई जीव को कभी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते थे, या तो विलुप्त हो गये हैं या जल्दी ही विलुप्त होने वाले हैं। अकेले हमारे देश में अब तक लगभग 200 किस्म के पशु-पक्षी विलुप्त हो चुके हैं तथा लगभग 800 किस्म के वन्य जीवों के विलुप्त होने की आशंका है। इनमें से भी लगभग 250 किस्म के वन्य जीव तो विलुप्त होने के लिए तैयार हैं। उदाहरणार्थ- पिग्मी, चिम्पांजी, तेंदुआ (Leopard), सिंह (Lion), चीता (Cheetah), बाघ (Tiger), जगुआर (Jaguar, एक प्रकार का चीता), ध्रुवीय भालू, हाथी, पर्वतीय गोरिल्ला, गैंडे की कई जातियाँ तथा कुछ पक्षियों, जातियां विलुप्तप्राय हैं, क्योंकि मनुष्य इनका अन्धाधुन्य उपयोग- शिकार, भोजन, त्वचा इत्यादि के लिए करता आ रहा है।
इसी प्रकार पौधों की बहुत-सी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं तथा शेष विलुप्तता के कगार पर खड़ी हैं।
उदाहरण- बारबेरिस, नीलग्रिएन्सिस, बेंटेकिया निकोबेरिका, क्यूप्रेशस केशमेरिआनो आदि।

लप्तप्राय या संकटापन्न प्रजातियों के प्रकार (Types or Endangered Species)

 द इण्डियन प्लाण्ट्स रेड डाटा बुक में संकटापन्न प्रजातियों को निम्नलिखित समूहों में किया गया है-
(1) विलुप्त (Extinct)- ऐसे पौधे, जो कि पूर्व में किसी स्थान विशेष में पाये जाते थे, लेकिन वर्तमान में वे अपने प्राकृतिक स्थानों से लुप्त हो गये हैं, उन्हें ही विलुप्त प्रजातियाँ कहते हैं। ऐसे पौधे जब उनके प्राकृतिक आवास स्थानों पर उपलब्ध नहीं होते, तब इन्हें विलुप्त प्रजाति माना जाता है। अत: इनका संरक्षण असम्भव होता है।

(2) लुप्तप्राय (Endangered)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि लुप्त होने की स्थिति में हों एवं यदि वही पारिस्थितिक परिस्थितियाँ बनी रहें, तब उन्हें विलुप्त होने से नहीं बचाया जा सकता है अर्थात् जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा बना रहता है। उन्हें लुप्तप्राय या इनडेन्जर्ड प्रजाति कहते हैं। ऐसी प्रजातियों की संख्या धीरे-धीरे इतनी कम हो जाती है कि उनमें प्रजनन की सम्भावनाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे ये विलुप्त होने लगती हैं।
(3) वल्नरेबल (Valnerable)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि कुछ ही समय में लुप्तप्राय स्थिति में पहुँचने वाली हों, उन्हें ही वल्नरेबल प्रजातियां कहते हैं। यदि इन्हें लगातार उन्हीं पारिस्थितिक स्थितियों का सामना करना पड़ता है, तब ये प्रजातियाँ भी लुप्त होने लगती है। 
(4) दुर्लभ (Rare)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जो कि संसार में कहीं-कहीं पर और बहुत कम संख्या में उपलब्ध हों, उन्हें ही दुर्लभ प्रजातियाँ कहते हैं। ऐसी प्रजातियां प्रारम्भ से ही लुप्तप्राय या वल्नरेबल नहीं होतीं लेकिन धीरे-धीरे लुप्तप्राय स्थिति में आ जाती हैं और अन्त में समाप्त हो जाती हैं।
(5) अपर्याप्त जानकारी (Insufficient knowledge)- ऐसी पादप प्रजातियाँ जिनके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता है कि वे किस समूह (1 से 4) के अन्तर्गत आते हैं, ऐसी प्रजातियों के बारे में हमें सही जानकारी नहीं मिल पाती, लेकिन धीर-धीर ये लुप्तप्राय स्थिति में आ जाती है।
(6) खतरे से बाहर (Out of dange)- ऐसी समस्त पादप प्रजातियाँजो कि उपरोक्त श्रेणियों (1 से 5) के अन्तर्गत पहुँच चुकी होती हैं, लेकिन उनके संरक्षण के पश्चात् पूर्व के वास्-स्थान पर स्थापित हो जाती हैं, उन्हें इस समूह के अन्तर्गत रखा जाता है।
सन् 1980 में भारतीय वानस्पतिक सर्वे संस्थान (Boanical Suracy of India) ने ‘थ्रेटेण्ड प्लांट ऑफ  इण्डिया' (Threatened Plants of India) नामक पुस्तक में संकटापन्न पौधों का वर्णन किया है। सन् 1984 में बी.एस.आई. (BSI) ने पुन: एक नयी पुस्तक "द इण्डियन प्लाण्ट्स रेड डाटा बुक" (The Indian Plants Red Data Book) का प्रकाशन किया, जिसमें 125 संकटपन्न  आवृत्तबीजी पौधों का वर्णन किया गया हैं।
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जीव विज्ञान - रेड डाटा बुक [RED DATA BOOK]

