रसायन शास्त्र का इतिहास [HISTORY OF CHEMISTRY]

भारत में आधुनिक रसायन (Modern chemistry in India)
HISTORY OF CHEMISTRY

रसायन शास्त्र का इतिहास (HISTORY OF CHEMISTRY)

भारतीय परिदृश्य में रसायन शास्त्र का इतिहास (History of Chemistry in Light of Indian Scenerio) 

रसायन का इतिहास अत्यन्त पुराना है। हजारों वर्ष पहले भारत का रसायन ज्ञान चरमोत्कर्ष पर था। चरक व बाणभट्ट अपने औषधि ज्ञान के लिए व नागार्जुन रसायन ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। भारत में लोग धातु शुद्ध करना, औषधि विज्ञान, आसवन, किण्वन आदि क्रियाओं से परिचित थे। भारत से यह ज्ञान अरब, यूनान, चीन आदि देशों में पहुँचा।
अमृत एवं पारस पत्थर की खोज ने रसायन के प्रारम्भिक विकास में बहुत योगदान दिया। रॉबर्ट बॉयल को आधुनिक रसायन का जनक कहा जाता है। प्रीस्टले, शीले आदि वैज्ञानिकों ने भी रसायन शास्त्र के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। 
भारत, चीन, मिस्र तथा यूनान आदि देश प्राचीन काल से ही रासायनिक क्रियाओं का उपयोग- (i) धातु शुद्ध करने में, (ii) औषधि बनाने में, (iii) रंग बनाने में, (iv) साबुन बनाने में करते रहे हैं। इस तरह आदि काल से ही मानव ने रसायन का अध्ययन आरम्भ कर दिया था किन्तु इसकी वैज्ञानिक नींव बहुत समय बाद पड़ी । रसायन के इतिहास को अग्र कालों में विभाजित किया जा सकता है-

1. प्रारंभिक काल (सन 1500 तक )- रामायण में संजीवनी बूटी तथा महाभारत में 'मोहन-अस्त्र' तथा 'प्रमोदन अस्त्र'  (विषैली वस्तुओं) के उपयोग का उल्लेख रसायन के ज्ञान को व्यक्त करता है। चरक, सुश्रुत तथा बाणभट्ट आदि वैज्ञानिकों का औषधी विज्ञान के क्षेत्र में किये गये कार्य उल्लेखनीय हैं। इस काल के लोग कागज कपड़ा, रंग, कॉसा, ताँबा आदि का ज्ञान रखते थे। भारत में कणाद मुनि ने भी द्रव्य की संरचना पर अपने विचार दिये थे कि द्रव्य छोटे छोटे कणों से मिलकर बना है, जिन्हें परमाणु (Atons) कहते हैं।
भारत से रसायन विज्ञान का ज्ञान मिस्रवासियों तक पहुँचा। मिस्र के वैज्ञानिकों का उद्देश्य कम मूल्य की धातुओं को स्वर्ण में परिवर्तित करना था। काल्पनिक कथानुसार ये पारस पत्थर की खोज में थे लेकिन उनकी ये कल्पना साकार न हो सकी।
इस काल में रसायन के वैज्ञानिक कीमियागार' कहलाते थे। इनका प्रयास तीन वस्तुओं अमृत (Elixir of life), पारसमणि (Philosopher's stone), विश्वव्यापी विलायक (Universal solvent) की खोज करना था, जिनकी खोज के फलस्वरूप आसवन, ऊध्वपातन, धातुओं का निष्कर्षण शोध, मिश्रधात आदि का ज्ञान प्राप्त हुआ। इस काल को कीमियागारी काल या अलकिमी काल (Alchemy period) कहा जाता है।

2. औषधि काल ( सन् 1500 से 1625 तक)- इस काल के वैज्ञानिकों का उद्देश्य एक ऐसी औषधि का आविष्कार करना था जिससे मनुष्य समस्त रोगों से मुक्त होकर सदा जवान रहे। इस औषधि को वे अमृत (Elixir of life) कहते थे। अमृत प्राप्त करने के प्रयासों से अनेक औषधियों का आविष्कार हुआ। काँच बनाने की क्रिया भी इसी काल में आरम्भ हुई। जर्मनी वैलेंटाइन तथा स्विट्जरलैण्ड के पेरासेल्सस इस काल के प्रमुख वैज्ञानिक थे।

3. गैसीय रसायन काल ( सन् 1625 से 1800 तक)- इस काल के प्रमुख वैज्ञानिक बॉयल (Boyle), प्रीस्टले (Priestley), कैवेडिश (Cavendish), शीले (Scheele) ने रसायन के विकास को गति प्रदान की। इस काल में तत्वों को सही रूप से परिभाषित किया गया और अनेक गैसों की खोज हुई।

4. फ्लोजिस्टन काल ( सन् 1600 से 1700 तक)- इस काल के वैज्ञानिकों ने ‘फ्लोजिस्टन सिद्धान्त' दिया। इसके अनुसार पदार्थों के जलने से फ्लोजिस्टन नामक पदार्थ बाहर निकल जाती है और राख शेष रह जाती है, तभी जलने के बाद पदार्थ का भार घट जाता है। यह विचार लगभग 100 वर्षों तक मान्य रहा, किन्तु 18 वीं शताब्दी में लेवोजियर ने अपने प्रयोग द्वारा सिद्ध किया कि जलना एक रासायनिक क्रिया है, जिसमे पदार्थ ऑक्सीजन से संयुक्त होता है और जलने के बाद बने हुए पदार्थ का भार मूल पदार्थ के भार से अधिक होता है। 

5. आधुनिक काल- इस काल का विकास 17वीं शताब्दी के अंतिम वर्षो में प्रारम्भ हुआ था। इस काल को दो भागों  पूर्वार्द्ध  एवं उत्तरार्ध में विभाजित किया जा सकता है-