रेड डाटा बुक 

रेड डाटा बुक  [RED  DATA BOOK]

विश्व संरक्षण संघ (World Conservation Union) जिसे पूर्व में अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदा संरक्षण संघ (I.U.C.N. or IUCNNR) के नाम से जाना जाता था, के अनुसार विश्व के सभी भागों में विभिन्न कारणों से जैवविविधता में लगातार कमी आती जा रही है। यदि यही स्थिति रही तो पृथ्वी से महत्वपूर्ण प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का खतरा और बढ़ जाएगा। इसे ध्यान में रखते हुए IUCN ने एक रेड डाटा बुक (Red data book) प्रकाशित की, जिसमें संकटापन्न जीवों की प्रजातियों के प्रकार तथा उन प्रजातियों का वर्णन किया गया है जो कि विलोपन के खतरे से गुजर रही हैं। यह पुस्तक सर्वप्रथम 1963 में प्रकाशित की गयी थी। 2004 में इसे संशोधित कर प्रकाशित किया गया है।
 IUCN के पाँच वर्ग जो संरक्षण के लिये बनाये गये थे उसका उपयोग विश्व संरक्षण मॉनीटर केन्द्र (World Conservation Motoring centure) ने किया और लगभग 60000 पादप और 2000 प्राणियों की जाति को खतरों से चिन्हांकित कियाइन प्राणियों का वर्णन रेड डाटा बुक (Red Data Book) में किया गया है। रेड डाटा बुक में प्रकाशित जातियों को थ्रेटेन्ड जाति (Threatened species) का नाम दिया गया।  IUCN के तीन वर्ग-संकटापन्न (Endangered), सुभद्य (Vulnerable) एवं दुर्लभ (Rare) प्रजातियाँ इस थ्रेटेन्ड जातियों के अन्तर्गत आते हैं। रेड डाटा बुक में पादप जातियों का वर्णन अधिक है लेकिन कुछ प्राणी समुदाय भी इसके अन्तर्गत आते हैं , जैसे-मछली, जिनकी जातियों की संख्या (343) है, उभयचर जिनकी जातियों की संख्या (50), इसी प्रकार सरीसृप (170), अकशेरुकी (1355), पक्षी (103) एवं स्तनधारियों की (497) जातियाँ शामिल हैं। इसके पश्चात् IUCN ने 1978 में प्लांट रेड डाटा बुक का प्रकाशन किया और सन् 1988 में IUCI ने रेड डाटा लिस्ट ऑफ ग्रेटेड एनिमल्स  (Red Data List of Treatened Animals) का प्रकाशन किया।

इन पुस्तकों को प्रकाशित करने का प्रमुख उद्देश्य निम्नानुसार हैं-
(1) संकटप्राय प्रजातियों के प्रति जनजागरण उत्पन्न करना एवं सूचना प्रसारित करना।
(2) संकटग्रस्त प्रजातियों को पहचानकर उनका अभिलेख तैयार करना।
(3) भूमण्डलीय स्तर पर जैव-विविधता का आकलन कर भूमण्डलीय सूचकांक जारी करना।
(4) स्थानीय स्तर पर संरक्षण की प्राथमिकता निर्धारित करना तथा जैवविविधता को पूर्वावस्था में लाने के लिए प्रेरित करता।
(5) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जैव-विविधता करार कर सभी देशों में इसका पालन सुनिश्चित करना।
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जीव विज्ञान- जैवविविधता के तप्त (प्रमुख) स्थल (Hotspots of Biodiversity)

Hotspots of Biodiversity
Hotspots of Biodiversity

जैवविविधता के तप्त (प्रमुख) स्थल (Hotspots of Biodiversity)

विश्व के ऐसे स्थल जहाँ किसी प्राणी अथवा वनस्पति की अधिकता हो या निरंतर घट रही दुर्लभ प्रजातियां हों, जैव-विविधता के उस बिन्दु या तप्तस्थल Hotspots of biodiversity) कहलाते हैं।

दूसरे शब्दों, विश्व के ऐसे स्थल जहाँ बिना मानवीय हस्तक्षेप के पौधे एवं जीवजन्तु फलते-फूलते हैं। जहाँ पर अत्यधिक मात्रा में वनस्पति व जीव-जन्तुओं की प्रजाति में विविधता पायी जाती है। ऐसे स्थल -बिन्द जैव-विविधता के तप्त स्थल या उष्णा कहलाते हैं।
विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, जो जैव-विविधता से संपन हैं जहाँ जैव-विविधता के प्रजातियों का विलुप्तीकरण तथा आवास विनाशीकरण की संभावना होती है जैव-विविधता के उष्ण बिन्दु हैं। हमारी पृथ्वी पर 12 मेगा जैव-विविधता वाले क्षेत्रों की पहचान की गयी है। जिसमें विश्व की जैवविविधता की 60-70% जातियाँ शामिल हैं। इन सेक्टर्स को मैगजीन सेन्टर्स कहते हैं। भारत इन देशों में से एक है-
(1) मैक्सिको, (2) कोलम्बिया, (3) ब्राजील, (4) पेरू, (5) इक्वेडोर, (6) जायेर , (7) मेडागास्कर, (8) इण्डोनेशिया, (9) मलेशिया, (10) भारत, (11) चीन, (2) आस्ट्रेलिया शामिल हैं।

भारतवर्ष के जैव-विविधता के तप्तस्थल (Hotspots of Biodiversity in India)

भारत में दो तप्तस्थल (Hotspot) पाये जाते हैं जिसमें से- . 1पूर्वी हिमालय (Eastern Himalaya), 2. पश्चिमी घाट (Westem Ghat) हैं। जिनमें बहुत अधिक पौधे (Plants), जन्तुएँ (Animals), कीट, (Insects), पक्षी (Birds), सरीसृप (Reptiles) आदि पाये जाते हैं। निरन्तर वनों के विनाश एवं बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण पश्चिमी घाट की जैवविविधता को सर्वाधिक खतरा है।  
उदाहरण- भारतवर्ष में अध्ययन किये गये पुष्पीय पौधों (Poweing plants) की 15000 प्रजातियों (Species) में से लगभग ,000 प्रजातियाँ (Speciesकेरल के पश्चिमी घाट (Western valeyof Kerala) में पायी जाती हैं। इसी प्रकार भारत में पाये जाने वाले कुल प्राणी-प्रजातियों (Animals species) में से लगभग एकतिहाई (One third or 1/3)  प्राणी केरल के पश्चिमी घाट में पाये जाते हैं। 
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जीव विज्ञान-जैव विविधता में कमी या हानि [LOSS OF BIODIVERSITY]

LOSS OF BIODIVERSITY
जैव-विविधता 

जैव-विविधता में कमी या हानि [LOSS OF BIODIVERSITY]

जैव विविधता में विगत वर्षों से लगातार कमी आती जा रही है जैव विविधता में कमी के प्रमुख कारण मानव का प्रकृति में बढ़ता हस्तक्षेप है।  जैव विविधता में कमी निम्न कारणों से होती है-
(A) प्राकृतिक कारण एवं (B) मानव निर्मित कारण 

(A) प्राकृतिक कारण (Natural Factors)

(1) मृदा, वायु एवं जल प्रदूषण (Soil, air, and water pollution)।
(2) बाढ़, सूखा एवं भूकंप।
(3) अत्यंत कम आबादी का होना या क्रांतिक जनसंख्या का होना।
(4) विदेशी या एक्जॉटिक प्रजातियों का आगमन 
(5) परागण करने वाली स्रोतों (Pollinators) की कमी।
(6) संमरामक रोग।