(i) पूर्वार्ध काल- यह काल सन् 1800 से 1900 तक माना जाता है। रसायन को प्रगति इसी काल में हुई है। डाल्टन का परमाणुवाद, एवोगैडो की परिकल्पना,  व्होलर (Wholer) द्वारा कार्बनिक यौगिक यूरिया का प्रयोगशाला में निर्माण, मैन्डलीफ की आवर्त सारणी ( तत्वों का वर्गीकरण, वायु में उपस्थित अवयवों का ज्ञान) (Ramsav & Ravleigh), इसी काल में हुआ। इसी काल में लेवोसियर (Lavoiser), 'नेफ्लोजिस्टन सिद्धान्त' के अन्धविश्वास को दूर किया और आधुनिक रसायन विज्ञान की नींव पड़ी। इस काल में सन् 1808 में जॉन डाल्टन ने ‘परमाणुवाद' दिया तथा सूक्ष्म कण का नाम 'परमाण' (Atom) दिया। सन् 1852 में फ्रेंकलेंड ने परमाणो के संयोग से अणुओ के बनने की विधि बताई।  सन् 1901 में वाण्ट हॉफ ने गैसों तथा विलयनों के नियमों को प्रस्तुत किया।

(ii) उत्तरार्द्ध काल या आधुनिक काल- यह सन् 1901 से अब तक का काल है। इस युग का प्रारम्भ मैडम क्यूरी द्वारा रेडियो सक्रिय तत्वों 'रेडियम' की खोज से हुआ। लार्ड रदरफोर्ड एवं बोहर ने परमाणु संरचना संबंधी जानकारी प्रस्तुत की, सॉडी (Soddy) ने समस्थानिकों (Isotopes) की खोज की, इस प्रकार परमाणु ऊर्जा के नए युग में प्रवेश किया।
रॉबर्ट बॉयल (Robert Boyle) को आधुनिक रसायन का जन्मदाता कहा जाता है, इन्होंने रसायन को नए रूप में प्रस्तुत किया। इस काल के प्रमुख वैज्ञानिक लार्ड रदरफोर्ड, जे.जे. थामसन, मैडम क्युरी, रॉबर्ट बॉयल, लेवोसियर, कैण्डविश, प्रीस्टले, शोले, डाल्टन, मैण्डलीफ, रेले एवं रेमसे, डॉ. होमी जहाँगीर भाभा आदि हैं। हाइड्रोजन बम, परमाणु बम, परमाणु चालित यंत्र आदि इस युग की प्रमुख उपलब्धियां हैं।
रसायन की उपर्युक्त प्रगति को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि- "रसायन एक प्रायोगिक विज्ञान है, जिसके अन्तर्गत उन सभी पदार्थों का अध्ययन किया जाता हैं, जिनसे ब्रह्माण्ड (Universe) का निर्माण हुआ।"

भारत में आधुनिक रसायन- सन् 1814 में पश्चिम बंगाल के कोलकाता में भारतीय विज्ञान कॉलेज की स्थापना हुई । आचार्य पी.सी.राय ने बंगाल केमिकल एण्ड फार्मास्यूटिकल वर्क्स लिमिटेड नामक  कारखाने की स्थापना कर लगभग 80  नए यौगिकों का निर्माण किया। आचार्य पी० सी० राय पहले भारतीय रसायनज्ञ थे, जिन्होंने मरक्यूरस नाइट्रेट बनाया।  इन्होने 'हिन्दू रसायन का इतिहास' नामक कृति प्रस्तुत की। 
महर्षि  कणाद में सर्वप्रथम परमाणु की परिकल्पना की थी।
पूना में राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला (National chemical laboratory), बिहार के सिंदरी में कृत्रिम खाद का कारखाना स्थापित किया गया। विदेशी वैज्ञानिकों की सहायता से स्टील प्लान्ट भिलाई (छत्तीसगढ़), दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल), राऊरकेला (उड़ीसा) आदि स्थानों पर लगा । प्राकृतिक गैस की खोज तथा औषधि निर्माण के क्षेत्र में निरंतर प्रगति की जा रही है। भारत में शोध एवं अध्ययन के लिए अनेक संस्थान स्थापित किए गये। प्रमुख निम्न हैं-
1. नेशनल शुगर रिसर्च इन्स्टीट्यूट, कानपुर (उत्तर प्रदेश)
2. सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इन्स्टीट्यूट, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
3. सेन्ट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, मैसूर (कनाटक)
4. सेन्ट्रल फ्यूल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, धनबाद (झारखण्ड)
5. सेन्ट्रल ग्लास एण्ड सिरेमिक रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जादवपुर (पश्चिम बंगाल)
6. सेंट्रल लेदर रिसर्च इस्टीट्यूट, चेनई (तमिलनाड)
7. सेन्ट्रल मेटलजकल लेबोरेट्री, जमशेदपुर (झारखण्ड)
8. नेशनल केमिकल लेबोरेटो पुणे (महाराष्ट्र)
9. इण्डियन इस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम देहरादून (उत्तरांचल)
10. इण्डियन इन्स्टीट्युट ऑफ एक्सपेरिमेन्टल मेडिसीन, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) ।
।।. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेन्टर मुम्बई (महाराष्ट्र)

इनके अतिरिक्त भारत में आजादी के बाद छ: एटॉमिक पावर स्टेशन (रावत भाटा, तारापुर, कलपक्कम, नरोरा, काकरापारा, कैगा) तथा 15 रिफायनरी विभिन्न राज्यों में लगाई गई है। इससे बिजली उत्पादन तथा पेट्रोलियम के क्षेत्र में काफी आशावान प्रगति हो रही हैं।
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