(B) मानव निर्मित कारक (Man-made factors)-

(1) आवासों का नष्ट होना (Destruction of habitat)- 

मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति जैसे- आवास एवं घास के मैदान बनाने, कृषि, खनन, उद्योगों की स्थापना, राजमार्गों एवं सड़कों के निर्माण विस्तार, बांध आदि बनाने के लिए वनों या पेड़ पौधों एवं जंतुओं के प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर रहा है जिसके कारण वहां पर उपस्थित जीव-जंतु दूसरे स्थानों पर चले जाते हैं अथवा वे शिकारी का शिकार हो जाते हैं अथवा उनके लिए भोजन की कमी हो जाती है तथा वे रोगों का शिकार हो जाते हैं, जिसके कारण जिसके कारण उस स्थान की जैव-विविधता समाप्त हो जाती है। उदाहरण- हमारे देश में अकेले पश्चिमी घाट में तितलियों की लगभग 370 प्रजातियां उपलब्ध है, जिसमें से लगभग 70 प्रजातियाँ आज विभिन्न कारणों से लुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी है

(2) शिकार (Hunting)- 

मनुष्य प्राचीनकाल से ही अपने भोजन एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जन्तुओं का शिकार करता आया है। जन्तुओं में खाल, टस्क, फर, मांस, औषधियाँ, इत्र, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री एवं शोभाकारी या सजावटी सामग्री के लिए उनका शिकार किया जाता है तथा इनका व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, जिनके कारण जन्तु विविधता में कमी आती जा रही हैं।

(3) अतिदोहन (Over exploitation)- 

प्रकृति में उपस्थित पेड़-पौधों एवं जन्तुओं का विभिन प्रकार से उपयोग किया जाता है। आर्थिक रूप से उपयोगी प्रजातियों के साथ-साथ प्रयोगशाला में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं का उपयोग वृहत स्तर पर होने के कारण उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है और वे विलुप्तता के कगार पर पहुँच चुके हैं। उदाहरण-घटपर्णी, नीटम, साइलोटम पौधे एवं मेढक (राना टिग्रिना) एवं जंतु व्हेल मछली का उपयोग ओषधि बनाने एवं मांस प्राप्त करने में लगातार होने के कारण आज इनकी संख्या भी कम होती जा रही है।
प्रकार पोडोफाइलम एकोनीटम, डायस्कोरिया, राजल्फिया, काप्टिस जैसे पौधों का औषधीय उपयोग होने के कारण इनकी संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। इस प्रकार ये अतिदोहन का शिकार हो चुके हैं।

(4) अजायबघरों व अनुसंधान हेतु संग्रहण (Collection for zoo and researches)-

आज सम्पूर्ण विश्व में जंगली पादप एवं जन्तु प्रजातियों को अध्ययन अनुसंधान कार्य एवं औषधियाँ प्राप्त करने के लिए जैविक प्रयोगशालाओं में संग्रहीत किया जा रहा है तथा मनोरंजन हेतु उन्हें अजायबघरों में कैद किया जा रहा है। बन्दर, चिम्पांजी जैसे- प्राइमेट्स का उपयोग अनुसंधान शालाओं में उनके आन्तरिक संरचना एवं अन्य प्रकार के अध्ययनों में किया जाता है, जिसके कारण इनकी संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। 

(5) विदेशज प्रजाति का परिचय (Introduction of exotic species)-

आज हम विभिन्न प्रकार की विदेशी पादप एवं जन्तु प्रजातियों का आयात कर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। इन विदेशी पादप प्रजातियों के आगमन या परिचय के कारण देशी प्रजातियों के समक्ष भोजन एवं आवास जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

(6) कीटनाशकों का उपयोग (Use of pesticides)-

कीटनाशी एवं खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग ने भी जैव
विविधता को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है। इसके लगातार उपयोग के कारण बहुत-सी पादप एवं जन्तु प्रजातियाँ समाप्त होती जा रही हैं।

(7) प्रदूषण (Polution)-

पर्यावरण प्रदूषण आज सर्वाधिक विकराल समस्या है, जिसके कारण आज वायु, जलमृदा, समुद्र, तालाब आदि प्रदूषित हो चुके हैं। इनके कारण जीवधारियों को साँस लेने हेतु शुद्ध वायु पीने के लिए शुद्ध जल, पौधों की वृद्धि के लिए शुद्ध मृदा एवं जलीय जन्तुओं के आवास हेतु प्रदूषण रहित जल मिलना मुश्किल हो गया है। अत: वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों का शिकार होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप इनकी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार प्रदूषण के कारण भी जैव-विविधता में लगातार
कमी होती जा रही है।

(8) पारिस्थितिक स्थानापन्न (Ecological sub-stitution)-

जब किसी स्थान पर कोई नई प्रजाति का समावेश किया जाता है तो वह प्रजाति उस स्थान के अधिकांश भाग को घेर लेता है, जिसके कारण पूर्व की प्रजातियाँ स्थानाभाव के कारण लुप्त होने लगती हैं।

(9) अन्य कारण (Other causes)-

(i) जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी होना।
(ii) खाद्य श्रृंखला में जीवधारी की स्थिति।
(iii) वितरण समा।
(iv) विशिष्टीकरण की सीमा ।
(v) सामाजिक एवं आर्थिक कारण।
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जीव विज्ञान- जैव-विविधता एवं उसके प्रकार [Biodiversity and it's Types]

Biodiversity and it's Types
Biodiversity

जैव-विविधता [BIODIVERSITY] 

सामान्य परिचय (General Introduction)

प्रकृति में लाखों प्रकार के जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे पाये जाते हैं। इनके आकार एवं प्रकार तथा संरचना में अत्यधिक विविधता पायी जाती है । बायोडायवर्सिटी (Biodiversity) अर्थात् जैवविविधता शब्द पारिस्थितिकी (Ecolog) के अन्तर्गत उपयोग किये जाने वाले शब्द बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (Biological diversity) का नवीन एवं संक्षिप्त स्वरूप है। बायोडायवर्सिटी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्टर जी. रोसेन ने सन् 1986 में पौधों (Pants), जन्तुओं
(Animals) और सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) के विविध प्रकारों (Varieties) और उनमें विविधताओं (variablities) के लिए किया था।
दूसरे शब्दों , "जैव-विविधता समस्त जीवों (Living organisms), जैसे—पादों, जन्तुओं एवं सूक्ष्मजीवों की जातियों की विपुलता (Richness) है जो कि किसी निश्चित आवास (Habitat ) में पारस्परिक अंतक्रियात्मक तन्त्र की भाँति उत्पन्न होती है।"

विश्व की जैव-विविधता (Biodiversity of the world)-

वैज्ञानिकों के द्वारा किये गये विभिन्न अध्ययनों के आधार पर अनुमान लगाया गया कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर जीव-जन्तुओं एवं पौधों को लगभग 5 से 10 मिलियन प्रजातियाँ उपस्थित हैंपरन्तु इनमें से लगभग 2 मिलियन प्रजातियों की ही पहचान की जा सकी है तथा उनका अध्ययन किया गया है। इनकी समूहवार संख्या इस प्रकार हैं-
(I) हरे पौधों एवं कवकों (Fungi) की प्रजातियों की संख्या 3,00000
(ii) कीटों की प्रजातियों की संख्या 8,00000
(iii) उभयचर जीवों की प्रजातियों की संख्या 23,000
(iv) रेप्टाइल्स की प्रजातियों की संख्या 6,300
(v) पक्षी वर्ग के जीवों की प्रजातियों की संख्या 8,700
(vi) स्तनधारी जीवों की प्रजातियों की संख्या 4,100
(vii) सूक्ष्मजीवों की संख्या 2,000 से अधिक।

भारतवर्ष की जैवविविधता (Biodiversity of India)-

भारतवर्ष पादपजात (Flora) एवं प्राणिजात (Fauna) से भरपूर है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के जीवधारियों की संख्या इस प्रकार है

पादप जैवविविधता (Pant Biodiversity)

कवक                   23,000 प्रजातियाँ
आवृतबीजी।         15,000 प्रजातियाँ
ब्रायोफाइट्स          2,564 प्रजातियाँ
टेरिडोफाइट्स।      1,022 प्रजातियाँ
जीवाणु                850 प्रजातियाँ
अनावृतबीजी        64 प्रजातियाँ

जन्तु जैव-विविधता (Animal Biodiversity)

आर्थोपोड़।                     57,525 प्रजातियाँ
निम्न श्रेणी के जन्तु          9,214 प्रजातियाँ
मोलस्क जीव                  5,042 प्रजातियाँ
मछलियां                       2,546 प्रजातियाँ
पक्षी                             1,228 प्रजातियाँ
इकाइनोडर्मेट्स               765 प्रजातियाँ
सरीसृप जीव                  428 प्रजातियाँ
जलस्थली जीव               204 प्रजातियाँ 
स्तनधारी                       372 प्रजातियाँ
प्रोटोकार्डेटा                   116 प्रजातियाँ
हेमीकार्डेटा                   12 प्रजातियाँ 
उपरोक्त डाटा से स्पष्ट है कि भारत में कवक तथा कीट समुदाय के जीव प्रभावी हैं।
यहाँ पर पौधों एवं जन्तुओं की सैकड़ों प्रजातियां ऐसी भी हैं, जिनकी खोज सम्भावित हैं।

जैव-विविधता के प्रकार (Types of Biodiversity)

जैव-विविधता के प्रकार निम्न हैं
(1) आनुवांशिक विविधता (Genetic diversity)- एक ही प्रजाति के जीवों के जीनों में होने वाली विविधताओं को आनुवंशिक विविधता या एक ही प्रजाति के अन्दर होने वाली विविधता (Diversity within species) कहते हैं। ऐसी विविधताओं के उनका कारण एक ही प्रजाति की कई समष्टियाँ (Distinct population) बन जाती हैं। इस प्रकार आनुवंशिक विविधता के कारण ही प्रजाति की जातियों की समष्टियों में विविधता आ जाती है।
(2) प्रजाति विविधता (Species diversity)- इस प्रकार की विविधता दो प्रजातियों के मध्य होती है। इसके अन्तर्गत एक विशेष प्रक्षेत्र (Region) के अन्दर उपस्थित प्रजातियों (Species) के मध्य उपस्थित विविधताएँ आती हैं। ऐसी विविधताओं का समापन उस क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न प्रजातियों की संख्या के आधार पर किया जाता है।
(3) पारिस्थितिक तंत्रीय विविधता (Ecosysterm diversity)- एक पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में कई भूरूप (Land forms) हो सकते हैं तथा प्रत्येक भू-भाग में विभिन्न एवं विशेष प्रकार की वनस्पतियाँ एवं जीव-जन्तु पाये जाते हैं। इस प्रकार किसी पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों की विविधता को ही पारिस्थितिक तंत्रीय विविधता कहते हैंइस विविधता का मापन अपेक्षाकृत कठिन होता है क्योंकि इसके विभिन्न भू-रूपों या उप-परिस्थितियों की सीमाएँ स्पष्ट नहीं होती हैं। अत: पारिस्थितिक तंत्रीय विविधताओं के अध्ययन के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि एक पारिस्थितिक तंत्रों के विभिन्न पारिस्थितिक निकों (Ecological niches) को भांति-भाँति समझा जाये क्योंकि यहाँ पर उपस्थित समुदाय एक विशिष्ट प्रकार की प्रजाति जटिलता (Species complexes) युक्त होता है। ये जटिल जैव-विविधता की संरचना एवं उसके संगठन से सम्बन्धित होते हैं।

पारिस्थितिक विविधता के प्रकार (Type of Ecosystem Diversity)

पारिस्थितिक विविधता तीन प्रकार की होती है—अल्फा विविधता, बीटा विविधता एवं गामा विविधता।
(1) अल्फा विविधता (Alpha diversity)- इसे समुदाय की आन्तरिक विविधता भी कहते हैं। यह विविधता एक समान आवास में पाये जाने वाले एक समुदाय के जीवों में पाई जाने वाली स्थानीय विविधता होती है।
(2) बीटा विविधता (Beta diversity)- ऐसी विविधता आवास में परिवर्तनों या समुदाय में पारिस्थितिक प्रवणताओं, जैसे- ऊचाई, अक्षांश, आर्द्रता प्रवणताओं में अन्तर आने के कारण उत्पन्न होती है। जातियों के आवास में बदलाव का जितना अधिक होता है बीटा विविधता उतनी ही अधिक होती है।
(3) गामा विविधता (Gamma diversity)- इसे क्षेत्रीय विविधता भी कहते है। इस प्रकार की विविधता एक भू-भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले सभी प्रकार के आवास स्थानों में जातियों की प्रचुरता प्रदर्शित करती है।
जीव विज्ञान- जैव-विविधता एवं उसके प्रकार [Biodiversity and it's Types] जीव विज्ञान- जैव-विविधता एवं उसके प्रकार [Biodiversity and it's Types] Reviewed by rajyashikshasewa.blogspot.com on 7:40 PM Rating: 5
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